Chordata  शब्द की उतपत्ति ग्रीक भाषा के दो शब्दों Chorde तथा Ata से हुई है।  chorde का अर्थ रज्जुक / रस्सी तथा ata का अर्थ धारण करना। ररजुक जीवो का एक समूह होता है जिसमे कशेरुकी और कई निकट रूप से संबंधित अकशेरुकी शामिल है।
संघ कॉर्डेटा (Phylum Chordata )
इस संघ की स्थापना बैल्फोर (Balfour ) नामक वैज्ञानिक ने की थी।  इस संघ की 55000 विद्यमान एवं 25000 विलुप्त जातियां को रखा जाता है जिनके जीवन चक्र की किसी न किसी अवस्था में एक पृष्ठ रज्जु एवं एक खोखली पृष्ठ तंत्रिका तंत्र रज्जु पायी जाती है।

संघ कॉर्डेटा के प्रमुख लक्षण –

  • इनके जीवन की किसी -न – किसी अवस्था में एक पृष्ठ रज्जु अवश्य पायी जाती है।  पृष्ठ रज्जु का विकास मिसोडर्म से होता है।
  • ये जलीय तथा स्थलीय वायवीय होते है।
  • ये जंतु समतापी या समतापी होते है।
  • इनके जीवन की किसी – न – किसी अवस्था में पृष्ठ नालाकार केंद्रीय तंत्र अवश्य पाया जाता है।  भ्रूणीय विक्सा में इसका निर्माण एक्टोडर्म से होता है।  विकसित होने ओर इसके चारों ओर कशेरुक दण्ड का निर्माण होता है।
  • ये त्रिस्तरीय , प्रगुहिय , द्विपार्श्व सममित तथा अंग तंत्र स्तर का शारीरिक संगठन वाले जीव होते है।
  • इनमे पूर्ण प्रकार का पाचन तंत्र होता है।
  • कॉर्डेटा में यकृत निवाहिका तंत्र पाया जाता है।  यकृत निवाहिका तंत्र आहारनाल से पचित भोजन को अवशोषित करके यकृत तक पहुचाता है।
  • इनमे श्वसन क्लोम अथवा फेफड़ों द्वारा होता है।  इनमे श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन पाया जाता है।
  • ये एकलिंगी , आंतरिक या बाह्मा निषेचन प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष परिवर्धन वाले जंतु है।
  • कॉर्डेटा जंतुओं में पश्च गुद पूंछ पायी जाती है।
  • इनमे पूर्ण विकसित मस्तिष्क एवं तंत्रिका तंत्र पाया जाता है।
  • संघ कॉर्डेटा एक काफी बड़ा एवं महत्वपूर्ण  संघ है।
  • इनमे पूर्ण विकसित रक्त परिसंचरण तंत्र पाया जाता है जो बंद प्रकार का होता है।

संघ कॉर्डेटा का वर्गीकरण –

कॉर्डेटा को कपाल की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर दो समहू में बांटा गया है –
(I ) एक्रेनिएटा (Acraniata )
(II ) क्रेनिएटा (Craniata )

संघ कॉर्डेटा के कुछ प्रमुख वर्ग –

1 मत्स्य वर्ग (Class Pisces )

 
 
 
 
 
लक्षण –
  • इसके अंतर्गत मछलियाँ आती है जो लवणीय और मृदु जल में पायी जाती है।
  • ये सभी अनियततापी जंतु होते है।
  • इनका शरीर धारारेखित एवं बाह्मा ककाल शल्कों के रूप में होता है।
  • इनमे श्वसन क्लोम द्वारा होता है। जो जल में घुली ऑक्सीजन का प्रयोग करते है।
  • इनका हृदय द्विवेश्मी होता है और केवल अशुद्व रक्त ही पम्प करता है।
  • ये जल में अंडे देने वाले वर्टिब्रेट है।
  • कुछ मछलियो का कंकाल उपास्थियों का बना होता है।  जैसे – सार्क , स्कोलियोडन।
उदाहरण – समुद्री घोड़ा , रोहू , कतला।

2 एम्फीबिया वर्ग –

लक्षण –
  • इस वर्ग के सभी सदस्य उभयचर होते है।
  • ये असमतापी होते है।
  • इन जीवों में श्वसन फेफड़ों , त्वचा व क्लेमों तीनों के माध्यम से होता है।
  • इनके ह्रदय में तीन कक्ष होते है। इनके ह्रदय में दो अलिंद और एक निलय होते है।
  • इनके शरीर पर शल्क , बाल , पंख नहीं होते है ये त्वचीय श्वसन करते है।
  • हायला को वृक्ष मेढ़क कहते है।
उदाहरण – मेढ़क।

