संघ ऐनेलिडा में उच्च कृमियो को वर्गीकृत किया जाता है जिनका शरीर खण्डयुक्त होता है तथा इनके शरीर में वास्तविक देहगुहा (true coelome ) पायी जाती है।  एनेलिडा शब्द की उतपत्ति लेटिन भाषा के शब्द एनिलस (Annelus ) से हुई है जिसका अर्थ होता है छोटे वलय। इस संघ में आने वाले जंतुओं का शरीर वलयाकार खण्डों का बना होता है।
संघ ऐनेलिडा (Phylum Annelida )
संघ ऐनेलिडा (Phylum Annelida )
ऐनेलिडा शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लेमाक (Lamarck ) द्वारा किया गया।  ऐनेलिडा दो ग्रीक शब्दों Annelus = Ring , eidos = form से मिलकर बना है।   1758 में लीनियस ने सभी कोमल शरीर वाले कृमियो को एक ही संघ वर्मीस में रखा था किन्तु 1801 से लैमार्क की शाखा बाइलेटेरिया (Bilateria ) की कोटि सीलोमेटा में सम्मिलित किया जाता है।  संघ ऐनेलिडा के जंतु स्थलीय तथा जलीय आवासों में पाए जाते है। इस संघ के अंतर्गत लगभग 10000 जातियां ज्ञात है।

इस संघ के जंतुओं में पाए जाने वाले प्रमुख लक्षण निम्न्लिखित है

  • इस संघ में आनेवाले जंतुओं का शरीर खण्डित लम्बा एवं कृमि के आकार का होता है।  प्रत्येक खंड वलय जैसा होने के कारण इन्हे ऐनेलिडा कहा जाता है।
  • इनका शरीर द्विपार्श्व सममित , त्रिकोरकी (triploblastic ), कृमि समान होता है।
  • संघ ऐनेलिडा में आने वाले जंतुओं का शारीरिक संगठन अंग -तंत्र स्तर का होता है।
  • प्राणियों के विकासक्रम में वास्तविक देहगुहा का उदय सर्वप्रथम इन जंतुओं में ही हुआ।
  • देहभित्ति में एक स्तरीय स्तम्भाकार कोशिकाओं की बनी अधिचर्म (epidermis ) पायी जाती है जिसके बाहर की ओर क्यूटिकल का आवरण पाया जाता है।  भीतर की और वृत्ताकार तथा अनुदैधर्य पेशियां पायी जाती है।
  • गमन के लिए काइटिनी शुक , मांसल पाशर्व पाद (Parrapodia )  या चूषक कणिकाएं पायी जाती है।
  • देहगुहा में प्रगुहिय द्रव भरा रहता है जिसमें कोशिकाएं या कणिकाएं पायी जाती है।
  • आहार नाल सरल , लम्बी नलिकाकार व पूर्ण विकसित होती है।  इनमे पाचन बहिकोशिकीय प्रकार का होता है।
  • रक्त परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का होता है।  इसमें रक्त बंद नलिकाओं में बहता है।  रक्त में हीमोग्लोबिन (haemoglobin )  या इरिथ्रोक्रूओरिन (erythrocruorin ) नामक श्वसन वर्णक पाया जाता है , जो प्लाज्मा में घुला रहता है।
  • श्वसन क्रिया आर्द्र त्वचा या पार्श्व पादों या सिर पर उपस्थित बाह्मा गिलो द्वारा होती है
  • उतसर्जन के लिए इनमे खण्डीय रूप से विन्यासित कुंडलित नलिकाकार संरचनाएं पायी जाती है जिन्हे वृक्क या नेफ्रीडिया कहते है।
  • तंत्रिका तंत्र सुविकसित होता है। इसमें एक जोड़ी प्रमस्तिष्क गुच्छक या मस्तिष्क तथा एक दोहरी अधर तंत्रिका रज्जु पायी जाती है।  तंत्रिका रज्जु के प्रत्येक खण्ड में गुच्छक पाए जाते है जिनसे पार्श्व तंत्रिकाए निकलती है।
  • इनमे सामान्य पुनरुदभवन क्षमता पायी जाती है।
  • ये उभयलिंगी या पृथकलिंगी होते है।
  • इनमे परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है। अप्रत्यक्ष परिवर्धन में लारवा पाया जाता है जो ट्रोकोफोर (trochophore ) कहलाता है।
  • इनमे विदलन सर्पिल (spiral )तथा निर्धारी (determinate ) प्रकार का होता है।
  • इस संघ के अधिकांश जंतु जलवासी होते है जो स्वच्छ एवं समुद्री दोनों प्रकार के आवासों में पाए जाते है।  कुछ जंतु स्थलवासी भी होते है जो बिलकारी होते है।
  • संवेदागो में स्पर्शक , पैलप , लैंस युक्त नेत्र , प्रकाशग्राही कोशिकाएं स्वाद कोशिकाएं पाए जाते है।
  • जनद ग्रंथियों का विकास प्रगुहिय उपकला से होता है।

