मानव का तंत्रिकीय तंत्र 

 
मानव का तंत्रिकीय तंत्र
मानव का तंत्रिकीय तंत्र

मानव का तंत्रिका तंत्र दो भागों में विभाजित होता हैं। 
(क ) केंद्रीय तंत्रिका     (ख) परिधीय तंत्रिका तंत्र।

(क ) केंद्रीय तंत्रिका – 

  इस तंत्र में मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु सम्मिलित हैं , जहाँ सूचनाओं का संसाधन एवं नियंत्रण होता हैं। मस्तिष्क एवं परिधीय तंत्रिका तंत्र सभी तंत्रिकाओं से मिलकर बनता हैं , जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क व मेरुरज्जु ) से जुड़ी होती हैं।

परिधीय तंत्रिका तंत्र में दो प्रकार की तंत्रिकायें होती हैं –

(अ) संवेदी या अभिवाही।
(ब) चालक / प्रेरक या अपवाही।

(ख) परिधीय तंत्रिका तंत्र-

 यह तंत्र भी दो भागों में विभाजित होता हैं कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र।

मानव मस्तिष्क

मस्तिष्क हमारे शरीर का केंद्रीय सुचना प्रसारण अंग हैं और या आदेश व नियंत्रण तंत्र की तरह कार्य  करता हैं।  यह ऐच्छिक गमन के शरीर के संतुलन , प्रमुख अनेच्छिक अंगो के कार्य ( जैसे फेफड़े , हृदय , वृक्क आदि ) , तापमान नियंत्रण , भूख एवं प्यास , परिवहन , अनेक अंत : स्त्रावी ग्रंथियों की क्रियाएं और मानव व्यवहार का नियंत्रण करता हैं। यह देखने , सुनने , बोलने की प्रक्रिया , याददाश्त , भावनाओं और विचारों का भी स्थल हैं।
मानव मस्तिष्क खोपड़ी के द्वारा अच्छी तरह सुरक्षित रहता हैं।  खोपड़ी के भीतर कपालीय मेनिजेन्ज से घिरा होता हैं , जिसकी बाहरी परत ड्यूरा मैटर , बहुत पतली मध्य परत एरेक्नॉइड और आंतरिक परत पाया मैटर (जो कि मस्तिष्क ऊतकों के सम्पर्क में होती हैं ) कहलाती हैं।

मस्तिष्क को 3 मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता हैं –
(1 ) अग्र मस्तिष्क
(2 ) मध्य मस्तिष्क
(3 ) पशच मस्तिष्क

(1 ) अग्र मस्तिष्क :-

अग्र मस्तिष्क सेरिब्रम , थेलेमस और हाइपोथेलेमस का बना होता है  सेरिब्रम (प्रमस्तिष्क ) मानव मस्तिष्क का एक बड़ा भाग बनता है। प्रमस्तिष्क को दो भागों , दाएं व बाएं प्रमस्तिष्क गोलार्द्धों में विभक्त करती हैं।  ये गोलर्द्ध तंत्रिका तंतुओं की पट्टी कार्पस केलोसम द्वारा जुड़े होते हैं।

प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध को कोशिकाओं को एक परत आवरित करती है , जिसे प्रमस्तिष्क वल्कुट कहते है।  प्रमस्तिष्क वल्कुट को इसके धूसर रंग के कारण धूसर द्रव्य कहा जाता है।  प्रमस्तिष्क वल्कुट में प्रेरक क्षेत्र , संवेदी भाग और बड़े भाग  होते है जो न तो प्रेरक क्षेत्र होते है न  ही संवेदी।  ये भाग सहभागी क्षेत्र कहलाते है।  इस पथ के रेशे माइलिन आच्छद से आवरित रहते हैं जो कि प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध का आंतरिक भाग बनाते हैं। ये इस परत को सफेद अपारदर्शी रूप प्रदान करते है जिसे श्वेत द्रव्य कहते हैं।  प्रमस्तिस्क थेलेमस नामक सरंचना के चारो ओर  लिपटा होता हैं जो कि संवेदी और प्रेरक संकेतो का मुख्य संर्पक स्थल हैं।

 

मानव मस्तिष्क का (सेजिटल) काट
मानव मस्तिष्क का (सेजिटल) काट

 