3 सरिसर्प वर्ग –

 
लक्षण –
  • इस वर्ग के जंतु असमतापी होते है।
  •  इन जीवों में श्वसन फेफड़ों के माध्यम से होता है।
  • ये वास्तविक स्थलीय कशेरुकी जंतु होते है।
  • ये जंतु अंडे देते है , इनके अंडे कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढके रहते है।
  • इन जंतुओं का ह्रदय सामान्यत : तीन कक्षों का होता है।
  • अपवाद मगरमच्छ का ह्रदय चार कक्ष का होता है।
  • इनकी त्वचा में एपिडर्मल शृंगी शल्क पाए जाते है।
  • इनकी त्वचा आरबीसी पायी जाती है।
  • मुख के अंदर एक विषदंत पाया जाता है।  इनमे अंत : निषेचन होता है।
उदाहरण – सांप , घड़ियाल।  छिपकली।  कछुए।

4  पक्षी वर्ग –

 
लक्षण –
  • ये समतापी जीव होते है।
  • इन जीवों में श्वसन फेफड़ो द्वारा होता है।
  • इस वर्ग के जंतुओं के अग्रपाद विकसित होकर पंखो में रूपांतरित हो जाते है।
  • इन जंतुओं के ह्रदय में चार कक्ष होते है।
  • मूत्राशय अनुपस्थित होता है।
  • जबड़ो में दांत नहीं होते , ये शृंगी होते है।
  • आमतौर पर नर में मैथुन अंग नहीं होता है।
  • ये अण्डज होते है।
  • सबसे बड़ा अंडा शुतुरमुर्ग का होता है।
उदाहरण – कौआ , कबूतर , चिड़िया ,तोता , मोर।

5  स्तनी वर्ग –

 
लक्षण –
  • इस वर्ग के सभी जंतु नियततापी /उच्चतापी होते है।
  • त्वचा पर स्वेद ग्रंथिया या तेलीय ग्रंथिया पायी जाती है।
  • इनके ह्रदय में चार कक्ष होते है।
  • इनमे बाह्मा कर्ण उपस्थित होते है।
  • इनके जीवनकाल में दो बार दन्त निकलते है।
  • इनकी RBC में केन्द्रक नहीं होता।
  • अपवाद स्वरूप ऊंट , लामा की RBC में केन्द्रक होता है।
  • मादा में पाई जाने वाली स्तन ग्रंथिया रूपांतरित त्वचीय ग्रंथिया होती है।

स्तनी वर्ग को तीन उपवर्गों में बांटा गया है –

(i ) प्रोटोथीरिया – इनके कई लक्षण सरीसृपों की तरह होते है।  बाह्मा कर्ण अनुपस्थित होते है।  अण्डे देने वाले स्तनी धारी होने की वजह से इन्हे ओवीपेरिस कहा जाता है –
जैसे  एकिडना , ड़कीबल , प्लैटिपस आदि।
(ii ) मेटाथीरिया – ऐसे जंतु न तो अंडे देते है और न ही पूर्ण विकसित बच्चे को जन्म देते है।  ऐसे बच्चे का विकास माता के उदर में स्थित माक्सीपियल थैली में होता है।  इनके शरीर का तापमान हेमशा एक समान रहता है।  ये एकदन्ती होते है।
जैसे – कंगारू , डाइडेलफिस आदि।
(iii ) थूथीरिया – इसमें उच्चवर्ग के स्तनधारी सम्मिलित होते है।  इनमे आंतरिक निषेचन होता है।  इनमे खोपड़ी की अस्थियो के बीच धारियां स्पष्ट होती है।
जैसे – चूहा , खरगोश , कुत्ता , हाथी , मनुष्य , पेगालीन आदि।

महत्वपूर्ण तथ्य –

  • हिप्पोकैम्पस एक समुद्री मीन है तथा इसे समुद्री घोड़ा कहते है क्योंकि यह देखने में एक छोटे घोड़े जैसा लगता है।
  • रोहू मछली का वैज्ञानिक नाम लेबिओ रोहिता (Labeo Rohita ) है।
  • मांगुर को कैटफ़िश के नाम से जाना जाता है।  इसका वैज्ञानिक नाम Clarias Batrachus ) है।
  • शार्क या स्कोलियोडोन को डॉगफिश तथा टॉरपीडो को इलेक्ट्रिक रे के नाम से जाना जाता है।
2 thoughts on “Chordata- कॉर्डेटा के लक्षण, वर्गीकरण और इसके प्रमुख उपवर्ग”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Exit mobile version