डाउन सिंड्रोम के कारण , लक्षण और इलाज।

डाउन सिंड्रोम को ‘ ट्राइसोमी 21 ‘ के नाम से भी जाना जाता है यह एक आनुवांशिक विकार है।  इस विकार की वजह से विकास और बौद्धिक विकास में देरी होती है।  डाउन सिंड्रोम अमेरिका में सबसे ज्यादा होने वाला आनुवांशिक विकार है।
क्या आपने  कभी किसी बच्चे में कुछ अजीव तरह की चीजें नोटिस की है।  जैसे – बच्चे का सपाट चेहरा , छोटे कान -नाक , आँखों का तिरछापन या जीभ आदि।  अगर हाँ , तो वह बच्चा एक बीमारी से पीड़ित हो सकता है जिसे डाउन सिंड्रोम कहते है।  डाउन सिंड्रोम न सिर्फ बच्चे  शारीरिक विकास में बाधा बन सकता है बल्कि उसका मानसिक विकास भी सामान्य  बच्चे की तुलना में धीमा कर सकता है।

 

डाउन सिंड्रोम क्या है ?
 
 
 

 

 

यह एक आनुवांशिक विकार होता है। जो क्रोमोसोम 21 की तीसरी प्रतिलिपि के सभी या किसी भी हिस्से की उपस्थिति के कारण होता है।  इसमें व्यक्ति के गुणसूत्र (क्रोमोसोम ) सामान्य स्तर से अधिक हो सकते है।  डाउन सिंड्रोम वाले एक युवा वयस्क का औसत बौद्धिक स्तर 50 होता है जो 8 वर्षीय बच्चे की मानसिक क्षमता के बराबर है, लेकिन यह व्यापक रूप से भिन्न हो सकता है। . 20 वर्षीय माताओं में इसकी संभावना 0.1 % से कम होती है और 45 की उम्र में 3 % हो जाती है।  डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोगो में 46 बजाय 47 गुणसूत्र हो सकते है।  इसकी समस्या बच्चो में जन्म से ही देखी जा सकती है। पहले हम्हें यह जानना जरूरी है की एक स्वस्थ व्यक्ति की कोशिकाओं में गुणसूत्र के 23 जोड़े होते है। इस तरह हमारे शरीर में 46 जोड़े होते है।  इन 23 में 22 जोड़ों को ऑटोसोम कहा  जाता है , जो महिला व पुरुष में अलग -अलग होता है।  जहां महिलाओं के इस जोड़े में दोनों गुणसूत्र X  होता है , वहीं पुरुष के इस जोड़े में एक X गुणसूत्र होता है और एक Y गुणसूत्र होता है।  अतिरिक्त गुणसूत्र होने का असर शरीर के सभी हिस्सों पर पड़ सकता है , जिससे शिशु के विकास में बाधा उतपन्न होती है।
डाउन सिंड्रोम तब होता है जब निषेचन  के समय शिशु हर कोशिका में सामान्य से एक ज्यादा  गुणसूत्र के साथ अपनी जिंदगी शुरू करता है।
डाउन सिंड्रोम के प्रकार –
डाउन सिंड्रोम मुख्य रूप से तीन तरह के होते है –
1  फ्री ट्राइसोमी 21 : यह तब होता है जब बच्चे की कोशिका में गुणसूत्र 21 जोड़े में न होकर 3 संख्या में होते है।  लगभग 90 फीसदी मामलो में यह समस्या बच्चे की माँ की तरफ से हो सकती है  और सिर्फ कुछ ही मामलों में इसकी समस्या पिता के कारण देखी जा सकती है।
2  मोजेक ट्राइसोमी 21 – यह तब होता है जब बच्चे  की कुछ कोशिकाओं में गुणसूत्र 21 जोड़े में और कुछ में 3 की संख्या में होते है , तो उसे मोजेक ट्राइसोमी 21 कहा जाता है।  इससे ग्रस्त बच्चे में नजर आने वाले लक्षण डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चो की तरह होते है।  यह समस्या फर्टिलाइजेशन के समय कोशिका विभाजन के दौरान होने वाली गड़बड़ी के कारण हो सकती है।
3  रॉबर्टसनीयन ट्रांसलोकेशन ट्राइसोमी 21 – डाउन सिंड्रोम डिजीज का यह प्रकार सिर्फ 2 से 4 फीसदी मामलों में ही देखा  जा सकता है।  यह तब होता है जब गुणसूत्र 21 का कुछ अतिरिक्त भाग या पूरा भाग किसी दूसरे गुणसूत्र में मिल  जाता है।
डाउन सिंड्रोम के लक्षण –
 शारीरक तौर पर डाउन सिंड्रोम के लक्षण –
  • जन्म के समय मांसपेशिया का लचीलापन।
  • नाक का चपट होना।
