मानव जनन तंत्र :-

पादपों और जन्तुओं की प्रत्येक जाति में अपनी अंतरजीविता बनाए रखने के लिये नये सदस्यों को उतपन्न करने की क्षमता होती है।  प्रजजन का तातपर्य जनक के समान प्राणी की उत्तपति होती हैं।  यह दो प्रकार की प्रजनन विधियों द्वारा होता हैं। अलैंगिक प्रजनन इसमें संतति का निर्माण विखण्डन , मुकुलन , के द्वारा होता हैं।  लैंगिक प्रजनन में संतति का निर्माण दो आनुवंशिक रूप से भिन्न युग्मको के निषेचन के द्वारा होता हैं। नर युग्मक (शुक्राणु) व मादा युग्मक (अण्डाणु) के संयुग्मन को निषेचन कहते हैं। नर व मादा प्राणियों की जनन प्रक्रिया अंतर होता हैं। नर शुक्राणुयो  निर्माण वयोवृद्ध अवस्था तक निरंतर होता रहता हैं किन्तु मादाओं में अंडाणुओं का निर्माण लगभग पचास वर्ष की उम्र तक ही रहता हैं।

नर जनन तंत्र (The Male Reproductive System ):-

 जंतुओं में प्रमुख नर जननांग  एक जोड़ी वृषण (testis) होते हैं जिनमे शुक्राणुओं का निर्माण शुक्राणुजन प्रक्रिया द्वारा होता हैं।  वृषण, उदर -गुहा के बाहर, गुदा के ठीक निचे एक -एक छोटी थैली में स्थित होते हैं।  इन थेलियो को वृषण कोष कहते हैं।  शुक्राणुजनन की प्रक्रिया चलाने के लिए वृषण का तापमान, प्राणी के शरीर के आंतरिक तापमान से  2 -2. 5º C कम होना चाहिए।  वृषण अंडाकर होता हैं जिसकी लम्बाई 5 cm व 3 cm तक होती हैं।  प्रत्येक वृषण हजारों नलिकाकार शुक्रजनक नलिकाओं का बना होता हैं।  ये नलिकाएं चारो ओर एक झिल्ली द्वारा ढकी रहती हैं।  इस झिल्ली को टयूनिका प्रोपरिया कहते हैं।
वृषण के आवरण के निचे कुण्डलित रेता नलिकाय / शुक्रजनक नलिकाओं संयोजी ऊतक में स्थित रहती हैं  यह संयोजी ऊतक अन्तराली ऊतक कहलाते हैं।  शुक्रजनक  नलिकायें अन्तराली कोशिकाओं द्वारा पृथक रहती हैं।  यह कोशिकाये नर हार्मोन्स स्त्रावित करती हैं जिसे एण्ड्रोजन कहते हैं।  नर के वृषण में शुक्राणुजनन एवं नर प्रजनन सहायक संरचनओं तथा परिवर्ती लैंगिक लक्षणों के विकास एवं नियमन का श्रेय एण्ड्रोजन को जाता हैं।
नर प्रजनन सहायक संरचनओं के अंतर्गत वृषण जालिकाये (Rete testis ), शुक्र वाहिकायें (Vas efferenita ), अधिवर्षण (epididymis ) होते हैं। 
पुरुष जनन तंत्र श्रोणि क्षेत्र का चित्र
पुरुष जनन तंत्र श्रोणि क्षेत्र का चित्र

वृषण में उपस्थित प्रत्येक शुक्रजनक नलिका (Rete testis ) द्वारा शुक्र वाहिकाओं (vas efferntia ) में खुलती हैं। शुक्रवाहिकायें फिर अधिवृषण में खुलती हैं जो कि प्रत्येक वृषण के पशच भाग में स्तिथ होती हैं।  अधिवृषण आगे जाकर शुक्रवाहिकाओं में खुलती हैं जो आगे जा कर मूत्राशय (urinary bladder ) पर कुंडली बनती हैं।  शुक्राशय (seminal vesicle ) से  वाहिनी (vesicle ) आती हैं और मूत्र मार्ग (urethra ) में स्खलनीय वाहिनी (ejaculatory duet ) में खुलती हैं।  ये वाहिकायें शुक्राणु का संग्रह करती हैं तथा वृषण से मूत्र मार्ग तक संवहन करती हैं।  मूत्राशय से मूत्र मार्ग  की उतपत्ति होती हैं और शिशन (penis ) से होती हुई मूत्राशय मुख (urethral meatus ) द्वारा बाहर खुलती हैं।
पुरुष जनन तंत्र आंतरिक सरंचनाओं को दर्शाता आरेखीय द्रश्य
पुरुष जनन तंत्र आंतरिक सरंचनाओं को दर्शाता आरेखीय द्रश्य 
शिशन नर बाह्मा जननेन्द्रिय हैं।  यह एक विशेष प्रकार का ऊतक का बना होता हैं।  शिशन का अंतिम भाग शिशन मुण्ड कहलाता हैं को एक ढीली त्वचा से ढका होता हैं जिसे मूत्राशय मुख कहते हैं।
स्त्री जनन तंत्र का द्रश्य
स्त्री जनन तंत्र  का द्रश्य 

