संघ आर्थोपोडा (Phylum Arthopoda ) का वर्गीकरण और उनके लक्षण  

आर्थो का अर्थ है है – संधियुक्त तथा पोडा का अर्थ है उपांग अर्थात संधित उपांग वाले जंतुओं  जगत का सबसे बड़ा संघ है।  इस संघ की स्थापना 1845 में वॉन सीलोब्ड (Von Siebold ) ने की थी।

संघ आर्थोपोडा (Phylum Arthopoda )
संघ आर्थोपोडा (Phylum Arthopoda )
इसमें जंतु जगत की कुल ज्ञात जातियों की 88 से 90% जातियां सम्मिलित की जाती है।  जो पर्वत की उचांईया से लेकर समुद्र में 8 km की गहराई तक पाये जाते है।
  • इस संघ के जंतु त्रिस्तरीय , द्विपाशर्वसममित , प्रगुहिय , विखण्डी रूप से खण्डयुक्त होते है।
  • इनका शारीरिक संगठन अंग तंत्र स्तर तक का होता है।
  • इनमें काइटिनी क्यूटिकल का बाह्मा कंकाल पाया जाता है जो समय -समय पर नवीनीकृत किया जाता है।
  • इनमें विभिन्न कार्यो के लिए खण्डयुक्त या संधियुक्त उपांग पाये जाते है।
  • इनका शरीर सिर , वक्ष एवं उदर में विभक्त होता है।
  • इस संघ के जंतु जल , थल  एवं वायु तीनों जगहों पर पाए जाते है।
  • इनमें देहगुहा एक रुधिर गुहा होती है जो रक्तवाहिनियों के मिलने से बनी है।
  • इनमे आहरनाल पूर्ण होती है।  मुख  के चारो और मुखांग होते है जो जंतु के आवश्यकतानुसार छेदने , चूसने या चबाने के लिए अनुकूलित होते है।
  • इनमे खुला रुधिर तंत्र होता है।
  • इनमे अधिकांशत: पेशिया रेखित प्रकार की होती है जो शीघ्र संकुचन करने में सक्षम होती है।
  • इनमे परिसंचरण खुले प्रकार का होता है। इनमे पृष्ठ ह्रदय , धमनियां तथा रुधिर कोटर पाए जाते है।
  • श्वसन अंग सुविकसित होते है।  श्वसन सामान्य देह सतह , गिल , श्वास नलिकाओं या पुस्त -फुफ्फुसों द्वारा होता है।
  • इनमें उतसर्जन के लिए हरित ग्रंथिया (green glands ), कक्षीय ग्रंथिया (coxal glands ) पाए जाते है।
  • इनमे तंत्रिका तंत्र ऐनेलिडा के समान होता है।  इनमे तंत्रिका तंत्र वल्य तथा दोहरी अधर तंत्रिका रज्जु पायी जाती है।
  • इनमे संवेदी अंगो में सरल नेत्रों , संयुक्त नेत्र , स्पर्शग्राही होते है।
  • इनमे नर व मादा पृथक -पृथक होते है। कभी -कभी लैंगिक विभेदन भी पाया जाता है।
  • इनमे युग्मित जननांग तथा जनन वाहिकाएं पायी जाती है।
  • इनमे निषेचन प्राय: आंतरिक होता है।
  • ये अंडप्रजक या शिशुप्रजक होते है।
  • इनमे परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है कुछ में अनिषेकजनन भी पाया जाता है।
  • इनमें सिलिया का पूर्णतया अभाव होता है।

संघ अर्थोपीडा का वर्गीकरण 

आर्थोपोडा को तीन उपसंघो में विभक्त किया गया है –

1  उपसंघ – ट्राईलोबाइटामोर्फा (Trilobitomorpha )-

classification of Arthopoda/ Trilobitomorpha
classification of Arthopoda/ Trilobitomorpha

लक्षण –
  • इस उपसंघ के सभी जंतु समुद्री जल में पाये जाते थे तथा अब विलुप्त हो चुके है।
  • इनका शरीर प्रोसोमा तथा ओपीस्थोसोमा में बांटा जा सकता था।
  • एक जोड़ी बहुखण्डीय शृंगिकाएँ पायी जाती थी।
  • इनका शरीर अण्डाकार तथा त्रिपालिदार होता था।
  • शरीर के सभी खंडो में अविशिष्टीकृत उपांग होते थे।
उदाहरण – एगनोसट्स (Agnostus ), ट्राईआर्थस (Triarthrus ) आदि।