संघ ऐनेलिडा के वर्गीकरण 

संघ ऐनेलिडा को प्रमुख रूप से चार वर्गो में वर्गीकृत किया जाता है।  इनमे पाये जाने गमन अंग (शुक ) ही इनके वर्गीकरण का आधार होते है।

1   वर्ग पोलिकीटा (Polychaeta )

पॉली का अर्थ  है बहुत सारे तथा कीटा का अर्थ है शुक अर्थात इस वर्ग के जंतुओं में बहुत सारे शुक पाये जाते है।

लक्षण –
  1. इस वर्ग के अधिकांश जंतु समुद्री जल में पाये जाते है।
  2. शरीर बाह्मा व आंतरिक रूप से विखण्डित होता है तथा प्रत्येक खण्ड के पार्श्व में एक जोड़ी मांसल पार्श्वपाद पाये जाते है।  पार्श्व पादों पर अनेक शुक पाये जाते है।
  3. इनमें स्पष्ट सिर पाया जाता है जिसमें स्पर्शक , पैलप , नेत्र आदि संवेदांग पाये जाते है।
  4. पर्याणिका या क्लाइटेलन का अभाव होता है।
  5. श्वसन के लिए सिर पर गिल पाये जाते है।
  6. ये पृथकलिंगी होते है तथा इनमे जनन ग्रथियाँ अस्थाई होती है।
  7. इनमे निषेचन बाह्मा होता है।
  8. परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा स्वतंत्रजीवी ट्रोकोफोर लारवा पाया जाता है।
वर्ग पॉलिकेटा , ऐनेलिडा संघ का सबसे बड़ा वर्ग है।  इस वर्ग को दो गणो में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1 ) गण – इरेनशिया (Errantia )
उदाहरण –   नेरीज (Nereis ), एफ्रोडाइट (Aphrodite ) या समुद्री चूहा (Sea mouse ), पॉलिनो (Polynoe ), सिलिस (syllis ) , ग्लाइसेरा (Glycera ), युनाइस (Eunice ), माइजोस्टोमस (Myzostomum ) आदि।
(2 ) गण – सिडेण्टेरिया (Sedentaria )
उदाहरण – कीटोपटेरस (Cheatopterus )या पेडल कृमि (Paddle worm ), एरेनिकोला(Arenicola ) या शाखा कृमि (lug worm ), सेबेलेरिया (Sabellaria ) , टेरेबेला (Terebella ), सेबेला (Sabella ) , सरपुला (Serpula ) आदि।

2 वर्ग ऑलिगोकिता (Oligochaeta )

ओलिगो का अर्थ है कुछ तथा कीटा का अर्थ है शुक अर्थात इस वर्ग के जन्तुओ में शुकों की संख्या कम होती है।

