चित्तौडग़ढ़ का किला

 
 

चित्तौडग़ढ़ का किला 

चित्तौड़गढ़ का दुर्ग अजेमर से खण्डवा जाने वाले रेलमार्ग से दो सौ मील  दूर स्थित है।  यह दुर्ग समुद्र की सतह से १८५० (1850 ) फुट  ऊंचा लगभग तीन मील लम्बा और आधा मील चौड़ा है। वि. स. 770 के शिलालेख से मालूम पड़ता है की उस समय यह दुर्ग विधमान था ,यहाँ मौर्यवंश का शासक शासन करता था।  इस दुर्ग को चित्रमोरी भी कहते हैं।  इसी के नाम से यह दुर्ग चित्तौड़गढ़ कहलाता हैं।  चित्तौड़ का दुर्ग मेवाड़ी वीरों और वीरांगनाओं के त्याग और बलिदान का प्रतीक हैं।   15 वीं शताब्दी में महाराणा कुम्भा ने सुरक्षा की द्रष्टि से इस दुर्ग को सुद्रढ़ प्रचीरो से युक्त बनाया।  ‘ कीर्ति -स्तम्भ प्रशस्ति ‘ में इन द्वारो केनिर्माण का विस्तृत उल्लेख किया गया हैं।  

                                      (चित्तौड़गढ़ के द्वार) 



चित्तौड़गढ़ में अनेक द्वार हैं। द्वारो के नाम हैं – रामपोल, हनुमानपोल, चामुंडापोल, तारपोल, लक्ष्मीपोल आदि हैं।  दुर्ग में जाने  के  मार्ग  निर्माण कुम्भा ने करवाया।  चित्तौड़  कस्बे से गुजरने के बाद दुर्ग का प्रथम द्वार आता हैं जिसे पाण्डनपोल कहा जाता हैं।  पाण्डनपोल के आगे उत्तर में भैरवपोल  आता हैं यहाँ पर कल्ला और जयमल राठौड़ की छत्रियाँ बनी हुई हैं।  छत्रियों से आगे बढ़ने पर गणेशपोल, लक्ष्मनपोल और जोडनपोल आती हैं।  सभी पोलों को सुढृढ़ दीवारों से जोड़ा गया हैं। कुछ आगे चलने पर ‘रामपोल ‘ आती हैं।  इसके भीतर वीर पत्ता सिसोदिया का स्मारक बना हुआ हैं, जो 1567 में अकबर की सेना का मुकबला करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था। पत्ता सिसोदिया के स्मारक के दाहिनी ओर जाने वाली सड़क पर एक मंदिर बना हुआ हैं जिसे तुलसा माता का मंदिर कहते हैं जो एक अहाता हैं।  इस अहाते के आस -पास तोपखाने का दालान, महारानी का महल, पुरोहितों की हवेलियाँ, भामाशाह की हवेली व अन्य महल हैं। 
महाराणा कुम्भा ने इस मंदिर की मरम्मत करवाई थी। आगे बढ़ने पर त्रिपोलिया नामक द्वार आता हैं।  यहाँ कुम्भा का दर्शनीय महल हैं। त्रिपोलिया द्वार के आस -पास दो बुर्ज बने हुए हैं।  एक इसके  बाद एक खुला मैदान आता हैं जहाँ हाथीखाना बना हुआ हैं।  राजमहलों को जोड़ने वाले सँकरे मार्ग छोटे दालान आदिउस समय के स्थापत्य की विशेषताएँ थी, जो कुम्भा के महलों में दिखाई देती हैं।  



रानी पद्मिनी

चित्तौड़गढ़  के रावल रनतसिंह की अत्यंत सुन्दर रानी  पद्मिनी नामक पुत्री थी। 
चित्तौड़गढ़ के राणा रतनसिंह की पत्त्नी रानी पद्मिनी  थी।  1303 ई. में मुगल शासक अलाउद्दीन खिलजी ने दर्पण में प्रतिबिम्ब देखा और सम्मोहित कर देने वाले सौर्दंय से मोहित होकर उसे पाने के लिए लालायित हो गया इसलिए  उसने  चित्तौडग़ढ़ पर आक्रमण कर दिया। 
 
