इस लेख के मुख्य बिंदु –
टिड्डी की जातियां –

टिड्डियों की अवस्थायें –
टिड्डीयो का निवास –
टिड्डी नियंत्रण –

टिड्डी (Locust ) एक्रीडाइइडी (Acridiide )परिवार के ऑर्थोप्टेरा (Orthoptera ) गण का कीट है।  हेमिप्टेरा (Hemiptera ) गण के सिकेडा (Cicada ) वंश का कीट भी टिड्डी या फसल टिड्डी कहलाता है।  इसे लघुशृंगीय टिड्डा भी कहते है।  सम्पूर्ण संसार में इसकी केवल छह जातियां पाई जाती है।  यह प्रवासी कीट है और इसकी उड़ान दो हजार मील तक पाई गई है।

टिड्डी (Locust )
टिड्डी (Locust )

मादा टिड्डी मिटटी में कोष्ठ बनाकर प्रत्यके कोष्ठ में 20 से लेकर 100 अंडे तक रखती है।  गर्म जलवायु में 10 से 20 दिन तक में अंडे फुट जाते है।, लेकिन उत्तरी अक्षांश के स्थानों में अंडे जाड़े भर प्रसुप्त रहते है।  शिशु टिड्डी के पंखे नहीं होते तथा अन्य बातो में यह वयस्क टिड्डी  होती है।  शिशु टिड्डी का भोजन वनस्पति है और ये पांच छह सप्ताह वयस्क हो जाती है।  इस अवधि में चार से छह छह बार तक इसकी त्वचा बदलती है।  वयस्क टिड्डियों में 10 से लेकर 30 दिनों तक में प्रौढ़ता आ जाती है और तब वे अंडे देती है।  कुछ जातियों में यह काम कई  महीनो में होता है।  टिड्डी का विकास आर्द्रता ओर ताप पर अत्यधिक निर्भर करता है।

जातियां –

प्रवासी टिड्डियों की निमन प्रमुख जातियां है –

  • उत्तरी अमेरिका की रॉकी पर्वत की टिड्डी।
  • स्किस टोसरका ग्रिगररिया नामक मरुभूमीय टिड्डी।
  • दक्षिण अफ्रीका की भूरी एवं लाल लोक्सटान पारडालिना तथा नोमेडेक्रिस।
  • साऊथ अमरिकाना।
  • इटालीय तथा मोरोक्को टिड्डी।  इनमे से अधिकांश अफ्रीका।  ईस्ट इंडीज , उष्ण कटिबंधीय आस्ट्रेलिया , यूरेशियाई टाइगा जंगल के दक्षिण के घास के मैदान तथा न्यूजीलैंड में पाई जाती है।

टिड्डियों की अवस्थायें –

इनकी दो दो अवस्थाएं होती है –

1 इकचारी –

प्रत्येक अवस्था में ये रंजन आकृति , कायकी और व्यवहार में एक दूसरे से भिन्न होती है।  एकचारी के निंफ का रंग और प्रतिरूप परिवर्तित होता रहता है।  यह अपने पर्यावरण के अनुकूल अपने रंग का समायोजन कर सकता है। इसका उपापचय और ऑक्सीजन लेने की दर मंद होती है।  इनके पंखे छोटे , पैर लम्बे , प्रोनोटम संकीर्ण , शिखा ऊँची  तथा सिर बड़ा होता है।  एकचारी टिड्डी के पलने वाले बच्चे चरम होते है। एकचारी अवस्था इस जाति की स्वाभाविक अवस्था है।  जिस क्षेत्र में यह जाति पाई जाती है वहाँ एकचारी अवस्था का अस्तित्व रहता है।

2  यूथचारी –

यूथचारी के निंफ का रंग काला , पीला  और प्रतिरूप निश्चित होता है।  इसका उपापचय तथा ऑक्सीजन लेने की दर ऊँची होती है।  यह अधीर , सक्रिय और संवेदनशील होता है।  इसका ताप भी ऊँचा होता है क्योकि इसका काला रंग अधिक विकिरण को अवशोषित करता है।  इनके कंधे चौड़े , पंख लम्बे तथा प्रोनोटम जीन की आकृति का होता है।   इनकी यूथ में  रहने की मूल प्रवृत्ति बड़ी ढृढ़ होती है।  मृत्युदर  अधिक हो जाने पर समूह घनीभूत रहता है।  तूफान के कारण इनके यूथ भंग हो जाते  है। यूथचारी टिड्डी की संतति एकांत में पलती है। और एकचारी में परिवर्तित हो जाती है।

टिड्डीयो का निवास –

इनके निवासस्थान उन स्थानों पर बनते है जहाँ जलवायु असंतुलित होता है और निवास के  स्थान सीमित होते है।इन स्थानों पर रहने से अनुकूल ऋतू इनकी सीमित संख्या को संल्गन क्षेत्रों में फैलाने में सहायक होती है।