हाइपोथेलेमस में कई केंद्र होते है , जो शरीर के तापमान , खाने और पिने का नियंत्रण करते है।  इसमें कई तंत्रिका कोशिकायें भी होती हैं जो हाइपोथेलेमिक हार्मोन का स्त्रवण करती हैं।  प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध का आंतरिक भाग और अंदरूनी अंगो जैसे एमिगडाला , हिप्पोकैंपस आदि का समूह मिलकर एक जटिल संरचना का निर्माण करता हैं , जिसे लिंबिकलोब या लिंबिक तंत्र कहते हैं।  यह हाइपोथेलेमस के साथ मिलकर लैंगिक व्यवहार , मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति (जैसे उत्तेजना , ख़ुशी , गुस्सा और भय) आदि का नियंत्रण करता हैं। 
 

(2 ) मध्य मस्तिष्क:- 

 मध्य मस्तिष्क अग्र मस्तिष्क के थैलेमस / हाइपोथेलेमस तथा पश्च्च मस्तिष्क के पोंस के बीच स्थित होता है। एक  नाल प्रमस्तिष्क तरल नलिका मध्य मस्तिष्क से गुजरती है।  मध्य मस्तिष्क का ऊपरी भाग चार लोबनुमा उभारों का बना होता है जिन्हें कोप्रोरा कवाड्रीजमीन कहते हैं।  मध्य मस्तिष्क और पशच मस्तिष्क , मस्तिष्क स्तंभ बनाते हैं।  

 

(3 ) पशच मस्तिष्क:- 

  पशच मस्तिष्क पोस, अनुमस्तिष्क और मध्यांश (मेड्यूला ओब्लॉगेल्टा )  बना होता है।  पोंस रेशेनुमा पथ का बना होता है जो कि मस्तिष्क के विभिन्न  भागों को  आपस में जोड़ते हैं।  अनुमस्तिष्क की सतह विलगित होती है जो न्यूरोन्स को अतिरिक्त स्थान प्रदान करती है।  मस्तिष्क का मध्यांश मेरुरज्जु से जुड़ा होता है।  मध्यांश में शवसन , ह्रदय परिसंचारी परिवर्तन और पाचक रसो के स्त्राव के नियंत्रण केंद्र होते हैं। 




नेत्र :- 

हमारे एक जोड़ी नेत्र खोपड़ी में स्थित अस्थि गर्तिक , जिसे नेत्र कोटर कहते है , में स्थित होते है।  वयस्क मनुष्य के नेत्र लगभग गोलकार संरचना हैं।  नेत्र की दीवारें तीन परतो की बनी होती है।  बाहरी परत घने संयोजी ऊतकों की बनी होती है जिसे स्क्लेरा (स्वेत पटल )कहते है। 

नेत्र के भाग


                                                                     नेत्र के भाग 


अग्र भाग कॉर्निया कहलाता हैं।  मध्य परत कोरोइड (रक्त पटल ) में अनेक रक्त वाहिनियाँ होती हैं और यह हल्के नीले रंग की दिखती है।  नेत्र गोलक के पिछले दो -तिहाई भाग पर कोरोइड की परत पतली होती है , लेकिन यह अग्र भाग में मोटी होकर पक्ष्माभ काय बनाती हैं।  पक्ष्माभ काय  आगे की ओर निरंतरता बनाते हुए वर्णक युक्त और अपारदर्शी संरचना आइरिस बनाती है , जो कि आंख का रंगीन भाग होता हैं।  नेत्र के भीतर पारदर्शी क्रिस्टलीय लैंस होता हैं जो की तंतुओं द्वारा पक्ष्माभ काय से जुड़ा होता हैं।  लैंस के सामने आइरिस से घिरा हुआ एक छिद्र होता है , जिसे प्यूपिल कहते हैं।  प्यूपिल घेरे का नियंत्रण आइरिस के पेशी तंतु करते हैं। 
आंतरिक परत रेटिना कहलाती है और यह कोशिकाओं की तीन परतो से बनी होती है। ये परते अंदर से बाहर की ओर गुच्छिका कोशिकायें , द्विध्रुवीय कोशिकायें , और प्रकाश ग्राही कोशिकायें  होती है।  दिन की रोशनी में देखना और रंग देखना शंकु के कार्य है तथा स्कोटोपिक द्रष्टि शलाका का कार्य हैं।  शलाकाओं में बैंगनी लाल रंग का प्रोटीन रोडोप्सीन या द्रष्टि बैंगनी  होता है जिसमे विटामिन ए का व्युतपन्न होता हैं।  
मानव नेत्र में तीन प्रकार के शंकु होते हैं जिनमे कुछ विशेष प्रकाश वर्णक होते है , जो की लाल , हरे  और नीले प्रकाश ो को पहचानने में सक्षम होते हैं।  विभिन्न  प्रकार के शंकुओं और उनके प्रकाश वर्णको  के मेल से अलग अलग रंगो के प्रति संवेदना उतपन्न होती हैं।  जब इन शंकुओं को समान मात्रा में उत्तेजित किया  जाता है तो सफेद रंग के प्रति संवेदना उतपन्न होती हैं। 