2  उपसंघ – केलिसेराटा (Chelicerata )-

classification of Arthopoda/ Chelicerata
classification of Arthopoda/ Chelicerata
 
लक्षण –
  • इनमे शरीर दो भागों में विभक्त होता है।  अग्र भाग सिरोवक्ष या अग्रकाय (cepholothorax or prosoma ) तथा पशच भाग उदर या अनुकाय कहलाता है।
  • इनमें शृंगिकाओ का अभाव होता है।
  • मुख्पूर्वी प्रथम जोड़ी उपांग नखर युक्त अशनकारी केलिसेरी होते है तथा मुख पशच उपांग पद -पैलप कहलाते है।
इस उपसंघ को तीन वर्गो में वर्गीकृत किया जाता है –
(i ) वर्ग – मीरोस्टोमेटा (Merostomata )
लक्षण –
  • इस वर्ग के जंतु समुद्री जलवासी होते है।
  • इनके मध्यकाय में 4 से 6 जोड़ी उपांग पाए जाते है।
  • इनमे श्वसन के लिए गिल पाए जाते है।
  • इनका उदर एक तीक्ष्ण पुच्छ खण्ड के रूप में समाप्त होता है।
  • इनमे सुविकसित संयुक्त नेत्र पाए जाते है।
उदाहरण – लीमुलस (Limulus ) या किंग क्रेब (यह इस वर्ग का एक मात्र जीवित सदस्य है शेष सभी विलुप्त हो चुके है। )
(ii ) वर्ग – अरेक्निडा (Arachinda )-
लक्षण –
  • ये स्थलिय या जलीय होते है।
  • सिरोवक्ष में दो केलिसेरी , दो पदपेलप तथा चार जोड़ी टांगे पायी जाती है।
  • इनके उदर में उपांगो का अभाव होता है।
  • इनमे श्वसन  के लिए श्वास नलिकाएँ या पुस्त फुफ्फुस पाये जाते है।
  • इनमे सरल नेत्र पाये जाते है।
  • इनमे उतसर्जन के लिए कक्षांगी ग्रंथिया या मेल्पीजियन नलिकाएं पायी जाती है।
  • ये अंडप्रजक या शिशुप्रजक हो सकते है।
उदाहरण – बूथस (Buthus ) , पेलेमनियस (Palamnaeus )( ये वास्तविक बिच्छू भी कहलाते है ) , गेलिओडीस (Galeodes ) या सूर्य या वायु मकड़िया , लाइकोसा (Lycosa ) या भेड़िया आदि।
(iii )  वर्ग –  पिक्नोगोनिडा (Pycnogonida )-
लक्षण –
  • इस वर्ग के सदस्यों को सामान्यत: समुद्री मकड़िया कहते है।
  • इनमे एक स्पष्ट तुण्ड (Proboscis ) पायी जाती है।
  • इनमे उदर अत्यधिक समानीत होता है।
  • इनमे केलिसेरी छोटे होते है तथा पदपेलप खण्डयुक्त होते है।
  • नर में तीसरी जोड़ी टांगे अण्डो को धारित करती है तथा ओविजर (oviger ) कहलाती है।
  • इनके शिशु अकशेरुकी प्राणियों पर परजीवी होते है।
उदाहरण – निम्फोन (Nymphon ) तथा पिक्नोगोनेम (Pycnogonum )

3 उपसंघ – मेंडीबुलेटा (Mandibulata )

classification of Arthopoda/ Mandibulata
classification of Arthopoda/ Mandibulata

