जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत

प्रारम्भिक , निम्न कोटि के क्रमिक परिवर्तनों द्वारा आधिकारिक जीवो की उत्पति को जैव – विकास कहा जाता है।  जीव – जन्तुओ की रचना कार्यिकी एवं रासायनिक , भ्रूणीय विकास , वितरण आदि में विशेष क्रम व आपसी सम्बन्ध में अपनी – अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्ही सम्बन्धो को दर्शाने वाले निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये है –

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  1.  वर्गीकरण के प्रमाण
  2. तुलनात्मक शरीर रचना से प्रमाण 
  3. अवशेषी अंगो से प्रमाण 
  4. संयोजकता जन्तुओ से प्रमाण 
  5. पूर्वजता से प्रमाण 
  6. तुलनात्मक भ्रौणिकी से प्रमाण 
  7. भौगोलिक वितरण से प्रमाण 
  8. तुलत्नात्मक कार्यिकी एवं जीव – रासायनिक से प्रमाण 
  9. आनुवंशिकी से प्रमाण 
  10. पशुपालन से प्रमाण 
  11. रक्षात्मक समरूपता से प्रमाण 
  12. जीवाश्म विज्ञानं एवं जीवश्मों से प्रमाण 

 

समजात अंग ( Homologous organ )

ऐसे अंग जो विभिन्न कार्यो के लिए उपयोजित हो जाने के कारन काफी असमान दिखाई दे सकते है , परन्तु मूल रचना एवं भ्रूणीय परिवर्द्धन में समान होते है , समजात अंग कहलाते है।  उदाहरण — सील के फ्लिपर , चमगादड़ के पंख, घोड़े की अगली टांग , बिल्ली का पंजा तथा मनुष्य के हाथ की मौलिक रचना एक जैसी होती है।  इन सभी में हुमेरस , रेडियो अल्ना , कार्पल्स , मेटकारप्लस आदि अस्थिया होती है।  इनका भ्रौणिकिये विकास भी एक सा ही होता है। परन्तु इन सभी का कार्य अलग – अलग होता है।  सील का फ्लिपर तैरने के लिए, चमगादड़ के पंख उड़ने के लिए , घोड़े की टांग दौड़ने के लिए तथा मनुष्य का हाथ वास्तु को पकड़ने के लिए अनुकूलित होता है।  

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समरूप अंग ( Analogous organ )

ऐसे अंग जो समान कार्य के लिए उपयोजित हो जाने के कारण समान दिखाई देते है , परन्तु मूल रचना एवं भ्रूणीय परिवर्द्धन में भिन्न होते है , समरूप अंग कहलाते है।  उदाहरण — तितली , पक्षियों तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते है और देखने में एकसमान लगते है , परन्तु इन सभी की उत्पति अलग – अलग ढंग से होती है।  तितलियों के पंख की रचना शरीर भित्ती के भंज द्वारा , पक्षियों के पंख की रचना इनकी अग्रपादो पर परो द्वारा, चमगादड़ के पंख की रचना हाथ की चार लम्बी अंगुलियों तःथा छड़ के बिच फैली त्वचा से हुई है।

अवशेषी अंग ( Vestigial organ )

ऐसे अंग जाप जीवो के पूर्वजो में पूर्ण विकसित होते है , परन्तु वातावरणीय परिस्थितियों में बदलाव से इनका महत्व समाप्त हो जाने के कारन विकास – क्रम में इनका कार्मिक लोप होने लगता है , अवशेषी अंग कहलाते है।  उदाहरण — कर्ण पल्लव त्वचा के बाल , बरमीफार्म एपेंडिक्स आदि। 
नोट — मनुष्य में लगभग 100 अवशेषी अंग पाए जाते है

  • सर्वप्रथम प्रकाश – संश्लेषी जीव सायनो बैक्टीरिया थे।  
  • पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है।  
  • जल – स्थलचर जीवो का विकास मत्स्य वर्ग से हुआ है।  
  • स्तनी वर्ग के जन्तुओ का विकास भी सरीसृपों से हुआ है। 
avsheshi ang
analogous organs

जीवाश्म 

अनेक ऐसे प्राचीन कालीन जीवो एवं पादपों के अवशेष , जो हमारी पृथ्वी पर विध्यमान थे , परन्तु बाद में समाप्त अथार्त विलुप्त हो गए , भू – पटल की चट्टानों में परिरक्षित मिलते है , उन्हें जीवाश्म कहते है एवं इनके अध्ययन को जीवाश्म विज्ञानं कहते है। 
जैव विकास के सिद्धांत 
जैव विकास के सम्बन्ध में अनेक सिद्धांत पृत्पदित किये गए है , जिनमे लेमार्कवाद , डार्विन वाद एवं उत्परिवर्तनवाद प्रमुख है।  

