तेल उत्पादक पादप (Oil Producing Plants ) उनके गुण और उपयोग 

तेल उत्पादक पादप
तेल जटिल कार्बिनक पदार्थ है तथा रासायनिक द्रष्टि से वसीय तेल है जो कार्बन , हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के बने होते है।  ये ज्वलनशील , सामान्य ताप पर द्रव (तरल ) तथा जल में अविलेय अथवा ठोस या अर्धठोस अवस्था में रहते है।  वनस्पति या पादपों से प्राप्त तेल वनस्पति तेल कहलाते है।

तेल पादपों के विभिन्न अंगो जैसे – स्तम्भ , फल  व बीजो से प्राप्त होते है।

पौधों से प्राप्त वनस्पति तेलों को प्रकृति के आधार पर दो समूहों में विभक्त किया गया है –

(अ )  सगन्ध , अनिवार्य या वाष्पशील तेल – ये तीर्व गंध वाले तथा वायु में वाष्पित होने वाले होते है।  जिनकी पृथककरण आसवन विधि द्वारा किया जा सकता है , जैसे – केवड़ा , कपूर , गुलाब , खस -खस आदि।

(ब )  वसीय स्थिर या अवाष्पशील तेल –  ये अवाष्पशील तेल है जो वसीय अम्लों तथा ट्राइग्लिसराइड एल्कोहल के एस्टर होते है।  इन्हे सामान्य आसवन विधि से पृथक नहीं किया जा सकता है।  जैसे – सरसों , मूंगफली , सोयाबीन आदि के तेल।

 

वनस्पति तेलों का वर्गीकरण –  इन्हे चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –

(1 )  शुष्कन तेल (Drying Oil ) –   इन्हे खुला रखने पर सरलता से वायुमण्डलीय ऑक्सीजन को अवशोषण कर लेते है तथा इनकी सतह पर कठोर लचीली परत का निर्माण होता है।  इनका प्रयोग मुख्यत: पेन्ट , वार्निश तथा खाद्य तेल के रूप में किया जाता है , उदाहरण – अलसी सोयाबीन तथा कुसुम का तेल।

(2 )  अर्धशुष्कन तेल (Semidrying Oil ) – ये वायुमण्डलीय ऑक्सीजन को धीरे -धीरे अवशोषित करते है तथा लम्बे तक खुले रखने पर पतली , मुलायम तथा लचीली परत का निर्माण करते है।  ये मुख्य रूप से खाद्य तेल व साबुन उद्योग में प्रयुक्त होता है।  उदाहरण  – कपास या बिनौले , सूर्यमुखी , तिल , सरसो के तेल।



(3 ) अशुष्कन तेल (Non -drying oils ) –  ये सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में रहते है तथा लम्बे समय तक वायु में रखने पर भी पतली या लचीली परत का निर्माण नहीं करते , क्योंकि ये वायुमण्डलीय ऑक्सीजन से किसी प्रकार की अभिक्रिया नहीं करते है।  ये मुख्य रूप से खाद्य तेल के रूप में साबुन उद्योग में व लुब्रिकेंट के रूप में प्रयुक्त किये जाते है।
उदाहरण – मूंगफली , जैतून , अरण्डी के तेल।

(4 ) वनस्पति वसा या चर्बी ( Vegetable fat ) –  ये सामान्य तापमान पर ठोस अथवा अर्धठोस अवस्था में होते है।  इन्हें खाद्य तेल के रूप में काम में लेते है।  उदाहरण – नारियल , पाम ऑयल , कोकोबटर आदि।

 

1   सरसो (Mustard ) –

सरसो (Mustard )



सामान्य नाम –  पीली सरसों (Indian Colza )
 वानस्पतिक नाम –  ब्रेसिका नेपस वैरा , ग्लेऊका
 कुल –  ब्रेसिकेसी = क्रुसिफेरी

