संघ सीलेन्ट्रेटा या निडेरिया
संघ सीलेन्ट्रेटा या निडेरिया 
सीलेन्ट्रेटा शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्द Koilos = Hollow , Enteron = Intestine से मिलकर बना है। इसका नाम निडेरिया (Cnidaria ) जो ग्रीक भाषा के शब्द Knide =Nettle or Stinging cell bearing अर्थात दंशकोशिका धारक से बना है।  सीलेन्ट्रेटा शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लुकार्ट ( Leucart ) ने 1847  ई. में किया।  हेरचेक ने 1878 में इस संघ का नाम निडेरिया रखा। इस संघ में लगभग 9500 जातियां है। ये बहुकोशिकीय प्राणियों में निमन  स्तर के जंतु है।  इनमे अधिकांश समुद्र में पाए जाते है। इस संघ में जीवो की उतपत्ति प्री -कैम्ब्रियन काल में हुई।

इस संघ के जंतुओं के प्रमुख लक्षण निमन है

  • ये जलीय अधिकांश समुद्री,एकाकी या संघचारी (Colonial ) जंतु है।
  • ये द्विस्तरीय (Diploblastic ) प्राणी होते है।  शरीर का बाहय स्तर एक्टोडर्म तथा भीतरी स्तर एण्डोडर्म या गेस्ट्रोडर्मिस होता है।  दोनों स्तरों के बीच में अकोशिकीय मेसोग्लिया होता है।  शरीर की कोशिकाएं ऊतक स्तर पर व्यवस्थित होती है।
  • ये जंतु बहुकोशिकीय होते है।  जिनके अंदर सिर्फ एक गुहा पायी जाती है जिसे अन्तरगुहा (coelenteron ) कहते है।
  • इसका सर अरीय सममित होता है।
  • इनमे सिर नहीं होती है।
  • इनमे गुदा नहीं होती है।
  • इनमे पाचन गुहा थैली जैसी होती है।
  • इनमे मुख के चारो ओर लम्बे -लम्बे स संस्पर्शक (Tentacles ) पाए  जाते है।
  • इनमे संस्पर्शक तथा शरीर के अन्य भागों में दंश कोशिकाएं (Nematoeyst ) पाये जाते है।  टिनोपिरा (Tenophora ) में दंश कोशिकाएं अनुपस्थित होती है।
  • इनमे श्वसन तंत्र, उतसर्जन तंत्र एवं परिसंचरण तंत्र नहीं पाया जाता है।
  • इनमे तंत्रिका कोशिकाओं की शाखाएं आपस में मिलकर तंत्रिकाओं का जाल बनाती है।
  • इनमे नेत्र बिंदु या स्टेटोसिस्ट (Statocyst ) पाये जा सकते है।
  • पॉलीपॉयड  (Polypoid ) चूनेदार अस्थि का निर्माण करते है जिसे कोरल कहते है।
  • इनके जीवन चक्र में पीढ़ी एकान्तरण या मेटाजेनेसिस पाया जाता है।  ये दो प्रकार के होते है -पॉलीपॉयड और मेड्यूसोएड।
  • इनमे अलैंगिक प्रजनन मुकुलन द्वारा लिंगी प्रजनन युग्मको द्वारा होता है।
  • इनके लार्वा मुख्यत : प्लेनुला कहते है।
  • इनकी कोशिकाओं में स्थायी श्रम विभाजन पाया जाता है अर्थात अलग -अलग कार्यो के सम्पादन के लिए भिन्न -भिन्न कोशिकाएं होती है।
  • श्वसन एवं उतसर्जन की क्रिया शरीर की सतह से होती है।
  • इनमे मस्तिष्क का आभाव होता है।

संघ सीलेन्ट्रेटा का वर्गीकरण 

सीलेन्ट्रेटा या निडेरिया के चार वर्गो में बांटा गया है –

(1 ) वर्ग  हाइड्रोजोआ (Hydrozoa )- (Hydro -जल , zoa – जंतु )