लक्षण –
  • इनका शरीर तीन भागो में बंटा होता है सिर , वक्ष एवं उदर।  कई जंतुओं में सिर व वक्ष संगलित होकर सिरोवक्ष का निर्माण करते है।
  • सिर के उपांगो में एक या दो जोड़ी शृंगिकाएँ , एक जोड़ी जबड़े या मैंडिबल तथा दो जोड़ी जम्भिकाएँ होती है।
  • इनमे संयुक्त नेत्र पाये जाते है।
  • इनके उपांग द्विशाखित प्रकार के होते है तथा विभिन्न कार्यो के लिए रूपांतरित होते है।
  • इनमे श्वसन गिल , त्वचा या श्वास नलिकाओं द्वारा होता है।
इस उपसंघ को छ : वर्गो में बांटा गया है –
(i ) वर्ग – क्रस्टेशिया (Crustacea )-
लक्षण –
  • ये जलीय आवास में रहते है।
  • इनका शरीर प्राय : दो भागो में सिरोवक्ष तथा उदर में बंटा होता है।
  • इनका बाह्मा कंकाल कठोर होता है तथा सिरोवक्ष का बाह्मा संगलित होकर पृष्ठवर्म का निर्माण करता है।
  • इनके उपांग द्विशाखित होते है तथा विभिन्न कार्यो  के लिए रूपांतरित होते है।
  • इनमें श्वसन देहभित्ति या गिलो द्वारा होता है।
  • उतसर्जन के लिए कक्षीय ग्रंथिया या हरित ग्रथियाँ पायी जाती है।
  • नर व मादा पृथक -पृथक होते है तथा लैंगिक विभेदन  पाया जाता है।
  • ये अंडप्रजक होते है।
  • इनमें परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा विभिन्न प्रकार के लार्वा पाए जाते है।
इस वर्ग  को आठ उपवर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
(I )   उपवर्ग – सिफेलोकेरिडा (Cephalocarida )
लक्षण –
  • इनमे द्वितीय  जोड़ी जंभिकाओं के बाद सभी उपांग संरचना में समान होते है।
  • उपांगो के बही: पदांश अखण्डित व पत्ती समान होते है तथा इन पर कूटअधिपदांश (epipodites ) पाये जाते है।
  • नेत्र अनुपस्थित होते है।
  • ये समुद्री जल में पैंदे पर पाए जाते है।
उदाहरण – हचिनसोंनिएला (Hutchinsoniella )
(II ) उपवर्ग -ब्रेंकिओपोडा (Branchiopoda )
लक्षण –
  • सभी उपांग संरचना में समान तथा पत्ती समान होते है।
  • केरापेस या तो अनुपस्थित होता है या द्विकपाटी या शील्ड समान होता है।
  • एक जोड़ी खण्डयुक्त या अखण्डित पुच्छीय कटिकाएँ पायी जाती है।
  • मेंदीबुलर पेलप अनुपस्थित होते है या अवशेषी प्रकार के होते है।
उदाहरण – ब्रैंकिपस (Branchipus ), आर्टेमिया (Artemia ), डेपिन्या (Daphnia )आदि।(III ) उपवर्ग – आस्ट्रेकोंडा (Ostracoda )
लक्षण –

  • ये स्वच्छ जल में पाए जाते है।
  • इनका पृष्ठवर्म द्विकपातीय होता है।
  • इन्हे सामान्तया बीज श्रिम्प कहते है।
  • इनमे नेत्र उपस्थित या अनुपस्थित हो सकते है।
  • नर बहुत कम पाए जाते है तथा इनमे द्वितीय जोड़ी शृंगिकाएँ मैथुन क्रिया में सहयोगी होती है।
उदाहरण – साइप्रिस (Cypris ), साइथेरेला (Cytherella ) आदि।
(IV ) उपवर्ग – माएस्टेकोकेरिडा (Mystacocarida )
 
लक्षण –
  •  इनका शरीर लम्बा होता है तथा स्पष्ट शीर्ष उपांग पाए जाते है।
  • धड़ 15 खण्डों का बना होता है।
  • दो पुच्छीय कटिकाएँ पायी जाती है।
  • संयुक्त नेत्र अनुपस्थित होते है। मध्यवर्ती नेत्र पाया जाता है।
उदाहरण – डीरोकीलोकेरिस (Derocheilocaris )
(V ) उपवर्ग – कॉपीपोडा (Copepoda )
 