प्रवासी टिड्डी के उद्भेद स्थल चार प्रकार के होते है –

  1. कैस्पियन सागर , एरेल सागर तथा बालकश झील में गिरनेवाली नदियों के बालू से घिरे डेल्टा।
  2.  मरुभूमि से संल्गन घास के मैदान , जहाँ वर्षण में बहुत अधिक विषमता रहती है , जिसके कारण टिड्डियों के निवासस्थान में परिवर्तन होते रहते है।
  3. मध्य रूस के शुष्क तथा गर्म मिटटी वाले द्वीप , जो टिड्डी के लिए नम और अत्यधिक ठंडे रहते है , इसलिए इस क्षेत्र में बहुत संख्या में टिड्डियाँ एकत्र होती है।
  4. फिलीपन के अनुपयुक्त , आर्द्र तथा उष्ण कटिबंधीय जंगलो को समय समय पर जलाने से बने घास के मैदान।
वयस्क यूथचारी टिड्डियाँ गर्म दिनों में झुंडो में उड़ा करती है , उड़ने के कारण पेशियाँ सक्रिय होती है , जिससे उनके शरीर का ताप बढ़ जाता है।  वर्षा तथा ठंड के दिनों में इनकी उड़ाने बंद रहती है।  मरुभूमि टिड्डियों के झुण्ड , ग्रीष्म मानसून  के समय , अफ्रीका से भारत आते है और पतझड़ के समय ईरान और अरब देशो की ओर चले जाते है।  इसके बाद ये सोवियत एशिया , सीरिया , मिस्र और इजरायल में फेल जाते है।  इनमे से कुछ भारत और अफ्रीका लौट आते है , जहाँ दूसरी मानसूनी वर्ष के समय प्रजनन होता है।
लोकस्टा माइग्रेटोरिया नामक यह टिड्डी एशिया तथा अफ्रीका के देशो में फसल तथा वनस्पति को नाश कर देती  है।

ऐसे पनपती है टिड्डियां –

टिड्डियों के भारी संख्या में पनपने का मुख्य कारण वैश्विक तापवृद्धि के चलते मौसम में आ रहा बदलाव। है। विशेषज्ञों ने बताया की  एक मादा टिड्डी तीन बार तक अंडे दे सकती है और एक बार में 95 -158 अंडे तक दे सकती है।  टिड्डियों के एक वर्ग मीटर में एक हजार अंडे हो सकते है।  इनका जीवनकाल तीन से पांच महीनों का होता है।  नर टिड्डे का आकार 60 -75 एमएम और मादा का 70 -90  एमएमए तक हो सकता है।

दुनिया की सबसे खतरनाक कीट होती है टिड्डियां –

दुनियाभर में टिड्डियों की 10 हजार से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती है , लेकिन भारत में केवल चार प्रजाति ही मिलती है।  इसमें रेगिस्तानी टिड्डा , प्रवाजक टिड्डा , बंबई टिड्डा और पेड़ वाला टिड्डा शामिल है।  इनमे रेगिस्तानी टिड्डो को सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है।  ये हरे  – भरे घास के मैदानों में आने पर खतरनाक रूप ले लेते है।

नमी वाले क्षेत्रो में खतरा सबसे ज्यादा –

बताया जा रहा है की खतरनाक माने जाने वाले रेगिस्तानी टिड्डे रेत में अंडे देते है , लेकिन जब ये अण्डो को फोड़कर बाहर निकलते है , तो भोजन की तलाश में नमी वाली जगहों की तरफ बढते है।  इससे नमी वाले इलाकों में टिड्डियों जा खतरा ज्यादा होता है।

भारत में टिड्डिया –

 

 

एक तरफ  कोरोना वायरस धीरे -धीरे देश के जिले को चपेट में ले रहा  है वही जिले की दहलीज तक पहुंचे टिड्डी दल ने भी किसानो रहित आमजन की चिंताए बढ़ा दी है।  इन दिनों खेतो में मुंग और सब्जियों की फसले होती है। ऐसे में टिड्डी दल का हमला होने पर भारी नुकसान का अंदेशा है।
कृषि विज्ञानं केंद्र के प्रभारी व वरिष्ठ वैज्ञानिकों के मुताबिक टिड्डियां सर्वभक्षी होते है , जो सभी प्रकार के पेड़ों , फलदार पौधों को चट कर जाते है।  यह 50 से 150 फिट की ऊंचाई पर उड़ान भरती है।  जिधर हवा का रुख हो उसके साथ ही उड़ती है।  एक दल में टिड्डियों की संख्या लाखो होती है।  एक वर्ग किलोमीटर का झुण्ड एक दिन में लगभग 30 -35 हजार लोगो के बराबर भोजन खा सकता है।  टिड्डी का प्रजनन नम रेतीली या रेत/ मिटटी की सतह से 10 -15 सेमी निचे होता है।

टिड्डी नियंत्रण –

टिड्डियों का उपद्रव आरंभ हो जाने के बाद इसे नियंत्रित करना कठिन  हो जाता है।  इसपर नियंत्रण पाने के लिए हवाई जहाज से विषैली औषधियों का छिड़काव , विषैला चारा , जैसे बेनजिन हेक्साक्लोराइड के विलयन में भीगी हुई गेहूं की भूसी का फैलाव इत्यादि उपयोगी होता है।  अंडो को नष्ट करना और पहियों पर चौखटों पर पढ़ाए पर्दो के उपयोग से , टिड्डियों को पानी  और मिट्टी के तेल से भरी नाद में गिराकर नष्ट करना। टिड्डी दल रात में पेड़ो पर पड़ाव डालता है ऐसे में उसे आसानी से नष्ट किया जा सकता है।  अन्य उपाय है ,  पर ये उपाय व्ययसाध्य है। टिड्डी प्रकोप होने पर बचाव के लिए कृषक डेकामेक्रीन , साईपर मेथ्रीन या परमेथ्रिन दवा का 1. 0 मिली प्रति लीटर पानी का घोल छिड़काव कर सकते है।   अत: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही इनका आयोजन हो सकता है।

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