एकाइनोस का (Echinos ) अर्थ होता है कंटक तथा डर्मा (Derma ) का अर्थ होता है त्वचा अर्थात इस संघ में आने वाले जंतुओं की त्वचा कंटक युक्त होती है।  इस संघ के जंतु सामान्यत : समुद्री होते है तथा इनकी त्वचा पर कांटिकाये पायी जाती है।  त्वचा पर कांटिकाये पाए जाने के कारण ही इस संघ का नाम  एकाइनोडर्मेटा  (Echinos = Spines , Dermatos = Skin ) पड़ा।
संघ इकाइनोडर्मेटा
संघ इकाइनोडर्मेटा 
इस संघ का नामकरण जेकब क्लीन (Jacob Klein ) ने दिया था।  इनको शुलयुक्त प्राणी भी कहते है।  इस संघ में लगभग 4000 जातियां पायी जाती है।  इस संघ के सभी जंतु समुद्रवासी तथा पंचअरीय सममिति वाले होते है।

संघ एकाइनोडर्मेटा के सामान्य लक्षण

  • इस संघ के सभी जंतु समुद्रवासी होते है।
  • इनका शरीर अखण्डित सितारे केआकार का , गोलाकार या बेलनाकार होता है।
  • ये त्रिस्तरीय , देहगुहिय (इनमे देहगुहा आंत्र गुहिय प्रकार की होती है ) व पंच अरीय सममिति वाले होते है. पंच अरीय सममिति की उतपत्ति द्विपाशर्व सममिति से होती है।
  • इनकी त्वचा कंटकीय होती है तथा अधिचर्म द्वारा आवृत शूलों व चर्मीय केल्केरियाई अस्थिकाओं का बना बाह्मा कंकाल पाया जाता है।
  • त्वचा पर सुरक्षा हेतु  कैंची जैसे पेडिसिलेरिया (Pedicellariae ) पाये जाते है।
  • इनमें सिर अनुपस्थित होता है।
  • गमन हेतु नाल पाद पाए जाते है।
  • देहगुहा या सीलोम सुविकसित होती है तथा यह आंत्र गुहिय प्रकार की होती है।
  • इनमे हिमल तथा परिहिमल तंत्र पाये जाते है।
  • इनमें आहार नाल सीधी या कुंडलित होती है।
  • इनमे नर और मादा अलग -अलग होते है।
  • इनमें तंत्रिका तंत्र अल्प विकसित होता है।
  • इनमे उतसर्जन अंग नहीं पाए जाते है।
  • इनमें लैंगिक प्रजनन होता है।
  • ये एकलिंगी होते है
  • इनमें निषेचन बाह्मा होता है।
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा विभिन्न प्रकार के लारवा पाये जाते है।
  • इनमें पुनरुदभवन की क्षमता पायी जाती है।
  • तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क अनुपस्थित होता है।
  • इनमें श्वसन चर्मीय क्लोम , नाल पाद , श्वसन वृक्ष तथा बर्सी द्वारा होता है।

संघ एकाइनोडर्मेटा  का वर्गीकरण

एकाइनोडर्मेटा  दो उपसंघो में बांटा गया है –

I   उपसंघ – एल्यूथीरोजोआ (Eleutherozoa )

लक्षण –
  • इस उपसंघ में वे जंतु सम्मिलित किये जाते है जो स्वतंत्रजीवी होते है।
  • इनमें मुख अधर सतह पर पाया जाता है।
इस उपसंघ को चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
1  वर्ग – एस्टीरॉइडिया (Asteroidea )-
लक्षण
  • इनमे पांच जोड़ी भुजाएं पायी जाती है जो केंद्रीय बिम्ब से स्पष्ट रूप से अलग नहीं होती है।
  • मुखतल की तरफ खुली हुई वीथी खांचे पायें जाते है जिनमे चूषक युक्त नाल पाद पायें जाते है।
  • इनमे गुदा व परन्ध्रक (Madreporite ) अपमुख सतह पर उपस्थित होते है।
  • ये स्वतंत्र जीवी तथा मांसाहारी जंतु होते है।
  • ये एकलिंगी होते है।
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा बाइपिन्नेरिया लारवा पाया जाता है।
  • इस वर्ग में तारा मछलियाँ या सागर – तारे आते है।
इस वर्ग को दो उपवर्गों में बांटा गया है 
(i ) उपवर्ग – सोमेस्टीरॉइडिया (Somasteroidea ) – इस उपवर्ग की एक जाति प्लेटस्टीरियस लेटीरेडिएटा (Platasterias latiradiata ) के ही जंतु जीवित है।  शेष सभी विलुप्त हो चुके है।
(ii ) उपवर्ग – युएस्टेरॉइडिया (Euasteroidea ) – इस उपवर्ग में सभी जीवित सागर तारे आते है इसे तीन गणों में वर्गीकृत किया जाता है।
पेंटासिरोस (Pentaceros )
पेंटासिरोस (Pentaceros )
I गण – फेनेरोजोनिया (Phanerozonia )
 