दुर्ग का घेरा लगभग 8 माह चलता रहा, दीर्घकालीन घेरे के कारण खाद्य -सामग्री का अभाव हो गया।  इस तरह रानी पद्मिनी  तथा हजारों राजपूत स्त्रियों ने जौहर रचना कर चित्ता में जलकर अपने प्राण त्याग दिए। इस तरह इसे जोहर कुंड के नाम से भी जानते है। चित्तौड़ के शासक राणा रतनसिंह तथा हजारो राजपूत लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। २६ (26 ) अगस्त १३०३ (1303 ई.) को चित्तौड़ के दुर्ग पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया।  मध्यकालीन भारत
 
                                                                                                             (कीर्ति -स्तम्भ )

कीर्ति -स्तम्भ 

कीर्ति -स्तम्भ की प्रशस्ति १४६० (1460 ) ई. की हैं l इनमें बापा, हम्मीर और कुम्भा का वर्णन किया गया हैं।

इसमें कुम्भा के गुणों , दानगुरु , शैलगुरु आदि का बोध होता  हैं l कुम्भा द्वारा रचित ग्रन्थ – चण्डीशतक , गीत गोविन्द की टीका, संगीतराज आदि की जानकारी मिलती हैं। 


                                                                                            (जैन कीर्ति स्तम्भ )

जैन कीर्ति स्तम्भ  

जैन कीर्ति स्तम्भ चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में स्तिथ हैं।  प्रथम जैन तीर्थकर आदिनाथ को समर्पित कर यह स्मारक दिगम्बर जैन  महाजन जीजाक द्वारा बनवाया गया था। 

विजय स्तम्भ

मालवा (मांडू ) के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष में महाराणा कुम्भा द्वारा चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में  9 मंजिले पर विजय स्तम्भ का निमार्ण 1440 ई. में प्रारन्भ करवाया गया जो 1448 ई. में पूर्ण हुआ l स्तम्भ की आठवीं मंजिल पर ‘अल्लाह ‘ खुदा हुआ हैं l  इसे ‘ भारतीय मूर्तिकला का विश्व कोष ‘ भी कहा जाता हैं।  

             (चित्तौडग़ढ़ मंदिर )
 
चित्तौडग़ढ़ में समिध्देश्वर मंदिर 1011 ई. से 1055 ई. के बीच मालवा के परमार राजा भोज नागर ने बनवाया था।  महाराणा मोकल ने 1428 ई. में इसका जीर्णोद्वार करवाया। 
सांवलिया जी मंदिर  : चित्तौड़गढ़ के मण्डपिया गांव में सांवलिया जी का विश्वविख्यात मंदिर स्थित हैं। यहां काले पत्थर की श्रीकृष्ण मूर्ति हैं। 
 
मीरा मंदिर : यह मंदिर चित्तोड़गढ़ दुर्ग में इंडो -आर्य शैली से निर्मित हैं। 
सतबीस देवरी मंदिर : 11 वीं सदी में बना एक भव्य जैन मंदिर, जिसमें 27 देवरियाँ होने के कारण ‘सतबीस देवरी ‘ कहलाता हैं। 
 
चित्तौड़गढ़ का कुम्भ :  8 वीं सदी में चित्तोड़गढ़ दुर्ग में श्याम मंदिर व कलिका माता जैसे विशाल मंदिरों का निमार्ण हुआ।  महामारू शैली में ये दोनों देवालय मेवाड़ में ‘मंदिर निर्माण के वास्तुशिल्प इतिहास में रेखाकिंत किया जाने वाले कोष चिन्ह के समान हैं। 


संत रैदास की छतरी: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मीरा मंदिर के सामने संत रैदास की छतरी स्तिथ हैं। 

(राणा कुम्भा महल)