लक्षण –
  • इनका शरीर स्पष्ट रूप से खण्डो में विभक्त होता है।
  • ये स्वच्छ जलवासी या समुद्री जलवासी या परजीवी होते है।
  • इनमे पांच जोड़ी उपांग पाये जाते है जिनमे से पश्च चार जोड़ी उपांग द्विशाखित होते है।
  • संयुक्त नेत्र सामान्यता अनुपस्तिथ होते है , केवल एक मध्यवर्ती नेत्र पाया जाता है।
  • एक जोड़ी पुच्छीय कंटिकाये पायी जाती है।
  • उदरीय उपांग अनुपस्थित होते है।
उदाहरण – साइक्लोप्स (Cyclops ), केलेनस (Calanus ), केलिगस (Caligus ) आदि।
(VI ) उपवर्ग – ब्रेंकियूरा (Branchiura )
 
लक्षण –
  • ये स्वच्छ जलवासी  या समुद्री जलवासी या मछलियों की त्वचा एवं गिल कोष्ठो के बाह्मा परजीवी होते है।
  • शरीर पृष्ठ से प्रतिपृष्ठ की तरफ चपटा होता है।
  • इनमे चूषणीय मुख पाया जाता है।
  • पृष्टवर्म चौड़ा होता है जो सिरोवक्ष का ढके रहता है।
  • उदर छोटा , द्विपालित तथा खण्डविहीन होता है।
  • संयुक्त नेत्र पाए जाते है जो अगतिशील होते है।
  • मादा जंतुओं में केवल एक अण्डाशय पाया जाता है जबकि नर जंतुओं में एक जोड़ी वृषण पाये जाते है।
उदाहरण – अरगूलस (Argulus )
(VII ) उपवर्ग – सिरिपीडिया (Cirripedia )
 
लक्षण –
  • इस उपवर्ग के सभी जंतु समुद्री जल में पाए जाते है तथा स्थिर होते है।
  • शरीर अस्पष्ट रूप से खण्डित होता है।  उदर अनुपस्थित होता है।
  • वयस्क जंतुओं में शृंगिकाओं तथा नेत्रों का अभाव होता है।
  • प्रावार सम्पूर्ण शरीर को ढके रखता है तथा कैल्शियम कार्बोनेट की कंकाली प्लेटें पायी जाती है।
  • ये उभयलिंगी होते है
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।
उदाहरण – लिपस (Lepas ), बेलेनस (Balanus ) या एकॉर्न बार्नेकल , सेकुलाइना (Sacculina ) आदि।
(VIII ) उपवर्ग – मेलाकोस्ट्रेका (Malacostraca )
 
लक्षण –
  • शरीर सिर , वक्ष एवं उदर में बंटा होता है।
  • उदर में पुच्छीय कंटिकाओ का अभाव होता है।
  • सिर तथा वक्ष पृष्ठवर्म द्वारा ढके रहते है।
  • संयुक्त नेत्र पाये  जाते है।
  • शरीर के प्रत्येक खंड में एक जोड़ी उपांग पाए जाते है जो विभिन्न कार्यो के लिए रूपांतरित होते है।  यह वर्ग क्रस्टेशिया का सबसे बड़ा उपवर्ग है।  इसमें पांच अधिगण तथा 10 गण सम्मिलित किये जाते है।
उदाहरण – निबेलिया (Nebalia ), स्किवला (Squilla ), माइसिस (Mysis ), पेलीमोन (Palaemon ), हिप्पा (Hippa ) , युपेगुरस (Eupagurus ) आदि।
(ii ) वर्ग – डिप्लोपोडा (Diplopoda )


लक्षण –

  • इनका शरीर लम्बा , बेलनाकार व कृमि समान होता है।
  • शरीर सिर , वक्ष एवं उदर में विभक्त रहता है।
  • सिर पांच खण्डो का , वक्ष चार खंडो का तथा उदर 20 से 100 खण्डो का बना होता है।
  • सिर में एक जोड़ी शृंगिकाये , एक जोड़ी मैंडिबल तथा एक जोड़ी जम्भिकाये पायी जाती है।
  • वक्ष के प्रत्येक खंड में एक जोड़ी टांगे तथा उदर के प्रत्येक खण्ड में दो जोड़ी टांगे पायी जाती है।
  • ये नम स्थलीय आवास में पाए जाते है।
इसे दो उपवर्गों में बांटा जा सकता है –
(I ) उपवर्ग -सेलेफ़ोगनैथा (Pselaphognatha )
उदाहरण – पॉलिजिनस (Polyxenus )
(II ) उपवर्ग – किलोगनैथा (Chilognatha )
उदाहरण – प्लेटिडेस्मस (Platydemus ), पॉलिजोनियम (Polyzonium ), पॉलिडेस्मस (Polydesmus ), जुलस (julus ) इन्हे सहस्रपादि भी कहते है।
(iii ) वर्ग – किलोपोडा (Chilopoda )
 