  • सिर का आकार पीछे से सपाट होना।
  • ऊपर की ओर तिरछी आँखे होना।
  • सिर की हड्डियों के बिच अलग जोड़े होना।
  • आँख के रंगीन हिस्से पर सफेद धब्बे होना।
  • शारीरिक विकास सामान्य बच्चों की तुलना में धीमा होना।
मानसिक तौर पर डाउन सिंड्रोम के लक्षण –
  • सोचने – समझने की क्षमता का कम होना।
  • किसी बात या काम को बहुत धीमी गति से सीखना जैसे – पढ़ना , लिखना , शब्द बोलना आदि।
  • मानसिक और सामाजिक रूप से विकसित होने में समय लगना।
डाउन सिंड्रोम के कारण –
जब महिला गर्भधारण करती है , तो भ्रूण को आधे गुणसूत्र अपनी माँ से और आधे अपने पिता से मिलते है। वहीं  गुणसूत्र अच्छी तरह से विभाजित नहीं होते है , तो शिशु डाउन सिंड्रोम का शिकार हो सकता है।
  • 46 की बजाय 47 गुणसूत्र होना।
  • हर कोशिका में गुणसूत्र 21 जोड़ों में होने की जगह उससे ज्यादा होना।
  • डाउन सिंड्रोम एक जेनेटिक डिसऑर्डर है।
  • अगर माँ की उम्र 35 साल से ज्यादा और पिता की उम्र 40 से ज्यादा है तो भी डाउन सिंड्रोम होने  आशंका होती है।
  • 5 प्रतिशत से कम मामलो में यह असमानता पिता से शिशु में आती है।
डाउन सिंड्रोम का पता कैसे लगाया जाता है ?
  • प्रेगनेंसी के दौरान , एक स्क्रीनिंग टेस्ट और डायगनोस्टिक टेस्ट किया जाता है , जिसमे इस बीमारी का पता लगाया जाता है।
  • डिलीवरी के बाद , आपके बच्चे का एक ब्लड सैंपल लिया जा सकता है जिसमे 21 वे क्रोमोजोम की जाँच की जाती है।
डाउन सिंड्रोम का इलाज –
डाउन सिंड्रोम के इलाज के लिए फ़िलहाल कोई चिकित्सीय विकप्ल उपलब्ध नहीं है , हालाँकि बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्थितियों के आधार पर उन्हें उचित समर्थन की सहायता  दी जा सकती  है।  इसके लिए एनजीओ और संगठन भी शुरू किए गए है जो उचित उपचार में मददगार हो सकते है। बच्चे के शारीरक व मानसिक विकास के आधार पर निम्न कौशल सिखने में मदद कर सकते है  जैसे –
  • संवेदनात्मक विकास।
  • सामाजिकविकास।
  • भाषा और ज्ञान संबंधी विकास।
  • मोटर स्किल (चलना ,उठना , बैठना , दौड़ना आदि ).
नोट – यह ध्यान रखे की डाउन सिंड्रोम के लक्षणों का उपचार पूरी तरह से नहीं किया जा सकता है।  हालाँकि इस तरह के कार्यक्रम बच्चे की उम्र के साथ साथ इसके लक्षणों को कम करने में जरूर मदद कर सकते है।
डाउन सिंड्रोम से बचने  के उपाय –
  • जिन माता -पिता में डाउन सिंड्रोम के लक्षण है उन्हें गर्भावस्था के  दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट और डायगनोस्टिक टेस्ट कराने चाहिए।
  • गर्भावस्था की योजना बनाने व गर्भवती होने के  बाद भीं महिला को इससे जुड़ी जरूरी नैदनिक परीक्षण कराने चाहिए।
  • साथ ही डाउन सिंड्रोम फेडेरेशनऑफ़ इंडिया जैसे समूहों से मदद ले सकते है।  इस तरह के संगठन ऐसे स्पेश्ल बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए कार्यरत है।
इसमे कोई संदेह नहीं है की डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त शिशुओं का पालन -पोषण करना कठिन दायक हो सकता है।  फिर भी उनके मानसिक और सामाजिक कौशल को बेहतर बनाने की प्रक्रिया से आप एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी जीने में मदद कर सकते है।  ऐसे बच्चों  उनके  परिवार और दोस्तों से भरपूर सहयोग मिलना चाहिए।  इससे उनका मनोबल बढ़ सकता है और उनके मन में खुद की स्थिति के सकारात्मक अनुभव आ सकते है।

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