द्रक तंत्रिका नेत्र तथा द्रष्टि पटल नेत्र को नेत्र गोलक के मध्य तथा थोड़ी पशच ध्रुव के ऊपर छोड़ती हैं तथा रक्त वाहिनी यहाँ प्रवेश करती हैं।  प्रकाश संवेदी कोशिकायें उस भाग में नहीं होती हैं , इसे अंधबिंदु कहते हैं।  अंधबिंदु के पार्शव में आंख के पिछले ध्रुव पर पीला वर्णक बिंदु होता हैं जिसे मैक्युला ल्युटिया कहते हैं और जिसके केंद्र में एक गर्त होता है जिसे फोविया कहते है।  फोविया रेटिना का पतला भाग होता हैं , जहाँ केवल शंकु संघनित होते है।  कॉर्निया और लैंस के बीच की दुरी को एकवस चैंबर (जलीय कोष्ठ ) कहते हैं।  



देखने  की प्रक्रिया :-  

 द्रश्य तरंगदैधर्य में प्रकाश किरणों को कॉर्निया व लैस द्वारा रेटिना  पर फोकस करने पर शलाकाओं व शंकु में आवेग उतपन्न होते हैं।  मानव नेत्र में प्रकाश संवेदी यौगिक (प्रकाश वर्णक ) ओप्सिन (एक प्रोटीन ) और रेटिनल (विटामिन ए का एल्डिहाइड ) से बने होते हैं।  प्रकाश ओप्सिन  से रेटिनल के अलगाव को प्रेरित करता हैं , जिससे ओप्सिन की संरचना में बदलाव आता है तथा यह झिल्ली की पारगम्यता में बदलाव लता हैं।  इसके परिणाम रूप विभवांतर प्रकाश ग्राही कौशिक में संचरित होती है तथा एक संकेत की उतप्ति होती है जो कि गुच्छिका कोशिकाओं  द्विध्रुवीय कोशिकाओं द्वारा सक्रीय कोशिका विभव उतपन्न करता है।  इन सक्रिय विभव के आवेगों का द्रक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क के द्रष्टि वल्कुट क्षेत्र में भेजा जाता है जहां पर तंत्रिकीय आवेगों की विवेचना की जाती है और छवि को पूर्व स्मृति एवं अनुभव के आधार पर पहचाना जाता हैं। 

कर्ण:-  

कर्ण दो संवेदी क्रियाए करते है , सुनना और शरीर का संतुलन बनाना। कर्ण को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है – बाह्मा कर्ण , मध्य कर्ण और अंत :कर्ण