लक्षण –
  • इनका शरीर लम्बा , बेलनाकार , कृमि समान तथा पृष्ठ से प्रतिपृष्ठ की तरफ चपटा होता है।
  • शरीर सिर व धड़ में विभक्त रहता है।
  • सिर में एक जोड़ी शृंगिकाएँ , एक जोड़ी मैंडिबल तथा दो जोड़ी जम्भिकाये पायी जाती है।
  • धड़ के प्रत्येक खण्ड में एक जोड़ी टांगे पायी जाती है।
  • प्रथम जोड़ी टांगे विष नखरो के रूप में रूपान्तरित होती है।
  • ये नम स्थलीय आवास में पाए जाते है।
  • इनमे श्वसन के लिए श्वास नलिकाएं पायी जाती है।
  • इनमे उतसर्जन एक या दो जोड़ी मेलपीघी नलिकाओं द्वारा होता है।
  • परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है।
उदाहरण – स्कोलोपेन्ड्रा (Scolopendra ), लिथोबियस (Lithobius ) तथा स्कुटीजेरा जिन्हे शतपादि भी कहते है।
(iv ) वर्ग – पॉरोपोडा (Pauropoda )
 
लक्षण –
  • ये आकार में छोटे रहते है।
  • शरीर में सिर स्पष्ट होता है तथा धड़ 12 खण्डो  का बना होता है।
  • धड़ के प्रत्येक खंड में एक जोड़ी टांगे पायी जाती है।
  • शृंगिकाये त्रिकशाभि प्रकार की होती है।
  • नेत्र अनुपस्थित होते है।
  • ये मृतोपजीवी होते है।
  • श्वसन अंग व ह्रदय का अभाव होता है।
उदाहरण – पोरोपस (Pauropus )
(v ) वर्ग – सिम्फाईला (Symphyla )
 
लक्षण –
  • ये आकार में छोटे होते है।
  • स्पष्ट सिर व धड़ पाया जाता है।  धड़ में 12 या 14 खंड पाए जाते है।
  • धड़ के प्रत्येक खण्ड में एक जोड़ी टांगे पायी जाती है।
  • शवासनलिकाएं केवल अग्र भाग में ही पायी जाती है।  श्वसन छिद्र केवल सिर में पाये जाते है।
उदाहरण – सिम्फाईलैला (Symphylella ), स्कुटीजेरेला (Scutigerella )
(vi ) वर्ग – इन्सेक्टा (Insecta )
यह संघ आर्थोपोडा का सबसे बड़ा वर्ग है। 
 
लक्षण –
  • शरीर सिर , वक्ष एवं उदर में बंटा होता है।
  • सिर छ : भ्रूणीय खण्डो में संग्लन से बना होता है।  वक्ष में तीन खण्ड तथा उदर में 11 खण्डो से अधिक नहीं होते है।
  • सिर में एक जोड़ी शृंगिकाये एक जोड़ी मैंडिबल , दो जोड़ी जम्भिकाये पायी जाती है।
  • इनके मुखांग विभिन्न प्रकार के पोषण के लिए उपयुक्त होते है।
  • वक्ष में तीन जोड़ी टांगे पायी जाती है अत : इन्हे हेक्सापोडा भी कहते है।  वक्ष में दो जोड़ी पंख भी पाये जाते है (कुछ अनुपस्थित होते है )
  • उदर में उपांग नहीं होते है।
  • इनके रक्त में श्वसन वर्णक का अभाव होता है अत : रक्त रंगहीन होता है (केवल काइरोनोमस लार्वा को छोड़कर जिसके रक्त में हीमोग्लोबिन पाया जाता है)
  • श्वसन के लिए शवासनलिकाओ का जाल पाया जाता है।
  • उतसर्जन मेलपीजियन नलिकाओं द्वारा होता है।
  • लिंग पृथक होते है।  निषेचन आंतरिक होता है।
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष होता है।
इनको दो उपवर्गों में बांटा गया है –
(I ) उपवर्ग – एप्टेरिगोटा (Apterygota )
 