तेल के लिए उपयोगी पादप भाग –  बीजों में स्थित बीजपत्र।

उतपत्ति व उत्पादक देश –

सरसो की उतपत्ति एशिया माइनर – ईरान क्षेत्र , मध्य एशिया , हिमालय क्षेत्र तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र नामक तीन स्थानों पर मानी जाती है।  सरसों रबी की मुख्य फसल है। इसकी बुवाई अक्टूबर -नवम्बर व कटाई  फरवरी -मार्च में की जाती है।  इसकी खेती अधिकतर बारानी (असिचिंत ) व कहीं -कहीं सिंचित क्षेत्र में की जाती है। पादप ऊंचाई 3 -5 फीट तक होती है।
भारत में उत्तर प्रदेश , पंजाब , राजस्थान , मध्य प्रदेश तथा आसाम सरसों की खेती के प्रमुख केंद्र है।  विश्व में भारत सरसों का सबसे बड़ा  उत्पादक है। राजस्थान में इसे भरतपुर , अलवर , सवाई माधोपुर , करौली व अन्य जिलों में अधिकतर बोया जाता है।

पादप लक्षण –

  • सरसों का पौधा उधर्व , शाखित  तथा वार्षिक शाक होता है।
  • इनकी पर्ण सरल , एकान्तर विन्यासित , कटे -फटे किनारों युक्त होती है।
  • इसकी सतह पर अनेक रोम उपस्थित होते है।
  • पुष्पक्रम कोरिम्बनुमा असीमाक्षी प्रकार  पुष्प छोटे , पिले रंग के संवृत्त होते है।
  • इनके फल सिलिकुआ तथा बीज हल्के पीले व तेल युक्त अभ्रूणपोषी होते है।
  • सरसो के तेल में तीखी गंध होती है जो गंधक युक्त एलिल आइसोथायोसाइनेट की उपस्थिति के कारण होती है।
  • इनके  तेल अशुष्कन प्रकार के  होते  है।
  • तेल का लाक्षणिक वसीय अम्ल इरुसिक अम्ल है।
  • तेल भारी तथा सुनहरी पीले रंग का होता है।
 
उन्नत किस्में –  राजस्थान के लिए पूसा कल्याणी (लौटनी सरसों ) , वरुणा , दुर्गामणि , RH -30  व TM -11
                        TM -11 किस्म में तेल की मात्रा अन्य अभी किस्मों से अधिक होती है।

तेल के उपयोग –

  • सरसो का तेल प्रमुख खाद्य तेल है जो भोजन पकाने व अचार नमकीन आदि निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है।
  • मांसपेशियों के दर्द में इसके तेल की मालिश तथा कपूर मिश्रित कर त्वचा रोगो के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है।
  • सरसो के तेल का उपयोग साबुन उद्योग तथा मशीनों में लुब्रीकेंट के रूप में किया जाता है।
  • सरसो का तेल चमड़े को नरम व लचीला बनाने के लिए चर्म उद्योग में उपयोग किया जाता है।
  • बीजों को मसाले व अचार के रूप में उपयोग करते है।
  • सरसो की पत्तियाँ व फलियाँ आदि सब्जी में काम लेते है।
  • तेल निष्कासन के बाद बचे हुए बीज अपशिष्ट खली कहलाते है जो पशु आहार के रूप में खाद के रूप में उपयोग लेते है।
  • सम्पूर्ण पादप हरे चारे के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है तथा सूखे तने ईंधन के उपयोग में काम आते है।

2   मूंगफली , चीनी बादाम (Groundnut Peanut )

मूंगफली , चीनी बादाम (Groundnut Peanut )
वानस्पतिक नाम –  एरेकिस हाइपोजिया
कुल – फेबेसी (लेग्यूमिनोसी )
उपकुल –  पेपीलियोनेटी (लोटोइडी )
तेल के लिए उपयोगी पादप भाग –  बीज।

उतपत्ति व उत्पादक

मूंगफली की उतपत्ति केंद्र ब्राजील (दक्षिण अमेरिका ) है।  विश्व में भारत में मूंगफली के उत्पादन में प्रथम स्थान पर तथा चीन दूसरे स्थान पर है।  नाइजीरिया मूंगफली का सबसे बड़ा निर्यातक तथा फ़्रांस सबसे बड़ा आयातक देश है।  भारत में गुजरात , महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश , कर्नाटक तथा तमिलनाडु में मुख्य मूंगफली उत्पादक राज्य है। मूंगफली की खेती वर्षा ऋतू में खरीफ फसल के रूप में होती है।  फसल 100 -130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है।  एक किवंटल मूंगफली में 70 -75 किग्रा, गुलियाँ प्राप्त होती है।