इसमें  केवल पॉलिप ही होता है व मेड्यूसा अनुपस्थित होता है। इनमे स्टोमोडियम (Stomodeum ) अनुपस्थित होता है।  स्टोमोडियम  जठर संवाही गुहा का एक्टोडर्म द्वारा निर्मित अग्र भाग है। इनमे दंश कोशिकाएं नहीं पायी जाती है। कुछ हाइड्रोजोआ  में मेड्यूसा पाया जाता है।  मेड्यूसा में वीलम पायी जाती है , इस प्रकार के मेड्यूसा को क्रेस्पीडोट कहते है।
वर्ग हाइड्रोजोआ को चार गण में बांटा गया गया है –
  1. Hydroida   – उदाहरण – हाइड्रा , ओबेलिया , पिन्नेरिया , मिलीपोरा, गोनियोनिमस , वेलेला।
  2. Trachylina 
  3. Actinulina –  उदाहरण – ऑटोहाईड्रा , हेलमोहाईड्रा।
  4. Sliphanophora –  उदाहरण – फाइसेलिया , एगेलमा , नेकटेलिया।
(2 ) वर्ग साइफ़ोज़ोआ (Scyphozoa )-  (scypho – कप या प्याला zoa -जंतु ) 
इनकी आकृति प्याले या छतरी के समान होती है इनको जैलिफिश भी कहते है।  इसमें पॉलिप व मेड्यूसा दोनों होता है।  इनमे दंश कोशिकाएं पायी जाती है।
 वर्ग साइफ़ोज़ोआ को चार गण में बांटा गया है –
  1. Stauromedusae – उदाहरण – क्रेटिरोलोफस , ल्यूसरनेरिया।
  2. Coronatae  – उदाहरण – पेरिफाइला , एटोला।
  3. Semaeostome – उदाहरण – ओरेलिया , सायनिया।
  4. Rhizostome  – उदाहरण-राइजोस्टोमा।

(3 ) वर्ग क्यूबोजोआ (Cubozoa )-  [cubo =घन , zoa – जंतु ] 

इनकी आकृति छतरी के समान होती है लेकिन इनका छत्रक घनाकार होता है। इनमे स्टोमोडियम उपस्थित होता है।  इनमे दंश कोशिकाएं पायी जाती है। इसमें पॉलिप व मेड्यूसा दोनों होता है। ये अत्यंत विषैले होते है इसलिए इनको समुद्री तेतेया कहते है।
 

(4 )वर्ग एंथोजोआ (Anthozoa )- [ Antho – पुष्प , zoa – जंतु ]

इनकी आकृति पुष्प के समान होती है इसलिए इनको समुंद्री एनीमोन कहते है। इनमे स्टोमोडियम उपस्थित होता है।  इनमे दंश कोशिकाएं पायी जाती है। इसमें पॉलिप व मेड्यूसा दोनों होता है। ये Csco₃ से बने कंकाल का निमार्ण करते है जिनको प्रवाल भित्ति कहते है। ये निडेरिया का सबसे बड़ा वर्ग है।
उदाहरण – ट्यूबीपोरा , एलसायोनियम (dead man ‘s finger ), हेलीओपोरा (blue coral नीला मूंगा ), एडमासिया (Sea anemone )

महत्वपूर्ण तथ्य 

  • हाइड्रा में अमरत्व (Immortality ) का गुण पाया जाता है।
  • ऑरेलिया को साधारणत : जेलीफिश कहा जाता है।  मेसोगलिया से अधिक विकसित होने के कारण ऑरेलिया का शरीर काफी मोटा जेली जैसा लगता है।
  • मेट्रोडियम को सी -एनीमोन के नाम से जाना जाता है।
  • गोर्गोनिया को समुद्री पंखा तथा पेनातुला को समुद्री कलम कहा जाता है।
  • फाईसेलिया को साधारणत : पुतर्गाली युद्धपोत कहा जाता है , क्योंकि इसे देखने पर यह एक उल्टा जंगी जहाज जैसा लगता है।
पॉलिप तथा मेडुसा 
अधिकांश जातियां दो में से एक रूप में पाई जाती है। पालिप (पॉलिप ) रूप में या मेडुसा रूप में और जिनमे एकान्तरण होता है उनमे एक पीढ़ी एक रूप की तथा दूसरी पीढ़ी दूसरे रूप की होती है।

