इस संघ के जंतु कूट या देह गहिये  (Psuedocolemate ) तथा गोल या धागे लम्बे कृमि होते है अत : इन्हे ‘ गोल कृमि ‘ (round worms ) या “सूत्र कृमि” (thread worms ) कहा जाता है। इस  संघ के अंतर्गत लगभग 12000 जातियां ज्ञात है। जैसे – ऐस्केरिस , वुचेरिया इसके उदाहरण है।

 

लीनियस ने इन्हे वर्मीस (vermis ) समहू में रखा था।  किन्तु गेंगेनबार (Gegenbaur ) ने निमेटहेल्मिन्थीज (Nemathelminthes ) नाम प्रस्तावित किया था।  1910 में ग्रोबन (Grobben ) ने एस्कहेल्मिन्थीज (Aschelminthes ) नाम दिया।

इस संघ में पाए जाने वाले जंतुओं के प्रमुख लक्षण निमनलिखित है –

  • इस संघ के जंतु परजीवी तथा स्वतंत्रजीवी होते है। स्वतंत्रजीवी जलीय अथवा स्थलीय हो सकते है।
  • ये त्रीस्तरीय , द्वीपार्श्व सममित , अखण्डिय (non segmented ) , तथा कूटदेहगुहिय (psuedocoelmate ) जंतु होते है।
  • इनका शरीर लम्बा बेलनाकार कृमि समान होता है।
  • अग्र सिरे पर मुख  तथा संवेदी संरचनाएं पायी जाती है तथा पशच सिरे पर गुदा या अवस्कर पाया जाता है।
  • शरीर पर मोटी क्यूटिकल का आवरण पाया जाता है।
  • एपिडर्मिस बहुकेन्द्रिय होती है तथा भीतर की तरफ वलित होकर चार धारियों का निर्माण करती है।
  • केवल अनुदैधर्य पेशियां पायी जाती है तथा वे भी चार चतुथार्शो में बंटी होती है।
  • इनमे रक्त परिसंचरण तंत्र और श्वसन तंत्र नहीं पाए जाते है।
  • इनमे आहार नाल सुविकसित होती है
  • ये एकलिंगी होते है अर्थात नर एवं मादा जनन अंग अलग -अलग शरीर में पाए जाते है।
  • परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है।
  • उतसर्जन उतसर्जि नालो द्वारा होता है।
  • तंत्रिका तंत्र में एक तंत्रिका वल्य तथा लंबवत तंत्रिकाएं पायी जाती है।

संघ एस्कहेल्मिन्थीज का वर्गीकरण 

इस संघ के वर्गो को पांच भागों में बांटा गया है –

(1 )  वर्ग- रोटिफ़ेरा (Rotifera )

यह जलिय एवं स्वतंत्रजीवी व अति सूक्ष्म जंतु होते है।  क्यूटिकल कठोर कवच को तरह होती है।  इनमे आहार नाल पूर्ण विकसित व पोषणीय उपकरण सहित होते है।  एक जोड़ी शाखित व कुण्डलित आदिवृक्क पाए जाते है।  इनमे नेत्र बिंदु पाये जाते है।  इनमें एक लिंगाश्रयी , नर सामान्यत : छोटे अनुपस्थित होते है।  इनमे लार्वा अवस्था अनुपस्थित होते है।  और जनन लैंगिक अथवा अनिषेकजनन द्वारा ही होता है।


उदाहरण – एस्पलेंकना (Asplanchna ) 

(2 ) वर्ग – गैस्ट्रोट्राइका (Gastrotricha )

इस वर्ग के जंतु जलीय , स्वतंत्रजीवी व अति सूक्ष्म  होते है। इनका शरीर कृमि समान व अधर सतह की तरफ चपटा व पक्ष्माभ युक्त होता है। इनमे क्यूटिकल पतली कंटकित होती है।  पाचन तंत्र सुविकसित होता है मुख पर रोम भी पाये जाते है। इनमे एक जोड़ी आदिवृक्क पाए जाते है।  इनमे केवल मादाएं पायी जाती है या जंतु उभयलिंगी होते है। परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है। जनन अनिषेकजनन द्वारा या लैंगिक जनन द्वारा होता है।

(3 )  वर्ग –  निमेटोमॉरफा (Nematomorpha )

वयस्क स्वतंत्रजीवी  किन्तु लार्वा अवस्था परजीवी होता है।  इनका शरीर लम्बा , अखण्डित , कृमि समान होता है।  इनमे पाचन तंत्र विलुप्त या अल्प विकसित द्वारा होता है।  इनमे उतसर्जि तंत्र का अभाव होता है।  इनमे लिंग पृथक -पृथक होते है।  इनमे परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है।


उदारहण – पेरागोडिर्यस (Paragordius ) 

(4 ) वर्ग – काइनोरिन्का (Kinorhyncha )

इस वर्ग के जंतु लवणीय जल में पाए जाने वाले अति सूक्ष्म होते है।  इनके शरीर में 13 या 14 लैपित वलय पाये जाते है।  इनमे क्यूटिकल कंटिकीय पक्षमाभ विहीन होती है।  इनमे आहार नाल सुविकसित होती है।  इस वर्ग के जंतु में एक जोड़ी आदिवृक्क पाये जाते है।  इनमे लिंग पृथक -पृथक होते है तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है।

उदाहरण –  इकाइनोडेरस (Echinoderes )

(5 )  वर्ग – निमेटोडा (Nematoda )

इस वर्ग के जंतु जलीय स्थलीय या परजीवी होते है।  इनका शरीर लम्बा , गोल कृमि समान होता है। इनमें क्यूटिकल मोटी व ढृढ़ होती है।  एपिडमिरस बहुकेन्द्रिय होती है।  आहार नाल सुविकसित होती है। और लिंग पृथक -पृथक होते है।  इनमे परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है।  उतसर्जि तंत्र सरल प्रकार का एक या दो नलिकाओं का बना होता है।

उदाहरण – एस्केरिस (Ascaris ) , एन्टेरोबिसयस (Enterobius ), ऑक्सीयूरिस (Oxyuris ), ड्रेकनकुलस (Dracunculus ), ट्राईक्यूरिस (Trichuris )

महवत्पूर्ण तथ्य –

  • ट्राइकिनेला मनुष्य , सूअर आदि स्तनपायी जंतुओं की आंत में पाया जाता है एवं ट्राईकिनोसिस (Trichinosis ) नामक रोग उतपन्न होता है।
  • एस्केरिस (Ascaris ) मनुष्य की छोटी आंत में पाया जाता है तथा ऐसकेरिएसिस (Asacariasis ) नामक रोग उतपन्न होता है।
  • वुचेरिया द्वारा मनुष्य में फाइलेरिया रोग उतपन्न होता है।

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