वानस्पतिक लक्षण –

  •  इनके पादप वार्षिक , शाकीय , 30 -60 सेमी लम्बा होता है।
  • इसकी मुसला तंत्र में सहजीवी जीवाणु राइजोबियम निवास करता है।
  • इनकी पत्तियाँ संयुक्त , पिच्छाकार चार पर्णकी की होती है।
  • आधारी पत्तियों के कक्ष में पुष्प विकसित होते है , जो प्रारूपिक पेपीलियोनेशियस प्रकार के होते है।
  • इनमे स्वपरागण होता है।
  • इनमे फल का निर्माण मृदा सतह के निचे होता है अर्थात फल अन्त : भूमिक होते है।
  • इसका फल दीर्घित , अस्फुटनशील फली (लोमेन्टम ) होता है जिसमे 1 से 3 तक बीज होते है।

तेल के गुण –   मूंगफली का तेल अशुष्कन प्रकार का होता है।  इसका रंग सुनहरी पीला तथा एक रुचिकर गंध युक्त होता है।  तेल में वसीय अम्ल ऑलिक अम्ल (56 %) होता है।  इसके अतिरिक्त लिनोलेनिक अम्ल (25 %) पॉमिटिक अम्ल (6 -12 %) तथा अरेकिडिक अम्ल भी होते है।  तेल में फास्फोरस तथा विटामिनों (थियामीन , राइबोफ्लेविन तथा नियोसिन ) की भी पर्याप्त मात्रा होती है।

उन्नत किस्में –  राजस्थान के लिए उपयुक्त किस्मे – RS 1 , RSB -87 , AK -12 , 24 MA -10 , चन्द्रा , गिरनार।

 

तेल के उपयोग –

  • मूंगफली के बीज अत्यंत पोषक होते है अत : इनको कच्चा व भूनकर खाया जाता है।  एक पौण्ड मूंगफली से 2700  कैलोरी ऊर्जा मिलती है।
  • तेल का हाइड्रोजनीकरण कर वनस्पति घी बनाया जाता है।
  • तेल को चमड़ा मुलायम करने में तथा लेक्जेटिव के रूप में उपयोग करते है।
  • अच्छी किस्म के मूंगफली केक को पीसकर आटे में मिलाकर खाया जाता है जिससे भोजन में प्रोटीन की पूर्ति की जा सकती है।
  • इसके प्रोटीन से आर्डिल नामक कृत्रिम रेशा बनाया जाता है।
  • मूलों में राइजोबियम जीवाणु की उपस्थिति के कारण मूंगफली फसल को शस्यवर्तन फसल के रूप में बोया जाता है जिससे मृदा में नाइट्रोजन का स्तर बढ़ता है।
  • तेल में कीटनाशकों , जैसे – रोटिनोन , निकोटीन के साथ मिलाकर इसकी विषक्तता को बढ़ाया जा सकता है।
  • बीजचोल उतारकर गुलियों को पीसकर ;पी -नट -बटर ‘ तैयार किया जाता है।

3  नारियल , श्रीफल –

नारियल , श्रीफल –

 

  वानस्पतिक नाम–  कोकोस न्यूसीफेरा
  कुल – एरिकेसी या पामी
तेल के लिए उपयोगी पादप भाग –  भ्रूणपोष

उतपत्ति व उत्पादक देश

नारियल या ताड , आर्द्र उष्णकटिबंधीय पादप है जिसको तटीय क्षेत्र में व्यापक रूप से उगाया जाता है।  नारियल मुख्यत: फिलीपीन्स , इण्डोनेशिया , भारत , मैक्सिको , मलाया , श्रीलंका आदि देशो में उगाया जाता है।  फिलीपीन्स विश्व का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है , जबकि भारत का उत्पादन की द्रष्टि से तीसरा स्थान है।  भारत में मुख्तय: केरल , तमिलनाडु , कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में उगाया जाता है।  इन राज्यों के अतिरिक्त इसे गोवा , दमन तथा दीव , अण्डमान तथा निकोबार आईलेण्ड , महाराष्ट्र तथा उड़ीसा में भी उगाया जाता है।  राजस्थान में इसका व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता है।