1. लेमार्कवाद ( Lamarckism )

लेमार्क का सिद्धांत 1809 ई में उनकी पुस्तक फिलोसोफी जूलॉजीक में प्रकाशित हुआ था।  इस सिद्धांत के अनुसार , जीवो एवं इनके अंगो में सतत बड़े होते रहने की प्राकृतिक प्रवृति होती है।  इन जीवो पर वातावरणीय परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ता है।  अधिक उपयोग में आने वाले अंगो  विकास अधिक एवं काम उपयोग में आने वाले अंगो का विकास काम होने लगता है।  इस ” अंगो के क्रम या अधिक उपभोग का सिद्धांत ” भी कहते है।  इस प्रकार से जीवो द्वारा उपार्जित लक्षणों की वेशगति होती है , जिसके फलस्वरूप नयी – नयी जातीय बन जाती है।  उदाहरण — जिराफ की गर्दन का लम्बा होना।  
नोट –उपार्जित लक्षणों का अध्ययन टोन्टोलॉजी कहलाता है।  

2. डार्विनवाद ( Darwinism ) 

जैव – विकास के सम्बन्ध में डार्विनवाद सर्वाधिक प्रसिद्ध है।  डार्विन को पुरावशेष का महानतम अन्वेषक कहा जाता है चार्ल्स डार्विन ने 1831 में बीगल नामक विश्व सर्वेक्षण जहाज पर पुरे विश्व का भर्मण किया था।  डार्विन के अनुसार सभी जीवो को अपनी प्रचुर संतानोत्पति की क्षमता होती है।  अतः अधिक आबादी के कारन प्रत्येक जीवो को अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति हेतु दूसरे जीओ से जीवन पर्यन्त संघर्ष करना पड़ता है।  ये संघर्ष सजातीय , अंतर्जातीय तथा पर्यावरणीय होते है।  दो सजातीय जीव आपस में बिलकुल सामान नहीं होते है।  ये विभिन्नताये जीवन संघर्ष के लिए लाभदायक होती है , जबकि कुछ अन्य हानिकारक होती है जीवो में विभिन्नताएं वातावरणीय दशाओ के अनुकूल होने पर वे बहुमुखी जीवन संघर्ष में सफल होते है।  उपयोगी विभिन्नताएं पीढ़ी – दर – पीढ़ी इकट्ठी होती रहती है और काफी समय बाद उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से इतने भिन्न हो जाते है की नयी जाती बन जाती है। 

       नव- डार्विनवाद ( Neo- Darwinism )

डार्विन के पश्चात् इनके समर्थको द्वारा डार्विनवाद को जीन वाद के ढांचे में ढाल दिया गया, जिसे नव – डार्विनवाद कहा जाता है  इसके अनुसार , किसी जाती पर कई कारको का एक  साथ प्रभाव पड़ता है, जिससे इस जाती से नयी जाती बन जाती है।  ये  कारक है – विविधता  उत्परिवर्तन  प्रकृतिवरण , जनन।  इस प्रकार नव – डार्विनवाद के अनुसार जीन में साधारणतया परिवर्तनों के परिणामस्वरूप जीवो की नयी जातीय बनती है , जिनमे जीन परिवर्तन के कारन भिन्नताएं बढ़ जाती है।  

    3. उत्परिवर्तनवाद

यह सिद्धांत वस्तुत  ( Hugo-de-Vries) द्वारा प्रतिपादित किया गया है।  इस सिद्धांत के पांच प्रमुख तथ्य निम्नवत है।  
1.  नयी जीव – जातियों की उत्पति लक्षणों में छोटी – छोटी एवं स्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी – दर – पीढ़ी  संचय एवं क्रमिक विकास के फलस्वरूप नहीं होती है , बल्कि यह उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप होती है।  
2. इस प्रकार से उत्पन्न जाती का प्रथम सदस्य उत्परिवर्तक कहलाता है।  यह उत्परिवर्तन लक्षण के लिए शुद्ध नस्ल का होता है।  
3. उत्परिवर्तन अनिश्चित होते है।  ये किसी एक अंग विशेष में  में एक साथ उत्पन्न हो सकते है।  
4. सभी जीव – जातियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृति हॉट है।  
5. जाती के विभिन्न सदस्य में उत्परिवर्तन भिन्न – भिन्न हो सकते है।  
6. उपर्युक्त उत्परिवर्तन के फलस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते है , जो जानका से इतने अधिक भिन्न हो उन्हें एक नयी जाती माना जा सके। 

utparivartan
darvin evolution
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