अंडाशय स्नायुओं द्वारा श्रोणि भित्ति तथा गर्भाशय से जुड़ा होता हैं।  एक पतली उपकला द्वारा प्रत्येक अंडाशय ढका होता है जो कि अंडाशय पीठिका (ovarian stroma ) से जुड़ा होता हैं।
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अण्डवाहिनिया , गर्भाशय व योनि मिलकर स्री सहायक नलिकाओं का निर्माण करती हैं।  प्रत्येक डिम्बवाहिनी नलिका अंडाशय की परिधि से शुरू होकर गर्भाशय तक जाती हैं।  इसकी लम्बाई 10 -12  cm होती हैं।  अंडाशय के पास डिम्बवाहिनी किप के आकार  का होता हैं जिसे किपक (Infundibulum) कहते हैं।  किपक में अंगुलीनमा किनारे प्रक्षेप होते हैं , जिन्हें झालर (फिब्री) कहते हैं।  किपक के आगे चलकर एक चौड़े भाग में खुलता हैं जिसे तुम्बिका (ampulla ) कहते हैं।  अंडवाहिनी  का अंतिम भाग संकीर्ण पथ ( isthmus) कहलाता हैं इसमें एक संकरी अवकाशिका होती है जो गर्भाशय से जुड़ती हैं।
मादा में एक गर्भाशय पाया जाता हैं।   यह उल्टी रखी  के आकार का होता हैं।  यह श्रोणि भित्ति के स्नायुओं द्वारा जुड़ा होता हैं।  यह एक पतली ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता हैं।  ग्रीवा की गुहा योनि के साथ जन्म -नाल का निर्माण करता हैं।गर्भाशय  में तीन परत पायी जाती हैं।  बाह्मा परत में झिल्ली नुमा परिगर्भाश्य (perimetrium), मध्य मोटी पेशीय स्तर गर्भाशय पेशी स्तर तथा आंतरिक ग्रंथिल स्तर गर्भाशय अंत : स्तर कहलाती हैं।
स्त्री के बाह्मा जननेन्द्रिय के अंतर्गत जघन शैल (mons pubis ), वृहद भगोष्ठ (labia majora ), लघु भगोष्ठ (labia minora ), योनिच्छद (hymen ) और भगशेफ (clitroris) आदि उपस्थित होते हैं।  जघन शैल त्वचा और जघन बालों से ढकी हुई वशामय ऊतकों से बनी परत होती हैं।  इसके ठीक निचे ऊतकों का माँसल वलन पाया जाता हैं जिसे वृहद भगोष्ट कहते हैं।  एक जोड़ी लघु भगोष्ठ के निचे पाया जाता हैं।  योनि के द्वार प्राय : एक पतली झिल्ली द्वारा ढका रहता है जिसे योनिच्छद कहते हैं।  यह प्राय  मैथुन के समय फट जाती हैं।  भगशेफ एक छोटी सी अंगुली जैसी संरचना होती हैं जो मूत्र द्वार के ऊपर  दो वृहद भगोष्ठ के ऊपरी मिलन बिंदु के पास स्थित होती हैं।  योनिच्छद  कुछ औरतों में संभोगों बाद भी बना रहता हैं।  मैथुन के अलावा यह योनिच्छद  कभी -कभी तेज धक्के या अचानक गिरने से भी फट सकता हैं।
स्तन ग्रंथि का द्रश्य
स्तन ग्रंथि का द्रश्य 
मादाओं में एक जोड़ी कार्यशील स्तन ग्रन्थि पायी जाती हैं।  इसमें कोशिकाओं के गुच्छे होते हैं जिन्हे कूपिका कहते हैं।  कुपिकाओं द्वारा दुग्ध स्त्रावित होता हैं।  कुपिका कोशिका द्वारा निर्मित दुग्ध कूपिका गुहा में एकत्र हो जाता हैं।  प्रत्येक स्तन में 15 -20 स्तन पालियाँ पायी जाती है जो मिलकर स्तनवाहिनी का निर्माण करती हैं।  कई
स्तन वाहिनियाँ मिलकर एक वृहद तुम्बिका बनाती है जो दुग्ध वाहिनी से जुड़ी होती हैं।  इनके द्वारा दूध स्तन से बाहर आता हैं।

शुक्राणु की सरंचना (Structure of system )