वानस्पतिक लक्षण –

  • नारियल का फल बंदर के सिर जैसा दिखाई देता है।
  • इनका पादप लम्बा व अशाखित वृक्ष होता है।
  • इसकी लम्बाई 15 से ३० मीटर तक होती है।
  • तना लगभग एक समान मोटाई (40 से 70 सेमी) का होता है।
  • तने का आधारी बी हग अपस्थानिक जड़ो द्वारा घिरा होता है।
  • इनकी पत्तियां 6 से 18 फुट लम्बी होती है तथा पर्णक 2 -3 फिट लम्बे तथा शीर्ष नुकीले होते है।
  • पादप में 5 -6 वर्ष की आयु में पुष्पन प्रारम्भ होता है जो 50 वर्ष तक जारी रहता है।
  • पुष्प स्पेडिक्स पुष्पक्रम में विकसित होते है।
  • पुष्पक्रम में एक केंद्रीय अक्ष होता है जिस पर पार्श्व शाखाएं (40 ) तक विकसित होती है।
  • स्पेडिक्स के ऊपरी भाग में असंख्य नर पुष्प तथा आधारी भाग में 10 -15 मादा पुष्प स्थित होते है।
  • इनके फल 20 -30 सेमि  लम्बा , अण्डाकार होता है।
  • इनकी बाह्मा फलभित्ति कठोर , चिकनी तथा हरे रंग की होती है जो परिपक्व होने पर फट जाती है।
  • मध्य फलभित्ति मोटी तथा रेशेदार होती है।
  • अन्त: फलभित्ति के आधारी भाग में तीन आँख स्थित होती है इनमे से एक आँख बड़ी तथा मृदु होती है जिसके निचे भ्रूण स्थित होता है।
  • अन्त फलभित्ति के नीचे मोती परत के रूप में सफ़ेद रंग का भ्रूणपोष स्थित होता है जिसे सामान्य भाषा में गरी , खोपड़ा कहते है।
 
तेल के गुण –   नारियल का तेल शुद्ध अवस्था में रंगहीन या हल्के पिले रंग का होता है जो 23 -24 C के ऊपर तरल रूप में जबकि इससे निमन तापक्रम पर ठोस या अर्धठोस रूप में रहता है। इसमें उपस्थित प्रमुख वसीय अम्ल लॉरिक अम्ल (44 -51 %) , माइरिस्टिक अम्ल (13 -18 . 5 %) तथा पॉमिटिक अम्ल (7. 5 -10. 5%) है।  यह तेल अशुष्कन प्रकार का है।

तेल के उपयोग –

  • नारियल का तेल खाद्य तेल के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • हाइड्रोजनीकरण द्वारा तेल से वनस्पति घी बनाया जाता है।
  • इसके तेल को सिर के बालों में लगाते है , तेल से उत्तम किस्म के साबुन , शैम्पू तथा शेविंग क्रीम की सामग्री बनाई जाती है।
  • तरल भ्रूणपोष में पादप वृद्धि हार्मोन उपस्थित होते है इसलिए प्रयोगशाला में संवर्धन माध्यम में प्रयुक्त किया जाता है।
  • नारियल के बन्द स्पेडिक्स (पुष्पक्रम ) में चीरा लगाकर रस प्राप्त किया जाता है जिसे ‘ टोडी ‘ कहते है।  ऐसे उबालकर खजूर शर्करा प्राप्त करते है व इसके किण्वन से एल्कहॉलिक मादक द्रव तथा सिरका बनाया जाता है।
  • रेशेदार मध्य फलभित्ति कोयर का स्त्रोत है जिससे रस्सियाँ , ब्रुश , झाडू व गद्दे बनाये जाते है।
  • नारियल वृक्ष के लटठे झोपड़ी निर्माण में गर्डर के रूप में काम लेते है तथा पत्तियों से छप्पर , चटाइयाँ , टोकरी आदि का निर्माण किया जाता है।
  • नारियल के पके हुए शुष्क फल हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों तथा मन्दिरों में चढ़ाने में उपयोग में लेते है।

