माइटोकॉन्ड्रिया (Mictochondria ) की संरचना  और कार्य 

इस लेख में निम्न बिंदु हैं –
वितरण –
माइटोकॉन्ड्रिया  की संख्या –
आकार एवं परिमाणमाइटोकॉन्ड्रिया   की संरचना –
माइटोकॉन्ड्रिया   की संरचना –
माइटोकोन्ड्रियल  डीएनए –
माइटोकॉन्ड्रिया के आरएनएमाइटोकॉन्ड्रिया   के कार्य –
 

माइटोकॉन्ड्रिया कणीय अथवा तंतु समान कोशिकाद्रव्यी अंगक है जो सभी यूकैरियोट्स में पाए जाते है।  माइटोकॉन्ड्रिया ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका आशय है धागे के आकृति की कण समान रचनाएँ।  यह  नाम इन्हे बेन्डा (Benda 1898 ) ने दिया। इसको कोलीकर (Kolliker 1850 ) द्वारा पहली बार कीटों की रेखित मांसपेशियां में देखा गया। माइटोकॉन्ड्रिया  सभी प्राणियों में और उनकी हर प्रकार कोशिकाओं में पाए जाते है।  माइटोकॉन्ड्रिया को सूत्रकणिका भी कहते है।  फ्लेमिंग ने माइटोकॉन्ड्रिया को filla तथा ऑल्टमैन ने बायोप्लास्ट कहा।  इसे कोशिकांग माना गया।  माइटोकॉन्ड्रिया रिकेटीसया बैक्टीरिया के समान होता है।

माइटोकॉन्ड्रिया
माइटोकॉन्ड्रिया 

माइटोकॉन्ड्रिया  दोहरी झिल्ली से घिरी जीवित रचना होती है।  माइटोकॉन्ड्रिया में ऑक्सीश्वसन की क्रिया सम्पन्न होती है।  माइटोकॉन्ड्रिया  जंतुओं तथा पौधों की सभी जीवित कोशिकाओं में पायी जाने वाली रचनाएँ है , जो नीली -हरी शैवालों तथा बैक्टीरिया की कोशिकाओं में नहीं पायी जाती है।
माइटोकॉन्ड्रिया  की क्रिस्टी की सतह व आंतरिक झिल्ली पर बहुत से छोटे (सूक्ष्म ) कण पाए जाते है जिन्हे F₁ कण या ओक्सिसोमस कहते है।  F₁ कण को इलेक्ट्रॉन अभिगमन कण भी कहते है। कोशिका के अंदर सूक्ष्मदर्शी  सहायता से देखने में ये गोल , लम्बे  या अण्डाकार दीखते है।
माइटोकॉन्ड्रिया  में उपस्थित डीएनए की रचना एवं आकार जीवाणुओं के डीएनए के समान है।  माइटोकॉन्ड्रिया  के डीएनए एवं कोशिकाओं के केन्द्रक में विधमान डीएनए में 35 -38 जीन एक समान है।  अपने डीएनए की वजह से माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका के भीतर आवश्यकता पड़ने पर  अपनी संख्या स्वंय बढ़ा सकते है।
संतानों की कोशिकाओं में पाया जाने वाला माइटोकॉन्ड्रिया  उन्हें उनकी माता से प्राप्त होता है।  निषेचित अंडो के माइटोकॉन्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए में शुक्राणुओं की भूमिका नहीं होती है।

वितरण –

माइटोकॉन्ड्रिया सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाए जाते है।  जीवाणुओं में नहीं पाए जाते है क्योंकि इनकी प्लाज्मा कला स्वंय श्वसन किण्वक रखती है।  ये सभी कोशिकाओं में पाए जाते है जो वायवीय श्वसन करती है।  लेकिन कुछ कोशिकाओं जैसे उच्च कशेरुकियों की लाल रक्त कणिकाओं में ये बाद की अवस्थाओं में नष्ट हो जाते है।  ऐसी प्रकार फ्लोएम छननी नलिकाओं में भी ये नष्ट हो जाते है।