उदाहरण – एस्टेरापेकटन (Asteropecten ), पेंटासीरोस (Pentaceros ) , एथीनिया (Anthenea )
II गण – स्पाइनुलोसा (Spinulosa )
 
उदाहरण – एस्टेराइना (Asterina )| , सोलेस्टर (Solaster )
III  गण – फ़ोरसीपुलेटा (Forcipulata )
 
उदाहरण – एस्टरीरिएस (Asterias )

2 वर्ग – आफियुराइडिया (Ophiuroidea )

 
लक्षण –
  • इनमे पांच भूजाएं केंद्रीय बिम्ब से स्पष्ट रूप से पृथक होती है।
  • मुख तथा प्रन्धरक मुख सतह की तरफ स्थित होते है।
  • वीथी खाँचो का अभाव होता है या ये अस्थिकाओं से ढकी होती है।
  • नाल पाद में चूषकों का आभाव होता है।
  • पेडिसिलेरिया अनुपस्थित होते है।
  • आमाशय कोष के समान होता है।
  • गुदा अनुपस्थित होता है।
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।  इनका लार्वा ऑफिओपलूटीएस (Ophiopluteus ) कहलाता है।
  • इस वर्ग के जंतुओं को सामान्यत : भंगुर तारे या सर्प तारे कहते है।
इस वर्ग को तीन गणो में वर्गीकृत किया जाता है –
I  गण – स्ट्रेप्टोफ्यूरी (Streptophiurae )
 
उदाहरण – ओफियोमिक्सा (Ophioyxa )
II गण – जाइगोफ्यूरी (Zygophiurae )
 
उदाहरण – ओफियोथ्रिक्स (Ophiothrix ), ओफ़ीयुरा (Ophiura ) , ओफियोलेपिस (Ophiolepis ), ओफियोडर्मा (Ophioderma )
 ओफियोथ्रिक्स (Ophiothrix )
ओफियोथ्रिक्स (Ophiothrix )
III गण – क्लेडोफ्यूरी (Cladophiurae )
 
उदाहरण – गोर्गोनोसिफेलस (Gorgonocephalus )

3 वर्ग – एकाइनोडिया (Echinoidea )

लक्षण –
  •  इनका शरीर बिम्बाभ , अण्डाकार या अर्द्धगोलाकार तथा भुजाविहीन होता है।
  • इनकी सममितिपंच अरीय होता है।
  • वीथी गतिशील शूलों का कंकाल पाया जाता है।
  • वीथी खांचे बंद तथा अस्थिकाओं से ढकी रहती है।
  • नाल पादो में चूषक पाये जाते है।
  • विशेष प्रकार का चर्वण उपकरण पाया जाता है जिसे अरस्तु की लालटेन कहते है।
  • इनमे मुख व गुदा विपरीत सतहों पर स्थित होते है।
  • इनमें पांच या पांच से कम जनन ग्रंथिया पायी जाती है।
  • परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है तथा इनका लार्वा प्लुटियस कहलाता है।
इसे तीन उपवर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
(i ) उपवर्ग – ब्रोथीओसीडेराइडा (Bothriocidaroida )
 
 लक्षण –
  • इनमें प्रारूपी लालटेन का अभाव होता है।
  • अंतविर्थी क्षेत्र में प्लेटों की केवल एक पंक्ति पायी जाती है।
  • इस उपवर्ग के सभी जंतु विलुप्त हो चुके है।
उदाहरण – ब्रोथीओसीडेरिस (Bothriocidaris )
(ii ) उपवर्ग – रेगुलेरिया (Reguleriya )
लक्षण –
  • इनका शरीर ग्लोबाकार व पंच अरीय सममित होता है।
  • इनमें अंतविर्थी क्षेत्र में प्लेटों को दो पंक्तिया पायी जाती है।
  • सुविकसित अरस्तु की लालटेन नामक चर्वण उपरकण पाया जाता है।
  • मुख केंद्रीय होता है तथा प्रन्धरक भी मुखीय सतह पर स्थित होता है।
  • गुदा अपमुखी सतह पर केंद्रीय होता है।
इस उपवर्ग को तीन गणो में वर्गीकृत किया जा सकता है –
I  गण – लेपिडोसेंट्राइडा (Lepidocentroidea )
 