4  एरण्ड , अरण्डी (Castor Oil plant )-

एरण्ड , अरण्डी (Castor Oil plant )
वानस्पतिक नाम –  रिसिनस कॉम्यूनिस
कुल –  युफोब्रियसी
तेल के लिए उपयोगी भाग –  भ्रूणपोष
 
उत्पत्ति व उत्पादक –   अरण्डी पादप की उत्पत्ति भारत तथा उत्तरी अफ्रीका में हुई है। इसे विश्व के उष्णकटिबंधीय व उपउष्णकटिबंधीय जलवायु वाले देशों में उगाया जाता है।  ब्राजील , भारत , रूस , अर्जेन्टीना , चीन , थाईलेण्ड , सूडान आदि प्रमुख उत्पादक देश है।  भारत में आन्ध्र प्रदेश , गुजरात , कर्नाटक , मध्य प्रदेश , उड़ीसा तथा राजस्थान राज्यों में इसकी कृषि की जाती है।  राजस्थान में सिरोही में इसका अधिक उत्पादन होता है

वानस्पतिक लक्षण –

  • अरण्डी का पादप बहुवर्षी , दुर्बल , अरोमिल , सदा हरित , अर्धक्षुप है जो 2 -3 मीटर लम्बा होता है।
  • इनका तना खोखला , शाखित व चिकना होता है।
  • इनकी पत्तियाँ हरी या हरी लाल , सरल , हस्ताकार , शिराविन्यास , अपसारी व जलीय लेटैक्स युक्त होती है।
  • इनके पुष्प एकलिंगी परन्तु पादप द्विलिंगाश्रयी होते है , एक ही पुष्पक्रम में दोनों प्रकार के पुष्प उपस्थित , पुष्पक्रम के आधार भाग पर नर पुष्प व ऊपरी भाग पर मादा पुष्प होते है।
  • नर पुष्प में 5 पुंकेसर वृक्ष की जैसे शाखित होते है।
  • मादा पुष्प में जायांग त्रिअणपडी होते है।
  • इनके फल में रेग्मा होते है जो पकने पर फटकर तीन फलांशकों में  बिखर जाता है।
  • इनके बीज चिकने , धब्बेदार तथा केरनक्ल युक्त होते। है।
  • बीज में दो कागजी बीजपत्र परन्तु भ्रूणपोष मांसल व तेलयुक्त होता  है अत: भ्रूणपोषी बीज होता  है तथा तेल भी भ्रूणपोष से भी प्राप्त होता  है।
तेल के गुण –  तेल अशुष्कन प्रकार का रंगहीन या हल्का पीला , हरा , श्यान व पेट्रोलियम ईथर में अघुलनशील होता है।   इसमें रिसिनोलिक अम्ल (91 -95 %) की सर्वाधिक मात्रा होती  है।  अल्प मात्रा में लिनोलिक अम्ल (4 -5 %) तथा और कम मात्रा में पॉमिटिक व स्टीएरीक  वसीय अम्ल होते है।

तेल के उपयोग –

  • अरण्डी का तेल विरेचक व स्नेहक होता है।  इसका प्रयोग कब्जी को ठीक करने से मंद रेचक के रूप में करते है।  इसमें उपस्थित रिसिनोलिक अम्ल के कारण रेचक प्रभाव होता है।
  • तेल का उपयोग पारदर्शी साबुन तथा टूथपेस्ट बनाने , मशीन व हवाई जहाजों में स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • हाइड्रोजनीकरण द्वारा इसके ग्रीस , पोलिश व अन्य पदार्थ बनाये जाते है।
  • तेल का उपयोग कृत्रिम चमड़ा , तेलीय वस्त्र व प्लास्टिक उत्पादन में किया जाता है।
  • तेल का उपयोग कीटनाशी बनाने , खली का प्रयोग खाद व कीटनाशी के रूप में करते है।
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