महाराणा कुम्भा का परिचय: राणा कुम्भा स्वंय विद्वान था।  महाराणा कुम्भा एक कवि नाटकर तथा संगीताचार्य था। उन्होंने चार नाटक लिखे तथा संगीत विषय पर तीन प्रसिद्ध ग्रन्थ – संगीतराज, संगीत मीमांसा तथा रसिकप्रिया लिखे।  राणा कुम्भा को राजगुरू, हालगुरु, राणो रासो, परमगुरु, छापगुरु, आदि उपाधियों से अंलकृत किया गया था। राणा कुम्भा साहित्य तथा कला प्रेमी तथा। राणा कुम्भा ने चित्तौड़ दुर्ग में कीर्ति स्तम्भ बनवाया। कुम्भा ने कुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़, अचलगढ़ आदि दुर्ग बनवाए।
 
महाराणा कुम्भा की विजयों के बारे में : राणा कुम्भा ने आबू , सिरोही और बसंतगढ़ आदि पर विजय प्राप्त की। कुम्भा की सेना ने मारवाड़ की राधानी मंडौर भी अधिकार कर लिया और साथ ही गागरौन, बम्बावरा, मांडलगढ़ आदि पर विजय प्राप्त की।  राणा कुम्भा ने मेंरो दमन किया।

कुम्भा ने रणथम्भौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और साथ ही डुंगरपुर पर ही अधिकार कर लिया।  राणा कुम्भा ने मालवा तथा गुजरात की सेनाओं को पराजित किया। 

(अलाई दरवाजा )

 

अलाउद्दीन खिलजी का परिचय :      अलाउद्दीन  खिलजी का जन्म 1266 -67 ई. में हुआ था।  19 जुलाई, 1296 ई. को वह चाचा जलालुद्दीन फिरोज खिलजी की हत्या कर स्वंय सुल्तान बना।अलाउद्दीन खिलजी पराक्रमी और महत्वाकांक्षी सुल्तान था।  वह सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करना चाहता था।  अलाउद्दीन ने 1303 ई. चित्तौड़ पर विजय प्राप्त की। 
अलाउद्दीन दिल्ली का सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने दक्षिण भारत में विजय पताका फहराई। उसके दक्षिणी अभियानों का नेतृत्व सेनापति मलिक काफूर ने किया।  इसे विश्वप्रसिद्ध ‘कोहिनूर ‘ हीरा प्राप्त हुआ। 
अमीर खुसरो ने  ‘ खजाइनुल फतूह ‘ में अलाउद्दीन को ‘विश्व का सुल्तान तथा जनता का चरवाहा’ कहा हैं। चितौड़ पर विजय प्राप्त करने के बाद अलाउद्दीन का नाम खिज्राबाद रखा। रानी पद्मिनी व अलाउद्दीन की कहानी पर 1540 ई. में मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘ पद्मावत ‘ ग्रंथ की रचना की।  अलाउद्दीन ने 1303 ई. में वृत्ताकार अलाई किला बनवाया, जिसमे सात द्वार थे।  उसने क़ुतुब मीनार के प्रवेश द्वार के रूप में अलाई दरवाजा बनवाया, जो इस्लामी स्थापत्य कला का रत्न कहा जाता हैं।

मध्यकालीन भारत

चित्तौड़  पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण : चित्तौड़ का दुर्ग बड़ा महत्वपूर्ण था।  मेवाड़  बढ़ती हुई शक्ति से अलाउद्दीन खिलजी चिन्तित था। मालवा, गुजरात तथा दक्षिणी भारत को जितने के लिए चित्तौड़ पर अधिकार करना आवश्यक था।  अलाउद्दीन राजस्थान के स्वतंत्र राज्यों पर अपना अधिकार करना चाहता था। 

अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़  विजय के परिणाम : सम्पूर्ण राजस्थान पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।  राजपूतो को धन-जन भीषण हानि उठानी पड़ी।  मेवाड़ राज्य में अशांति एवं अराजकता फ़ैल गई।  उत्तरी भारत में अलाउद्दीन खिलजी की शक्ति या प्रभाव में वृद्धि हुई।

जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत

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