 कर्ण
कर्ण 

बाह्मा कर्ण पिन्ना या आरिकुला तथा बाह्मा श्रवण गुहा का बना होता है। पिन्ना वायु में उपस्थित तरंगो को एकत्र 
करता है जो ध्वनि उतपन्न करती  है। बाह्मा श्रवण गुहा , कर्ण पटह झिल्ली तक भीतर  की ओर जाती हैं।  पिन्ना तथा मिटस में कुछ महीन बाल और मोम स्त्रावित करने वाली तेल /वसा ग्रंथिया होती हैं। कर्ण पटह झिल्ली संयोजी ऊतकों की बनी होती हैं जो बाहरी ओर त्वचा से तथा अंदर श्लेष्मा झिल्ली से आवरित होती है। 
मध्य कर्ण तीन अस्थिकाओं से बना होता है जिन्हें मेलियस , इंक्स और स्टेपीज कहते है। मेलियस कर्ण पटह झिल्ली से और स्टेपीज कोक्लिया की अंडाकार खिड़की से जुड़ी होती है।  कर्ण अस्थिकाएँ ध्वनि तरंगो को अंत :कर्ण तक पहुंचाने की क्षमता को बढ़ाती है।  यूस्टेकियन नलिका मध्यकर्ण गुहा को फेरिक्स से जोड़ती हैं।  यूस्टेकियन नलिका कर्ण पटह के दोनों ओर दाब को समान रखती है। 
द्रव से भरा अंत :कर्ण लेब्रिंथ कहलाता है , जो कई अस्थिल और झिल्लीनुमा लेबिरथ से बना होता है।  अस्थिल लेबिरंथ वाहिकाओं की एक शृंखला होती है।  इन वाहिकाओं के भीतर झिल्ली नुमा लेबिरंथ होता है जो कि परिलसिका द्रव से घिरा रहता है , किन्तु झिल्लीनुमा लेबिरंथ एन्डोलीफ नामक द्रव से भरा रहता है।  लेबिरंथ के घुमावदार भाग को कोक्लिया कहते है।  कोक्लिया को दो झिल्लिओं द्वारा तीन भागों में विभक्त किया जाता है , जिन्हे बेसिलर झिल्ली और राइजनर्स झिल्ली कहते है।  ऊपरी कक्ष को स्केला वेस्टिब्युली , मध्य कक्ष को स्केला मीडिया और निचले कक्ष को स्केला टीपेंनी कहते है। स्केला वेस्टिब्युली और स्केला टीपेंनी परिलसीका द्रव से तथा स्केला मीडिया अंतरलसीका द्रव से भरा होता है। कोक्लिया के नीचे स्केला वेस्टिब्युली अण्डकार खिड़की में में समाप्त होती है , जबकि स्केला टिंपनी गोलाकार खिड़की में समाप्त होते है। 
ऑर्गन ऑफ कोटराइ आधारीय झिल्ली पर स्थित होता है जिसमें पाई जाने वाली रोम कोशिकाए श्रवण ग्राही के रूप में कार्य करती है।  रोम कोशिकाय ऑर्गन ऑफ कोटराइ की आंतरिक सतह पर शृंखला में पाई जाती है। रोम कोशिकाय का आधारीय भाग अभिवाही तंत्रिका तंतु के निकट सम्पर्क में होता है। प्रत्येक रोम कोशिका के ऊपरी भाग से कई स्टीरियो सिलिया नामक प्रवर्ध निकलता है।  रोम कोशिकाओं की शृंखला के ऊपर पतली लचीली टेक्टोरियल झिल्ली होती है। 
अंत :कर्ण में कोक्लिया के ऊपर जटिल तंत्र , वेस्टिब्युलर तंत्र भी होता है। वेस्टिब्युलर तंत्र तीन अर्द्धचंद्राकर नलिकाओं और लघुकोश तथा यूट्रीकल  निर्मित ऑर्गन ऑफ ऑटोलिथ से बना होता है। प्रत्येक अर्द्धचंद्राकर नलिका एक दूसरे से समकोण पर भिन्न तल पर स्थित होती है।  झिल्लीनुमा नलिकायें अस्थिल नलिकाओं के परिलसीका द्रव में डूबी रहती है।  नलिका का फुला हुआ  आधार भाग एंपुला जिसमें एक उभर निकलता है जिसे क्रिस्टा एपुलेरिस कहते है।  प्रत्येक क्रिस्टा में रोम कोशिकायें  होती है। लघुकोश और यूट्रीकल में उभारनुमा संरचना मैक्युला होता है।  क्रिस्टा व मैक्युला वेस्टिब्युलर तंत्र के विशिष्ट ग्राही होते है , जो शरीर के सतुंलन व सही स्थिति के लिए उत्तरदायी होते है। 

 कोक्लिया के काट द्रश्य


                                                               कोक्लिया के काट द्रश्य                                                          


श्रवण की क्रिया :- बाह्मा कर्ण ध्वनि तरंगो को ग्रहण कर कर्ण पटह तक भेजता है।  ध्वनि तरंगो के प्रतिक्रिया में कर्ण पटह में कंपन्न होता है और ये कंपन्न कर्ण अस्थिकाओं (मैलियस , इंक्स, और स्टेपीस ) से होते हुए गोलाकार खिड़की तक पहुँचते हैं।  गोलाकार खिड़की से कंपन्न कोक्लिया में भरे द्रव तक पहुँचते है , जहां वे लिंफ में तरंगे उतपन्न करते है।  लिंफ की तरंगे उत्पंन करते है। लिंफ की तरंगे आधार कला मे हलचल उत्तेजित करती है। 


आधारीय झिल्ली मे गति से रोम कोशिकाएं मुड़ती है और टैक्टोरियल झिल्ली पर दवाब डालती हैं। फलसवरूप संगठित अभिवाही न्यूरॉन्स मे तंत्रिका आवेग उत्पंन होते हैं। ये आवेग अभिवाही तन्तुओ द्वारा श्रवण वल्कुट तक भेजे जाते हैं जँहा आवेगों का विश्लेषण कर ध्वनि को पहचाना जाता है।

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