पॉलिप  रूप 

समुद्रपुष्प या सी एनीमोन
समुद्रपुष्प या सी एनीमोन 
पॉलिप रूप के अंतरगुहि जलीयक (हाइड्रोजोआ ) तथा पुष्पजीव (एंथोजोआ )वर्गो में पाए जाते है। सरल रूप का पॉलिप गिलास जैसा या बेलनाकार होता है।  उसका मुख ऊपर की ओर तथा मुख की विपरीत दिशा पृथ्वी की ओर होती है।  उपनिवेश (कॉलोनी ) बनानेवाली जातियों में मुख की विपरीत दिशावाले भाग से पॉलिप उपनिवेश से जुड़ा रहता है।  ऐसी जातियों में विभिन्न पॉलीपो की आंतरगुहाए एक दूसरे से शाखाओं की गुहाओं द्वारा सम्बंधित रहती है। ऐसी जातियों में सभी पॉलिप एक जैसे नहीं होते।  कुछ पॉलिप मुखसहित होते है और भोजन ग्रहण करते है तो मुखरहित होते है और भोजन नहीं ग्रहण कर सकते।  ये केवल जनन क्रिया में सहायक होते है।
जलीयको के पॉलीपो की आंतरगुहा सरल आकार की थैली जैसी होती है , किन्तु पुष्पजीवो में कई खड़े दीवार की भीतरी पर्त से निकलते है।
समुद्रपुष्प (सी एनीमोन ) समुद्र की पेंदी पर चिपका रहता है।  देखने में यह फूल सा लगता है , किन्तु यह प्राणी और अपनी स्पर्शिकाओं द्वारा छोटे जीवो को पकड़कर पचा डालता है। समुद्रपुष्प की संरचना अन्य पॉलीपो की तरह होती है।  खोखले बेलनाकार स्तम्भ के ऊपर गोल टिकिया सी रहती है , जिसके बीच में मुँहवाला छेद होता है और स्पर्शिकाओं की एक या अधिक तह होती है। स्तम्भ का निचला सिरा चिपटे पाँव की तरह होता है इसी के सहारे समुद्रपुष्प विविध वस्तुओं में चिपकता है।  परन्तु वह स्थायी जगह नहीं चिपका रहता है। समुद्रपुष्प चल सकता है , परन्तु धीरे -धीरे।  ये विविध रंगो के होते है और इन पर सुंदर धारियाँ और ज्यामितीय चित्रकारी रहती है। ये मांसाहारी होते है और अपनी स्पर्शिकाओं  से छोटे जीवों को पकड़कर खाते है।

मेडुसा 

मेडुसा
मेडुसा 
उन आंतरगुहियों को जिन्हे लोग गिजगिजिया (अग्रेंजी में जेली फिश ) कहते है , वैज्ञानिक भाषा में मेडुसा कहते है।  मेडुसा का शरीर छतरी के समान होता है और भीतरसे , उस बिंदु पर जहां छतरी की डंडी लगनी चाहिए वह मुख होता है।  छतरी के आकार होने के कारण इन्हे हिंदी में छत्रिक कहा जाता है।  इनका शरीर अत्यंत नरम होने के कारण इन्हे साधारण भाषा में गिजगिजिया कहते है। ये बड़े सुंदर होते है।  इनके शरीर की संरचना तंतुमय होती है , न बाहर हड्डी होती है और न भीतर। इनके भीतर बहुत सा जल रहता है।  इसलिए पानी के बाहर निकले जाने पर चिचुक जाती है और उनकी सुंदरता जाती रहती है।
समुद्रतट पर खड़े होने से ये जंतु पानी में तैरते हुए कभी न कभी दिखाई देते है। उनकी स्पर्शिकाएँ निचे झूलती रहती है और ऊपर छतरी की तरह उनका शरीर फुला रहता है। गिजगिजिया इच्छित दिशा में जा सकती है ये तेज नहीं तैर सकती।  तैरने के लिए यह अपने छतरी जैसे अंगो को बार -बार फुलाती पिचकाती है।
गिजगिजिया की कई जातिया होती है। कुछ में छतरी की तीन फुट व्यास की होती है, परन्तु अन्य जातियों में छतरियां छोटी होती है।  गिजगिजिया विविध सुंदर रंगो की होती है। तैरनेवालो को गिजगिजिया से बच के रहना चाहिए , क्योंकि उनकी बाहुओं में अनेक नलिकाएँ होती है जो शत्रु के शरीर में विष पहुँचाती है।  बड़ी गिजगिजिया की स्पर्शिकाएँ कई गंज लम्बी होती है।  एक चपेट में आ जाने से मनुष्य को घंटो पीड़ा होती है।  कभी कभी मृत्यु भी हो  जाती है।

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