शुक्राणु को तीन भागो में विभक्त कर सकते हैं –
(a) शीर्ष (Head )
(b) मध्य खण्ड (Middle piece )
(c ) पूंछ (Tail)

(a) शीर्ष (Head ): 

 शीर्ष का अग्र -छोर एक्रोसोम नामक संरचना में विभेदित होता हैं जिसका कार्य होता है अण्ड कलाओं (egg cytoplasm ) को भेद कर शुक्राणु  का अण्डाणु के कोशिका द्रव्य से सम्पर्क स्थापित करना।  शीर्ष के शेष भाग में केन्द्रक स्थित होता हैं।
शुक्राणु की संरचना
शुक्राणु की संरचना 

(b) मध्य खण्ड (Middle piece ):

शुक्राणु के मध्य भाग में दूरस्थ सेन्ट्रिओल (distal entroile ) व समेकित माइटोकॉन्ड्रिया एक या अधिक पिण्डक के  रूप में जिन्हे माइटोकॉन्ड्रियल काय (mitochondrial body ) कहते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया  में ऑक्सीकारक किण्वक स्थित होते हैं  जो शुक्राणु को गतिशील  रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं।  मैथुन क्रिया के दौरान मानव नर द्वारा करीबन 200 -300 million शुक्राणु उतसर्जित  किये जाते हैं जिनमें से 60 % शुक्राणु ही सामान्य आकार व आकृति के होते हैं।
वृषण की कुण्डलित रेता नलिकाओं में के निर्माण के बाद उन्हें सहायक नलिकाओं द्वारा स्थानान्तरित कर दिया जाता हैं।  शुक्राणुयो के परिपक्वन व गतिशीलता के लिए अधिवृषण , शुक्रवाहिका व शुक्रजनक नलिकाओं का स्रवण आवश्यक हैं।  सेमिनल द्रव्य व शुक्राणुओं को वीर्य (seman ) कहते हैं।

सगर्भता एवं भ्रूणीय परिवर्द्धन (Pregancy and Embryonic Development )

भ्रूण के आरोपण के पश्चात् , ट्रोफोब्लास्ट पर अंगुली रूपी सूक्ष्मांकुर उभर जाती हैं जो चारों तरफ से मातृक रक्त से घिरी रहती हैं।  गर्भाशय भित्ति की म्यूकोसा का कोरियान के साथ संयोजित होने से प्लेसेंटा का निर्माण होता हैं।  सभी पोषक पदार्थ , ऑक्सीजन मातृक रक्त से भ्रूण से प्लेसेंटा द्वारा ही स्थानांतरित होते हैं।  प्लेसेंटा एक प्रकार की अंत: स्त्रावी ग्रंथि है जो गर्भावस्था में हार्मोन्स स्त्राव कृत्ति हैं।  जैसे HCG  (Human Chorionic Gonadotropin), (HPCL -Human Placental Lactogen ), प्रोजेस्ट्रोन (Projesteron) इत्यादि।  गर्भावस्था के उत्तरार्ध में रिलेक्सीन (relaxin) नामक हार्मोन का स्त्रावण होता हैं जो प्रसव क्रिया के समय प्यूबिक सिम्फाईसिस के तंतुओं को शिथिल करता हैं।
अन्तरोपण की प्रक्रिया
अन्तरोपण की प्रक्रिया 

 
रोपण के तुंरत पश्चात्त, कोशिकीय पिंड का तीन भ्रूणीय स्तर में विभेदीकरण होता हैं।  इसके पश्चात तीन जननिक स्तर अथार्त बाह्मा एक्टोडर्म (ectoderm ), मध्य मिसोडर्म (mesoderm ) व आंतरिक एण्डोडर्म (endoderm ) स्तर बनते हैं।  भीतरी कोशकीय पिण्ड विशिष्ट स्तम्भ कोशिकाये द्वारा निर्मित होती हैं , जिनमे यह क्षमता होती हैं वह विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं में विकसित हो सकें।  इस प्रकार की कोशिकाओं को टोटिपोटेंट कोशिका कहते हैं। 
मानव गर्भावस्था 9  महीने की होती हैं। . मानव में एक महीने के बाद भ्रूण का ह्रदय विकसित होता है।  दूसरे  महीने के अंतिम चरण में हाथ -पैर विकसित होते हैं।  12 सप्ताह पुरे होने तक मुख्य सभी अंग बन जाते हैं।  पांचवे महीने में भ्रूण में हलचल होने लगती है व सिर पर बाल आ जाते हैं।  24 वे सप्ताह के अंत तक पलकें, भौहे व शरीर में रोम आ जाते हैं।  गर्भावस्था के नवें महिने तक भ्रूण पूर्ण विकसित होकर प्रसव के लिए तैयार हो जाता हैं। 

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