लक्षण –
  • इस उपगण के सदस्यों में पंखो का अभाव होता है।
  • ये आदिम प्रकार के कीट होते है।
  • इनमे कायान्तरण नहीं पाया जाता है।
उदाहरण – लेपिस्मा (Lepisma ) या रजतमीन (Silver fish ), स्प्रिंग टेल्स (Spring tails ), स्नो फ्लाइज (Snow files )
(II ) उपवर्ग – टेरिगोटा (Pterygota )
 
लक्षण –
  •  इस उपवर्ग के वयस्कों में पंख पाए जाते है जो कुछ द्वितीयक रूप से अनुपस्थित होते है।
  • इनमे पूर्ण या अपूर्ण कायान्तरण पाया जाता है।
इस उपवर्ग को दो प्रभागों में वर्गीकृत किया जाता है –
(A ) एक्सोपटेरिगोटा (Exopterygota )
(B ) एन्डोप्टेरिगोटा (Endopterygota )
उदाहरण – एफिमेरा (Ephemera ), ड्रेगन मक्खी (Dragon fly ), केरोसिअस (Carausius ) या स्टिक कीट आदि।

4   उपसंघ – टारडीग्रेडा (Tardigrada )

classification of Arthopoda/ Tardigrada
classification of Arthopoda/ Tardigrada
लक्षण –
  • ये जलीय जंतु होते है।
  • ये जंतु लगभग एक मी. मि. लम्बे होते है।
  • बाहर से  शरीर के खण्ड अस्पष्ट होते है।
  • चार जोड़ी असंधित उपांग पाये जाते है।
उदाहरण – इकाईनिस्कस (Echiniscus )  या वाटर बियर।

5  उपसंघ – अनिकोफोरा (Onychophora )

classification of Arthopoda/ Onychophora
classification of Arthopoda/ Onychophora
लक्षण –
  • शरीर लम्बा कृमि समान होता है।
  • स्पष्ट सिर पाया जाता है।
  • शरीर में खण्ड अस्पष्ट होते है।  खण्डो की उपस्थिति का पता युग्मित टांगो से लगता है।
  • सिर पर एक जोड़ी शृंगिकाये , एक जोड़ी मुख पेपिला तथा एक जोड़ी सरल नेत्र पायें जाते है।
  • शरीर पर 14 से 44 जोड़ी छोटी नखर युक्त टांगे पायी जाती है।
  • श्वसन श्वसन नलिकाओं द्वारा होता है।
  • उतसर्जन वृक्कों द्वारा होता है।
  • जनन वाहिकाओं में सिलिया पाये जाते है।
  • निषेचन आंतरिक होता है तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है।
  • ये मांसाहारी तथा शिशुप्रजक होते है।
उदाहरण -परिपेटस (Peripatus ) – इसे संघ ऐनेलिडा तथा आर्थोपोडा के बीच की योजक कड़ी माना जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य 

  • झींगा एक जलवासी जंतु है जो खाने में इस्तेमाल किया जाता है।
  • केंकड़ा जल में रहने वाला एक जंतु है जिसका वैज्ञानिक नाम कार्सिनस है।  यह भी मनुष्यो द्वारा भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • टिड्डा एक कीट है जो विश्व के प्राय : सभी देशो में पाया जाता है।  यह फसलनाशक जीव है।
  • बिच्छू एक साधारण स्थलचर जंतु है जिसका वैज्ञानिक नाम पेलामिनियस है।  इसमें विष ग्रंथि होती है।
  • गोजर शतपादवाली एवं स्थलवासी जंतु है जिसका वैज्ञानिक नाम स्कोलोपेन्ड्रा है।
  • परिपेट्स को ऐनेलिडा एवं आर्थोपोडा संघ का योजक कड़ी कहा जाता है।
  • इस संघ का सबसे बड़ा वर्ग कीटवर्ग है।

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