उदाहरण – पेलियोडिस्कस (Palaeodiscus )
II गण – मेलोनइकाईनोइडिया (Melonechinoda )
 
उदाहरण – मेलोनइकाइन्स (Melonechinus )
III  गण – डायडेमेटॉइडा (Diadematoidea )
 
उदाहरण – इकाईनस (Echinus ) , डायडेमा (Diadema )
(iii ) उपवर्ग – इर्रेगुलेरिया (Irreguleriya )
लक्षण
  •  इनका शरीर गोलाकार या अण्डाकार होता है तथा मुख से अपमुख सतह की तरफ चपटा होता है।
  • नाल पाद गमन में सहायक नहीं होते है।
  • मुख मुख सतह पर केन्द्रकी तरफ होता है।
  • सुविकसित अरस्तु की लालटेन पायी जाती है।
इस उपवर्ग को दो गणो में वर्गीकृत किया जा सकता है –
( I)  गण – कलाईपिएस्ट्राइडा (Clypeastroida )
 
उदाहरण – क्लाईपीएसटर (Clypeaster ) , केरिडूल्स (Carridulus )
(II)  गण – स्पेटेन्गोइडिया (Spatangoidea )
 
उदाहरण – इकाईनोकार्डियम (Echinocardium )

4 वर्ग – होलोथूराइडिया (Holothuroidea )

 
लक्षण –
  • इनका शरीर लम्बा बेलनाकार खीरे समान होता है।
  • इनके सिर पर भुजाएं व शुक नहीं पाये जाते है।
  • वीथी खांचे  बंद होती है।
  • मुख स्पर्शको से घिरा रहता है।
  • देहभित्ति पेशीय व चर्मिल होती है।
  • श्वसन के लिए श्वसन वृक्ष पाया जाता है।
  • गुदा विशेष प्रकार की गुड़ पेपिला से घिरा रहता है।
  • नाल पाद चूषक युक्त होते है।
  • इनके लारवा औरिकुलेरिया कहलाता है।
इस वर्ग को तीन गणो में वर्गीकृत किया जाता है –
(I)  गण – एस्पीडोकाइरोटा (Aspidochirota )
 
उदाहरण – होलोथूरिया (Holothuria )
 कुकुमेरिया (Cucumaria )
कुकुमेरिया (Cucumaria )
(II )गण – डेन्ड्रोकाइरोटा (Dendrochirota )
 
उदाहरण –  कुकुमेरिया (Cucumaria )
(III ) गण – सिनेपडिता (Synaptida )
 
उदाहरण – सिनेप्टा (Synapta )
II  उपसंघ – पेलमेटाजोआ (Pelmatzoa )
 
लक्षण –
  • इस उपसंघ के जंतु सवृन्त व स्थानबद्ध होते है।
  • मुख व गुदा ऊपरी सतह पर स्थित होते है।
इस उपसंघ में केवल एक ही वर्ग आता है –

5 वर्ग – क्रिनॉइडिया (Crinoidea )

 
लक्षण –
  • ये जीवन के कुछ समय या जीवन पर्यन्त सतह पर चिपके रहते है।
  • मुख व गुदा दोनों मुख सतह पर पाये जाते है।
  • इनकी भुजाएं शाखित व पिच्छाकार होती है।
  • मुख सतह पर पक्ष्माभित वीथी खांचे पायी जाती है।
  • नाल पादो में चूषकों का आभाव होता है।
  • इनकी आहार नाल ‘U ‘ के आकार की होती है।
  • शरीर में केंद्रीय डिस्क प्यालेसमान केलिक्स बनाती है।
इस वर्ग में केवल एक गण आता है –
 
 I  गण – आर्टीकुलेटा (Articulata )
 
उदाहरण – एन्टीडोन (Antedon ) या समुद्री लिली , निओमेट्रा (Neometra ) या फैदर तारा।
4 thoughts on “Echinodermata संघ एकाइनोडर्मेटा (Phylum Echinodermata ) के लक्षण, वर्गीकरण और इसके उपवर्ग”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *