मोतियाबिंद : इसके लक्षण , कारण एवं इलाज। 

 
 मानव के शरीर का सबसे  महवत्पूर्ण अंग आंख होती है जिससे वह संसार  की सभी तरह की गतिविधियों  के साथ  सुंदरता का आनंद ले पाता है।  लेकिन यदि आंख में जरा सा  भी कुछ हो जाये तो मानो जान निकल जाती  है।  आँखों की देखभाल बेहद आवश्यक है  और बढ़ती उम्र के साथ तो खासकर ध्यान रखना जरूरी हो  जाता है।

 

 बढ़ती उम्र के साथ अक्सर देखा गया  है कि 50 से अधिक उम्र  के लोगो को मोतियाबिंद  की समस्या हो जाती है।
भारत में 90 लाख से लेकर एक करोड़ बीस लाख लोग दोनों आँखों से नेत्रहीन है , हर साल मोतियाबिंद के 20 लाख नए मामले सामने आते है।  हमारे देश में 62. 6 % नेत्रहीनता का कारण मोतियाबिंद है।
आइये जानते है की मोतियाबिंद के बारे में विस्तार से।
इनकी विषय सूची इस प्रकार है –
  • मोतियाबिंद क्या है ?
  • मोतियाबिंद के कारण। 
  • मोतियाबिंद के लक्षण। 
  •  मोतियाबिंद के प्रकार। 
  • मोतियाबिंद से बचने के उपाय। 
  • मोतियाबिंद का इलाज। 
मोतियाबिंद क्या है ?
मोतियाबिंद आँखों एक सामान्य रोग है।  मोतियाबिंद को अंग्रेजी में कैटरेक्ट (CATARACT ) कहा जाता है।  मोतियाबिंद आँखों की वह समस्या है जिसमे धीरे -धीरे आँखों  की रौशनी में धुंधलापन आने लगता है जिससे दिखाई देना कम हो जाता है।  मोतियाबिंद तब  होता है जब आँखों में प्रोटीन के गुच्छे जमा हो जाते है जो लैंस को रेटिना को स्पष्ट चित्र भेजने से रोकते है। रेटिना , लैंस के माध्यम से संकेतो में आने वाली रौशनी को परिवर्तित करता  है।  यह संकेत ऑप्टिक तंत्रिका को भेजता है जो उन्हें मस्तिष्क में ले जाता है।  लेंस के धुंधलेपन को मोतियाबिंद कहा जाता है।  हमारी आँखों में लेंस का मुख्य योगदान है।  लेंस लाइट या इमेज को रेटिना पर फोकस करने में सहायता करता है। रेटिना हमारी आंख के पिछले भाग में स्थित ऊतक है जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है।
रेटिना शार्प इमेज  प्राप्त करे इसके लिए जरूरी है की लेंस क्लियर हो।  जब लेंस क्लाउडी हो जाता है तो लाइट लेंसों स्पष्ट रूप से गुजर नहीं पाती जिससे जो इमेज आप देखते है वो धुंधली हो जाती है।  इसके कारण द्रष्टि के बाधित होने को मोतियाबिंद या सफ़ेद मोतिया कहते है।
मोतियाबिंद धीरे -धीरे विकसित होता है और एक  या दोनों आंखे प्रभावित कर सकता है।  इसमें फिके रंग दिखना , धुंधला दिखना , प्रकाश के चारो ओर रौशनी दिखना, रात को देखने में परेशानी हो सकते है।
मोतियाबिंद के कारण 
जैसे -जैसे हमारी उम्र  बढ़ती है  कुछ  प्रोटीनआँखों में  गुच्छे(पिंड )  बनाते है   ये पिंड मोतियाबिंद होते है और धुँधलेपर के कारण बनते है।  समय के साथ , वे बढ़ जाते है और लेंस के अधिक भाग को धुंधला  बनाते है जिससे देखना और कठिन हो जाता है।
  • डायबिटीज 
  • अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन। 
  • उच्च रक्तदाब। 
  • मोटापा। 
  • आँखों में चोट  लगना या सूजन। 
  • पहले हुई आँखों में सर्जरी। 
  • धूम्रपान। 
  • कार्टिस्टेरॉइड मोडिकेशन का लम्बे समय तक इस्तेमाल। 
  • सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक एक्सपोजर। 
मोतियाबिंद के लक्षण –
अधिकतर मोतियाबिंद धीरे -धीरे विकसित होतेहै और शुरुआत में द्रष्टि प्रभावित नहीं होती है लेकिन समय के साथ यह आपकी देखने की क्षमता को प्रभावित करता है।
  • द्रष्टि में धुंधलापन या अस्पष्टता। 
  • दिन के समय आंखे चौधियाना। 
  • रंगो को देखने की क्षमता में बदलाव क्योकि लेंस एक फ़िल्टर की तरह काम करता है। 
  • रौशनी के चारो और गोल घेरा दिखाई देना। 
  • बार -बार चश्मे का नंबर बदलना। 
  • दोहरा दिखाई देना। 
  • बुजुर्गो में निकट द्रष्टि दोष में निरंतर बढ़ोतरी। 
 मोतियाबिंद के प्रकार –
  • परमाणु मोतियाबिंद – यह  मोतियाबिंद के सबसे आम रूप है।  ये आँखों के लेंस के केंद्र में बनते है और द्रष्टि को धीरे -धीरे बिगाड़ते व प्रभावित करते  है।
  • कॉर्टिकल मोतियाबिंद –  इस प्रकार के मोतियाबिंद में लेंस के बाहरी  हिस्से में सफेद सा दिखने वाला एक थक्का हो जाता है और धीरे -धीरे केंद्र की ओर बढ़ता है।  इस प्रकार का मोतियाबिंद लेंस के आवरण में होता है जो कि केंद्रीय लेंस के चारो ओर लेंस का एक हिस्सा होता है। कॉर्टिकल मोतियाबिंद लेंस के पीछे की ओर या पीछे की सतह पर एक छोटा अपारदर्शी या धुंधले हिस्से के रूप में शुरु होता है।
  • सबकैप्सूलर मोतियाबिंद – इस   प्रकार का मोतियाबिंद पढ़ने में परेशानी और रौशनी के चारों और “प्रभामंडल ” प्रभाव और चमक पैदा कर सकता है।  जो लोग स्टेरॉयड का इस्तेमाल करते  है या मधुमेह , बहुत अधिक निकट द्रष्टि की समस्याएं से पीड़ित है।  उन्हें इस प्रकार का मोतियाबिंद हो सकता है।  सबकैप्सूलर मोतियाबिंद  तेजी से विकसित हो सकता है।  और लक्षण महीनो के भीतर दिख सकते है।
  • चोट से उतपन्न मोतियाबिंद लेंस पर कही भी बन सकते है और अक्सर फूल की पंखुड़ी या ” रोजेट ” के आकार में विकसित होते है।
मोतियाबिंद से बचने के उपाय –
  • आँखों की जाँच – 50 वर्ष की  आयु के बाद हर वर्ष आँखों की जाँच करानी चाहिए ताकि मोतियाबिंद को शुरूआती दौर में ही निदान कर रोका जा सके।  आँख से जुडी कोई भी समस्या होने पर मेडिकल से कोई चालू दवा / ड्रॉप लेने की जगह डॉक्टर से अवश्य जाँच कराना चाहिए।
  • आहार – आँखों की सेहत लम्बे समय तक अच्छी रखने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां , फल  और ANTI -OXIDANT युक्त आहार लेना चाहिए। अपने आहार में गाजर , पालक , टमाटर , सेब , संतरा  आदि का युक्त आहार लेना चाहिए।
  • चश्मा – अगर आपको कोई नबंर का चश्मा है तो डॉक्टर की सहलानुसार नियमित पहनते रहिये।  हर वर्ष आँखों के डॉक्टर से जाँच कराकर अपने  चश्मे का नबंर बढ़ा या कम तो नहीं हुआ यह देखना चाहिए। तेज धुप में जाने के लिए धुप के चश्मे का उपयोग करे।
  • रोग – अगर आपको उच्च रक्तचाप  या मधुमेह , डायबिटीज जैसा कोई रोग है तो नियमित जाँच , दवा समय के साथ कराएं।
  • नशा – अगर आपको शराब , धूम्रपान या तम्बाकू जैसे पदार्थ का नशा है तो बंद कर दे।
मोतियाबिंद का इलाज –
  1. मोतियाबिंद उपचार आपकी द्रष्टि  के स्तर पर आधारित है।  अगर मोतियाबिंद द्रष्टि को कम प्रभावित  करता है या बिलकुल नहीं करता है तो कोई इलाज की आवश्यकता नहीं होती।  मरीजों को सलाह दी जाती है की अपने लक्षणों का ध्यान रखे और नियमित चेक कराएं।
  2. जब  मोतियाबिंद इस स्तर तक आगे बढ़ जाता है की व्यक्ति को सामान्य कार्य करने की क्षमता को  प्रभावित करता है , तो सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है।  मोतियाबिंद सर्जरी में आँखों के लेंस को हटा दिया जाता है और इसे एक आर्टिफिशियल लैंस में बदल दिया जाता है।
मोतियाबिंद की  सर्जरी इस प्रकार है –
स्मॉल – इंसीजन मोतियाबिंद सर्जरी –  इसमें कॉर्निया (आंख का स्पष्ट बाहरी आवरण ) के पास एक चीरा लगाया जाता है और आँखों में एक छोटा सा औजार डाला जाता है यह औजार अल्ट्रासॉउन्ड तंरगो का उतसर्जन करता है जो लैंस नरम करता है जिससे वह टूट जाता है और उसे बाहर निकलकर बदल दिया जाता है।
 
एक्स्ट्राकैप्सूलर सर्जरी –  इसमें कॉर्निया में एक बड़ा चीरा लगाया जाता है ताकि लेंस को एक टुकड़े में  निकाला जा सके।  प्राकृतिक लैंस को स्पष्ट प्लास्टिक लेंस से बदल दिया जाता है जिसे इंट्राओक्युलर लेंस (आईओएल ) कहा जाता है।
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