कालीबंगा सभ्यता की प्रमुख  विशेषताएँ 
 
कालीबंगा सभ्यता


नगर निर्माण – इन तीनों खण्डों की बस्ती घग्घर के तट पर स्थित कालीबंगा नाम से विख्यात हैं।  तीनों खण्ड कच्ची इटो से बने हुए हैं।  ये मिट्टी की कच्ची इटे 40/30  सेम. लम्बी 20 सेमी चौड़ी व 10 सेमी ऊंची हैं।
किले का भाग 240 मीटर उत्तर- दक्षिण और 120 मीटर पूर्व-पश्चिम में स्थित हैं।  इसके एक ओर 5-6  चबूतरे थे जिन पर चढ़ने की सीढ़िया थी और वहां पहुंचने के लिए ईटो की जड़ाई वाला रास्ता था।  
 
दूसरी बस्ती – इस नगर की दूसरी बस्ती नीचे की भूमि की ओर थी जिसकी लम्बाई 240 -360 मीटर थी।  यहाँ के मकान उसी प्रकार कच्ची इटो के बने थे जिस प्रकार दुर्ग की बस्ती के थे। मकान 5 -7 समूहों में थे जिनको उत्तर- दक्षिण व पूर्व – पश्चिम जाने वाली सड़को से जोड़ा गया था।  दो चार  परिवारों के लिए भीतर कुएँ भी होते थे। कहीं -कहीं एक कमरा वेदी के लिए भी निर्धारित था। इस बस्ती के भी दो प्रमुख द्वार थे।  पानी निकास के लिए लकड़ी व इटो की नालियाँ बनी हुई थी जो सड़क में बने गड्डो तक पानी पहुँचाती थी। 



कालीबंगा के सांचे
जुते हुए खेत – घग्घर नदी के बाएं किनारे पर स्थित 3000 वर्ष ई.पू. के पूर्वार्द्ध  का हैं।  यहां खेत में दो तरह की फसलों को एक साथ उगाया जाता था, जैसा की कालीबंगा के आस – पास के खेतों में होता हैं। खेत में ग्रिड पैटर्न की गर्तचरियो के निशान हैं और ये दो तरह के निशान एक -दूसरे के समकोण पर बने हुए हैं। नदियों में बाढ़ की सम्भावनाओ के कारण रबी की फसल में गेहूं व जौ यहाँ होते थे। ताम्र से बने कृषि के कई औजार भी यहाँ  आर्थिक उन्नति के लक्षण हैं। 








दूर का बस्ती खण्ड –  इन दोनों बस्तियों से 80 मीटर आगे एक बस्ती खण्ड मिलता हैं। जिसमे प्राचीन से बना एक कमरा मिला हैं जिसमे 4 -5 अग्निकुण्ड थे। 


कला -प्रेम-  कुछ बर्तनो पर पेड़ पौधों व पक्षियों के चित्र मिले हैं। कांसे के दर्पण, हाथीदांत का कंघा, सोने व मूंगे तथा सीपों के आभूषण और तांबे के पिने सभ्यता का प्रतीक हैं। इस युग की विकसित  सभ्यता कई मुहरों से जिन पर पशु और पुरुषों की आकृतिया बनी हैं। 

धार्मिक भावनायेँ – कालीबंगा की मृतक के प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने वाली तीन प्रकार की समाधियाँ मिली हैं। 
वे अपने शवों के अंडाकार खंड में सीधा उत्तर की ओर सर रख कर मृत्यु संबंधी उपकरणों के साथ गाड़ते हैं। दूसरी विधि में शव की टांगे समेट कर गाड़ा जाता हैं। तीसरी विधि में शव के साथ बर्तन और एक एक सोने व मणि के दानें की माला से विभूषित कर गाड़ने की प्रथा थीं। 





बर्तन- कालीबंगा में मिट्टी के कई बर्तन और उनके अवशेष मिले हैं। यहां के बर्तनो की विशेषता यह हैं की व पतले और हल्के होते हैं।  इनका रंग लाल हैं परन्तु ऊपर और मध्य भाग में काली व सफ़ेद रंग की रेखाय दिखाई देती हैं। इन पर अलंकरण चौकोर, गोल, जालीदार, त्रिकोण एवं समानान्तर रेखाओं से किया जाता था। बर्तनों में घड़े, प्याले, लोटे, पेंदे वाले ढककन व लोटे भी होते हैं। 


अन्य वस्तुए- मकानों के अवशेषों व बर्तनों के अतिरिक्त यहाँ अन्य प्रकार की कई वस्तुए भी उपलब्ध हैं जिनमे खिलोने, पशुओं के स्वरूप मिट्टी की मुहरे, तांबे के औजार, कांच के मणिये आदि हैं। 
कालीबंगा के इस स्थान से ऐसे चिन्ह मिले हैं जो प्राचीन नगर से संबंधित हैं। यह नगर, मकान, बर्तन आदि कम से कम 4300 वर्ष पुराने हैं।  इसके पश्चात् सिंधु सभ्यता के लोग आये और उन्होंने उस पुराने शहर के स्थान के पर दूसरा शहर बसाया। इस शहर की चारदीवारी काफी बड़ी थी और शहर भी काफी सुंदर था। चौड़ी और पक्की सड़के थीं और कई छोटी-छोटी गालिया भी थी। 



सैन्धव लिपि – कालीबंगा उत्खनन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है की इसने सैन्धव लिपि की पहचान करने के प्रयास में एक ठोस दिशा निर्देश किया। यहाँ से प्राप्त एक सैन्धव लिपि के युद्ध मृद्पात्र पर लिपि की ओवर लैपिंग ( एक दूसरे पर आये अक्षर) ने यह सिद्ध कर दिया की यह लिपि दाहिने से बायीं ओर को लिखी जाती हैं। 





कालीबंगा की सभ्यता का लोप – डॉ गोपीनाथ शर्मा ने लिखा हैं की जैसे जैसे यहाँ की नदियों का पानी सूखता गया और अन्य सहायक नदियों के बहाव के मार्ग दूसरी और मुड़ते गए और धीरे -धीरे वर्षा की कमी आती गयी, इस स्थान का कृषि कार्य नष्ट होता गया। सूखे के कारण जंगल नष्ट हो गया और हरियाली भी चराई भी कम होती गयी। मरुस्थल की बढ़ोतरी के कारण पिने के पानी की भी कमी होती गयी जिससे यहाँ के लोग देश के अन्य भागों में जाकर बस गए। 

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