माइटोकॉन्ड्रिया  की संख्या –

विभिन्न जीवों की कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या में भिन्नता पायी जाती है।  सामान्यत : एक कोशिका में इनकी संख्या 300 से 800 तक होती है।  ह्रदय की पेशी कोशिकाओं , वृक्क एवं ग्रंथिल कोशिकाओं में ये अधिक मात्रा में पाए जाते है।  चूहे के यकृत की कोशिकाओं में 1000 -1600 , एम्फीबिया के अण्ड में 300000 तथा शुक्राणु में 20 -24  माइटोकॉन्ड्रिया  पाए जाते है।

आकार एवं परिमाण

ये तंतु या कण समान , वृत्ताकार , शलाखा रूपी , शाखित या अशाखित आकृति के पाए जाते है।  यीस्ट में माइटोकॉन्ड्रिया गोलाकार तथा क्लोरेला में नलिकार  प्रकार के पाए जाते है।  कभी -कभी ये टेनिस के रेकेट या आशय समान आकृति के भी पाये जाते है जिनमें केंद्रीय भाग स्वच्छ दिखाई देता है।

सामान्यत : ये 0.2 -7𝝻𝗺 लम्बे , 0. 5 -1. 0 𝝻𝗺 व्यास आमाप के होते है।  यीस्ट में माइटोकॉन्ड्रिया  सबसे छोटे आमाप के 1𝝻𝗺  व एम्फीबिया राना  पाइपेंस के अण्ड कोशिकाओं में सबसे लम्बे 30 -40 𝝻𝗺 पाए गए है।

माइटोकॉन्ड्रिया   की संरचना –

माइटोकॉन्ड्रिया   एक दोहरी झिल्ली आबंध संरचना है , जिसमे निमन घटक है –

बाहरी झिल्ली –

माइटोकॉन्ड्रिया  की बाहरी झिल्ली प्रोटीन और फास्फोलिपिड (1:1 अनुपात ) की बनी होती है इसमें फास्फेटिडिल कोलिन की मात्रा अधिक होती है।  इसकी मोटाई 60 -70 A Ẳ होती है।
इसकी बाहरी झिल्ली द्वारा बहुत बड़े अणुओं का स्थानांतरण हो सकता है।  इसमें बड़ी संख्या में धंसे हुए प्रोटीन होते है जिन्हे पोरिन कहा जाता है।
बाहरी झिल्ली की सतह पर वृतविहीन कण पाए जाते है , जिनसे पारसन की उपइकाई कहा जाता है।

भीतरी झिल्ली –

यह माइटोकॉन्ड्रिया   की आंतरिक झिल्ली है जिस पर ऑक्सीडेटिव फास्फोराइलेशन के एंजाइम पाए जाते है , इस झिल्ली पर एटीपी संश्लेषण की प्रक्रिया होती है।
भीतरी झिल्ली की बाहरी सतह को सी – फेस तथा आंतरिक सतह को एम – फेस कहा जाता है।

क्रिस्टी –

आंतरिक झिल्ली में कई उभार होते है जिन्हे क्रिस्टी कहा जाता है। क्रिस्टी  टेनिस के रैकेट के समान संरचना होती है   जिन्हे F2  कण या ओक्सिसोम या आंतरिक झिल्लिया उपइकाई कहा जाता है।  ओक्सिसोम एटीपीस एंजाइम होते है जो ऑक्सीडेटिव फास्फोरिलीकरण में भाग लेता है।
ओक्सिसोम का निर्माण दो कारकों F0 तथा F1 के द्वारा होता है।  F0 कण ओक्सिसोम के आधार पर होता है।  जो आंतरिक झिल्ली के साथ F1 कण के जुड़ने में मदद करता है।  और F0 , F1 कण को OSCP  (Oligomycin Sensitivity Conferring Protein ) कहा जाता है।  दो ओक्सिसोम के बीच की दुरी 100 Ẳ  होती  है।

आधात्री (Matrix )-

आंतरिक झिल्ली से घिरे हुए स्थान में भरे द्रव को मेट्रिक्स के रूप में माना जाता है।  इसमें कुल माइटोकॉंड्रियन प्रोटीन का लगभग 2 /3 भाग होता है।  ये प्रोटीन क्रेब्स चक्र एंजाइम , श्वसनकारी एंजाइम होते है।
विशेष माइटोकोन्ड्रियल राइबोसोम , टी – आरएनए और माइटोकोन्ड्रियल डीएनए जीनोम की कई प्रतिया शामिल है।

