ऐसे पादप जिनसे औषध प्राप्त की जाती है , औषधीय पादप कहलाते है।  विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत औषधीय पादपों के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जाता है , फार्मेकोगनोसी कहते है तथा पादप औषधियों के शरीर  होने वाले प्रभावों के अध्य्यन को फार्मेकोलोजी कहा जाता है।

भारत में सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में वनस्पति का ओषधियो के रूप में उपयोग का उल्लेख मिलता है और साथ ही अर्थवेद में भी इनका उपयोग किया गया है।  चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता भारतीय औषध पादपों तथा रोग उपचार के बारे में जानकारी उपलब्ध कराते है।  एरिस्टॉटल तथा थियोफ्रास्ट्स ग्रीक विद्वानो ने अनेक औषधीय पादपों का उल्लेख किया है।
डायोस्कोरिडस ने डी ‘ मेटीरिया मेडिका ‘ नामक पुस्तक में लगभग 500 औषधीय पादपों का विस्तृत वर्णन किया था।
अधिकतर औषधीय पादप जंगली पादप के रूप में उगते है तथा कुछ अन्य उगाये जाते है। औषध पादपों की औषधीय क्षमता उसमे उपस्थित विशिष्ट रासायनिक पदार्थो के कारण होती है जिन्हे सक्रिय तत्व कहते है।  इनमे मुख्य है – एल्केलाइड (Alkaloids ) , ग्लाइकोसाइइडस , रेजिन , आलिओरेजिन , वाष्पशील तेल , गोंद , टेनिन इत्यादि।  इन  पादपों में कुछ विष होते है जबकि अन्य मादक पदार्थ होते है , जो अधिक मात्रा में सेवन किये जाने पर हानिकारक होते है।  यदि इनका अल्प मात्रा में उपयोग किया जाता है तो ये मानव की शरीर क्रियात्मक क्रियाओ पर औषध का कार्य करते है।  ये मुख्यत: जड़ , छाल , बीज तथा पत्तियों में अधिकता से पाए जाते है।

कुछ औषधीय पादपों का वर्णन इस प्रकार है –

1  सर्पगन्धा ,  चन्द्रमार , छोटा चाँद –



 वानस्पतिक नाम – रोवाल्फिया सर्पेन्टाइना

कुल – एपोसाइनेसी


 उपयोगी पादप भाग – शुष्क मुले  व मूलों की छाल।

सर्पगन्धा शाखा व पुष्पक्रम
सर्पगन्धा शाखा व पुष्पक्रम 

उतपत्ति व वितरण

रोवॉलफिया भारत का मूल निवासी है।  चरक संहिता में सर्पगन्धा का विवरण दिया गया है , जिसका सर्पदंश में उपचार हेतु उपयोग किया जाता था।  इसे पागल दवा के नाम से भी जाना जाता है।
फ़्रांस के एक वनस्पतिज्ञ प्लूमियर ने जर्मन चिकित्सक लियोनार्ड रौवाल्फ के सम्मान में इसका नामकरण रोवाल्फिया रखा गया।
यह पादप भारत , बांग्लादेश , श्रीलंका , थाईलैंड , इण्डोनेशिया तथा मलेशिया में उगता है।  भारत में इसको आसाम , हिमालय के तराई क्षेत्र , उत्तर प्रदेश , आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु , केरल , महाराष्ट्र में उगाया जाता है पर राजस्थान में नहीं  पाया जाता है।

पादप लक्षण –

  • ये पादप बहुवर्षीय , सदाबहार तथा उपक्षुप होता है।
  • इसकी जड़े कन्दील , टेढ़ीमेढ़ी तथा झुर्रीदार  होती है।
  • इसकी छाल हल्के भूरे रंग की होती है व ताजा मूलों में सर्प की गंध होती है।
  • इनकी पत्तियाँ सरल , चिकनी , चक्रीय व्यवस्थित होती है।
  • पुष्प कक्षीय अथवा ससीमाक्ष पुष्पक्रम में उतपन्न होते है।
  • इनके पुष्प सहपत्री , द्विलिंगी ,सफ़ेद या गुलाबी रंग के होते है।
  • फल अण्डाकार , काले – बैंगनी ड्रुप होते है।