लक्षण-
  1. ये अधिकांशत : स्थलीय होते है किन्तु कुछ स्वच्छ जल में भी पाये जाते है।
  2. शरीर आंतरिक व बाह्मा रूप से खण्डित होता है।
  3. सिर, स्पर्शको , नेत्रों व पार्श्वपादो का अभाव होता है।
  4. शुकों की संख्या कम होती है तथा शुक देह भित्ति के गर्त में खंडीय रूप से विन्यासित रहते है।
  5. ये उभयलिंगी होते है।  जनद ग्रंथिया कम होती है।  वृषण अंडाशयों से आगे स्थित होते है।
  6. निषेचन कोकून के भीतर किन्तु बाह्मा प्रकार का होता है।
  7. पर्याणिका या क्लाइटेलम पाया जाता है।
  8. परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है अर्थात कोई लार्वा अवस्था नहीं पायी जाती है।
  ओलिगोकीटा को तीन वर्गो में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1 ) गण – प्लेसिओपोरा (Plesiopora )-
 
उदाहरण – डेरो (Dero ), कीटोगेस्टर (Chaetogaster ), नाएस (Nais )
(2 ) गण – प्रोसोपोरा (Prosopora )-
उदाहरण – ब्रेकीओबडेला (Branchilbdella ), लम्ब्रीकुलस (Lumbriculus )
(3 ) गण – ओपीस्थोपोरा (Opisthopora )-
उदाहरण – लम्ब्रीकस (Lumbricus ), फेरेटिमा (Pheretima ) या केचुआ , मेगास्कोलेक्स (Megascolex )

 3 वर्ग – हीरूडिनिया (Hirudinea ) – (जोंक )

 
 
लक्षण
  1. इनके शरीर में खण्डों की संख्या 33 निश्चित होती है।  प्रत्येक खण्ड रूप से कई वलयों में ुउपविभाजित रहता है।
  2. स्पष्ट बिंदु पार्श्व पादो तथा शुको का आभाव होता है।
  3. शरीर के अग्र तथा पश्च सिरों पर चूषक पाए जाते है।  पशच चूषक बड़ा व अग्र चूषक छोटा होता है।
  4. ये जंतु बाह्मा परजीवी तथा रक्तपोषी होते है।  कुछ मांसाहारी भी होते है।
  5. शरीर अत्यधिक पेशिये होता है।
  6. ये उभयलिंगी होते है।
  7. निषेचन आंतरिक होता है।
  8. परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है
  9. ये सामान्यत : जलवासी होते है।
  10. पर्याणिका या क्लाइटेलम पायी जाती है जो केवल जनन काल  में ही स्पष्ट होती है।
वर्ग हीरुडिनिया को चार गणो में वर्गीकृत किया जा सकता है 
 
(1 ) गण – एकेन्थोबडेलीडा (Acanthobdellida )-
उदारहण – एकेन्थोबड़ेला (Acanthobdella )
 
(2 ) गण – रिन्कोबडेलीडा (Rhynchobdellida )-
उदाहरण – ग्लोसिफोनिया (Glossiphonia ) या चपटी जोंक , पोंटोब्देला (Pontobdella ), पिसीकोला (Pisicola ), प्लेकोब्डेला (Plecobdella )
(3 ) गण – गनथोब्देला (Gnathobdellida ) –
उदाहरण – हीरुडिनेरिया (Hirudinaria ), हिमोपीस (Haemopis ), हिमोडिप्सा (Haemodipsa ) या स्थलीय जोंक।
(4 ) गण – फेरिन्गोबडेलिडा  (Pharyngobdellida )-
उदाहरण – एप्रोब्डेला (Eropdella ), डिना (Dina )
4  वर्ग -आर्किऐनेलिडा (Archiannelida )-  
लक्षण
  1. इस वर्ग के अधिकांश जंतु समुद्री जल में पाये जाते है।
  2. पार्श्व पाद व शुक अनुपस्थित होते है
  3. केवल आंतरिक खंडीभवन पाया जाता है।
  4. ये पृथकलिंगी होते है।  जनद ग्रंथिया बहुत होती है।
  5. इनमे तंत्रिका तंत्र अधिचर्म में स्थित होता है।
  6. इनमे परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा ट्रोकोफोर लार्वा पाया जाता है।
उदाहरण – पोलिगोडिर्यस , डाइनोफिलस (Dinophilus ) आदि। 

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