माइटोकोन्ड्रियल  डीएनए –

माइटोकोन्ड्रियल डीएनए को अर्ध -स्वायत्त कोशिकांग कहा जाता है क्योकि उनमे माइटोकोन्ड्रियल डीएनए उपस्थिति होता  है जिसके कारण यह अपने प्रोटीन एवं एंजाइमों का निर्माण खुद कर सकता है।
माइटोकोन्ड्रियल डीएनए द्विरज्जुकी , नगन दानेदार , गोलाकार , उच्च G -C अनुपात वाला अणु है।  माइटोकोन्ड्रियल डीएनए कोशिक के कुल डीएनए का 1 % भाग होता है।
माइटोकॉन्ड्रिया में जीनोम का आकार छोटा होता है।  लेकिन जीन की संख्या बहुत अधिक होती है।
माइटोकॉन्ड्रिया  डीएनए का आकार जानवरो की तुलना में पौधे में अधिक होता है।
माइटोकॉन्ड्रिया  डीएनए  उत्परिवर्तनशील होता है तथा अनुवांशिकता के गुण रखता है।

यह केन्द्रकीय डीएनए में निम्न भिन्नताएं रखता है।

  1. गर्म किये  जाने पर केन्द्रकीय डीएनए की अपेक्षा अधिक ताप पर विकृत होते है।
  2. यह जीवाण्विक गुणसूत्र की भांति वृत्ताकार एवं कुंडल रहित होता है।
  3. माइटोकॉन्ड्रिया डीएनए का अणुभार 9 से 11 मिलियन होता है।
  4. इसमें द्विगुणन की दर केन्द्रीय DNA से कम होता है।

माइटोकॉन्ड्रिया के आरएनए 

माइटोकॉन्ड्रिया में आर. ए.ए. भी पाए जाते है।  ये केंद्र के आर. ए.ए.से भिन्न होता है। इन पर राइबोन्यूक्लिएज एंजाइम का प्रभाव नहीं होता है।  ये माइटोकोन्ड्रियल डीएनए से अनुलेखन द्वारा बनाये जाते है।  m-RNA  तीन प्रकार के 23S , 15S  व 4S प्रकार  देखे गए है।

माइटोकॉन्ड्रिया  के राइबोसोम –

माइटोकॉन्ड्रिया में 70S राइबोसोम होता है। जो 50s व 30s उपकाइयो से बना होता है। तथा कुछ मात्रा में आरएनए पाया जाता है।  माइटोकॉन्ड्रिया में आवश्यक प्रोटीन्स का संश्लेषण होता है। इसके लिए माइटोकॉन्ड्रिया डीएनए से m-RNA बनता है जिसके कोड के अनुरूप tRNA व rRNA प्रोटीन संश्लेषण हेतु आवश्यक क्रियाएँ करते है।

माइटोकॉन्ड्रिया   के कार्य –

  • माइटोकॉन्ड्रिया  में सभी खाद्य पदार्थो का ऑक्सीकरण होता है इसलिए माइटोकॉन्ड्रिया  को कोशिका का पावर हाउस भी कहते है।
  • अण्डजनन के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया  द्वारा पीतक पटलिकाओं का निर्माण किया जाता है।
  • इसमें कोशकीय श्वसन होता है।
  • इसमें एटीपी का संश्लेषण एटीपी का भंडारण और परिवहन होता है।  ये तीनो कार्य माइटोकॉन्ड्रिया  में होने के कारण इसको कोशिका का शक्ति गृह कहा जाता है।
  • न्यूरॉन्स में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया  न्युरोहार्मोन के निर्माण में मदद करते है।
  • माइटोकॉन्ड्रिया  के द्वारा उतपन्न ऊर्जा ATP (एडिनोसिन ट्राइफास्फेट ) के रूप में होती है।  तथा इसका निर्माण अकार्बनिक फास्फेट तथा एडिनोसिन डाइफास्फेट (ADP ) के मिलने  होता है।
  • माइटोकॉन्ड्रिया  में ऊर्जा निर्माण के साथ -साथ ऑक्सीकरण की क्रिया के द्वारा को को CO₂ एवं जल का निर्माण  होता है। माइटोकॉन्ड्रिया   के क्रिस्टी में इलेक्ट्रॉन अभिगमन तंत्र की क्रिया सम्पन्न होती है।
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