उपयोगी भाग व सक्रिय तत्व –

पोधो को सर्दियों में जड़ सहित उखाड़कर जड़ों को काटकर अलग कर  लिया जाता है व धोकर धुप में सूखा देते  है।  जड़ों को पीसकर चूर्ण तैयार कर लेते है।
रोवॉलफिया में 80 प्रकार के एल्केलॉइड्स पाए जाते है।  सबसे अधिक मूलछाल में ही होते है।  छाल में  पाये जाने वाले कुछ प्रमुख एल्केलॉइड्स है – रिसपिरन , सर्पेन्टाइन , अजमेलिन , रॉवोल्फिनिन आदि।

उपयोग –

  • रिसर्पिन का उपयोग अनिद्रा , मिर्गी , तनाव , चिड़चिड़ापन तथा मानसिक रोगो में किया जाता है ,
  • सर्पेन्टाइन का उपयोग उच्च रक्तचाप के उपचार में किया जाता है।
  • यह गर्भाशय संकुचन प्रेरित करता है इसलिए प्रसव के समय प्रसूता को दिया जाता है।
  • तीर्व पागलपन के उपचार में काम आता है।
  • इसका काढ़ा दस्त , पेचिश एवं आंतो के दर्द में लाभकारी होता है।
  • इसकी पत्तियों का निचोड़ आँख के कॉर्निया की अपारदर्शिता के उपचार में काम आता है।
सर्पगन्धा से बनी अनेक औषिधियाँ बाजार में मिलती है जैसे – सरपीना , गुटिका , स्लीपिल्स आदि।

2  अफीम , अहिफेन , अमल –

 
वानस्पतिक नाम – पैपेवर सोमनीफेरम।
कुल – पैपेविरेसी।

उपयोगी पादप भाग

अपरिपक़्व केप्सूल फलो का लेटैक्स।

                                  बीज – पोस्तदाना , खसखस।
अफीम की पुष्पीय टहनी एवं फल
अफीम की पुष्पीय टहनी एवं फल 

उतपत्ति एवं वितरण वितरण

अफीम एशिया माइनर का मूल निवासी है।  इसकी खेती आस्ट्रेलिया , चैकोस्लोवेकिया , हंगरी , भारत , पाकिस्तान , ईरान तथा तुर्की में की जाती है।  भारत में अफीम की खेती रबी ( शरद ऋतू ) की में की जाती है।  ये फसले मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , राजस्थान व बिहार प्रान्तों में की जाती है।  इसकी खेती पर सरकारी नियंत्रण होता है।  राजस्थान में चित्तौड़गढ़ , बासंवाड़ा , डूंगरपुर तथा झालावाड़ में इसकी खेती की जाती है।

पादप लक्षण –

  • अफीम का पादप एकवर्णी , अशाखित , 1 से 3 फिट लम्बा शाक होता है।
  • इनकी पत्तियाँ बड़ी , एकांतर , पालीवत , पुष्पक्रम एकल अंतस्थ के होते है।
  • इनके पुष्प बड़े , आकर्षक सफ़ेद या बैंगनी रंग के फूल केप्सूल बड़ा , गोल कपाटों से स्फुटित बीज असंख्य के होते है।

अफीम का संग्रह –

अफीम पौधे के कच्चे फल केप्सूल से प्राप्त होती है।  कच्चे फलों पर चाकू द्वारा चीरा लगाया जाता है।  चीरा लगाने पर हल्के पीले रंग का लेटेक्स निकलता है जो शुष्क होने पर भूरे काले रंग का ठोस हो जाता है।
अफीम में लगभग 30 प्रकार के एल्केलॉइड्स होते है। जिनमे मुख्य है – मार्फिन , पेपावरीन , कोडीन , नारकोटिन , थिबेनिन आदि। इसके एल्केलॉइड्स मानव के प्रमस्तिष्क मेरुतंत्रिका  तंत्र को प्रभावित करते है।  अफीम से नशीला पदार्थ हेरोइन (डाई -एसिटिल मार्फिन ) बनाया जाता है।

उपयोग –

  • इसका उपयोग दर्द निवारक ओषधि के रूप में करते है।
  • कोडीन का उपयोग खाँसी , जुकाम व नजले के उपचार में किया जाता है।
  • यह अतिसार एवं दस्तों में उपयोगी होती है।
  • यह उत्तेजना एवं बेचैनी से राहत दिलाकर नींद को प्रेरित करती है।
  • अफीम के विवेकहीन उपयोग से भूख कम लगना , कब्ज , अनिद्रा , मूर्छा आदि व्याधियाँ उतपन्न हो जाती है।

3  कुनैन , सिनकोना 

 
वानस्पतिक नाम –  सिनकोना ऑफिसिनेलिस
कुल – रूबिएसी
उपयोगी पादप भाग – स्तम्भ की शुष्क छाल।
सिनकोना पादप
सिनकोना पादप 

उतपत्ति व वितरण

सिनकोना दक्षिण अमेरिका की एण्डीज पहाड़ियों का मूल निवासी है।  भारत , इण्डोनेशिया तथा जावा कुनैन उत्पादक के प्रमुख केंद्र है।  भारत में खाँसी पहाड़ियाँ , दक्षिण भारत (नीलगिरि पर्वतमाला ) तथा मध्य प्रदेश ( सतपुड़ा पर्वत शृंखला ) के पर्वतीय क्षेत्रों में इसके वृक्ष उगाये जाते है। इसके प्रमुख एल्केलॉइड्स है – कुनैन , सिनकोनिन , सिनकोनिडीन।

पादप लक्षण –

  • कुनैन एक सदाबहार मध्यम वृक्ष है।
  • इनकी पत्तियाँ बड़ी , सरल , पुष्पक्रम शीर्षस्थ योगिक ससीमाक्ष , पुष्प छोटे तथा फल केप्सूल होते है।
  • ओषधि इसकी छाल से प्राप्त की जाती है।
  • इसकी छाल कड़वी होती है।
सिनकोना की छाल
सिनकोना की छाल 

औषधीय उपयोग –

  • कुनैन मलेरिया के उपचार में अत्यंत प्रभावकारी है।  यह प्लाज्मोडियम वाइवेक्स परजीवी की शाइजोन्ट प्रावस्था को नष्ट करती है।
  • इसका उपयोंग काली खांसी व तितली के विवर्धन में किया जाता है।
  • रोगाणुरोधी एवं कीट विकर्षक के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
  • मन्दगानि , अमीबिक पेचिस , निमोनिया आदि में भी इसका उपयोग किया जाता है।
  • गठिया तथा टोन्सिलशोथ के उपचार में उपयोगी है।

4 हींग –

 
वानस्पतिक नाम – फेरूला आसाफीटिडा
कुल – एपीएसी , अम्बेलीफेरी
उपयोगी पादप भाग –  मूलकंदो से स्त्रावित ओलियोगमरेजिन।
हींग पादप
हींग पादप 

उतपत्ति व वितरण

हींग की खेती अफगानिस्तान , बलूचिस्तान , ईरान , पाकिस्तान व भारत ( जम्मू -कश्मीर ) में की जाती है।  व्यावसायिक हींग पिली – भूरी , अर्धशुष्क या शुष्क अकोशिकीयओलियो गमरेजिन  है।  हींग में कोई एल्कलॉइड नहीं होते है।  रेजिन के अतिरिक्त गोंद , सुगंध तेल जैसे – पाइनिन , अम्बेलिफेरीन तथा फेरुलिक अम्ल होते है।  हींग की गंध पाइनिन तथा स्वाद फेरुलिक अम्ल के कारण होता है।   हींग प्राप्त करने के लिए एक वर्ष की आयु की झाड़ियों को भूमि के समीप से काट दिया जाता है। कटे हुए  भाग से ओलियोरेजिन रिसकर गाढ़ा हींग बन जाता है।

पादप लक्षण –

  • हींग का पादप बहुवर्षी छोटी झाड़ी है , जिसकी मूले व मुलकन्द गाजर की जैसे शंकवाकाऱ होती है।
  • हींग दो प्रकार की होती है (1 ) दूधिया सफ़ेद जिसे काबुली सुफाईद बोला जाता है और दूसरी लाल हींग।
  • इनके पुष्प एकलिंगी व द्विलिंगी तथा फल छोटे होते है।
  • इनके स्तम्भ ऊधर्व , पर्णे बड़ी व विभाजित होते है।

औषधीय उपयोग –

  • हींग कृमिहर , स्वेदनकारी , पाचक , मूत्रक , रेचक , वाजीकारक तथा उद्दीपक होती है।
  • हींग का प्रयोग चिरकाली शवसनीशोध , दांत दर्द , अजीर्ण , आफरा।  मूर्छा , पेट फुलना , मिर्गी आदि रोगो में उपचार में किया जाता है।
  • हींग से कई आयुर्वेदिक योग जैसे हिंग्वास्कट चूर्ण , योगराज गुग्गल , हिंगडी वटी आदि बनाये जाते है।
  • हींग का उपयोग प्रमुख मसाले के रूप में काम में लिया जाता है।
  • हींग में कोउमारिन नाम का पदार्थ पाया जाता है।  यह खून को जमने से रोकता ही है साथ ही खून को पतला भी करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *