Mollusca ग्रीक भाषा के शब्द Mollis से बना है जिसका अर्थ  कोमल शरीर  होता है।  यह आर्थोपोडा के बाद एनिमेलिया जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है।
संघ मोलस्का (Phylum Mollusca )
संघ मोलस्का (Phylum Mollusca )
शरीर कोमल व खण्डविहीन होता है तथा कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढका रहता है।  इस संघ को मोलस्का नाम जॉनसन (Johnson ) ने दिया था।  इस संघ के जंतुओं के अध्ययन को मेलेकोलोजी कहते है तथा इनके कवचों के अध्ययन को कान्चोलोजी (Chonchology ) कहते है।

संघ मोलस्का के लक्षण –

  • इनका शारीरिक संगठन अंग तंत्र कोटि का होता है।
  • यह त्रिस्तरीय , देहगुहिय , खण्डविहीन (कुछ को छोड़कर ) तथा द्विपार्श्व सममित होता है।
  • शरीर कोमल होता है तथा सिर , प्रावार (Mantle ) , पाद तथा आन्तरांग पुंज में विभेदित होता है।  प्रावार की उपस्थिती संघ मोलस्का की विशेषता होती है।
  • कोमल शरीर की सुरक्षा के लिए सामान्यत : कैल्शियम कार्बोनेट का बना कवच पाया जाता है।  जिसका स्त्रावण प्रावार करती है।
  • इनमे पेशिय पाद पाया जाता है जो गमन , बिल बनाने तथा तैरने में सहायक होता है।
  • ये जलीय या स्थलीय आवास में पाये जाते है।
  • इनमें विदलन सर्पिल होता है।
  • इनमें परिवर्धन अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष होता है।
  • ये अधिकांशत : अंडप्रजक होते है कुछ शिशुप्रजक भी होते है।
  • इनमें निषेचन बाह्मा या आंतरिक होता है।
  • ये पृथकलिंगी होते है। इनमे 1 ,2 या 4 जनन ग्रँथियां पायी जाती है।  जनन ग्रंथियों में जनन वाहिकाएं भी पायी जाती है।
  • इनमे नेत्र , संतुलन पुटिकाएँ व जलक्षीका आदि संवेदांग पाये जाते है।
  • इनके तंत्रिका तंत्र में युग्मित गुच्छक , संधाईया व संयोजनिया पायी जाती है।  इनमें प्रमुख रूप से प्रमस्तिष्क व आन्तरांग गुच्छक पाये जाते है।
  • इनमें उतसर्जन मेटानेफ्रीडिया या वृक्कों द्वारा होता है।  इनके अलावा इनके बोजेनस के अंग तथा केबर के अंग भी पाये जाते है।
  • इनमें श्वसन , त्वचा द्वारा ,गिल द्वारा या फुफ्फुसों द्वारा होता है।
  • इनमें रक्त रंगहीन या नील रंग का होता है।  इसमें हिमोसायनिन नामक श्वसन वर्णक पाया जाता है।
  • परिसंरचन तंत्र खुले प्रकार का होता है।  इनमे पृष्ठ की तरफ ह्रदय पाया जाता है जो हृदयावरण से घिरा रहता है।  इनमे ह्रदय पेशीजन्य होता है।
  • इनकी मुख गुहा में एक विशिष्ट रेतनांग पाया जाता है।
  • पाचन तंत्र पूर्ण विकसित होता है तथा एक पाचक ग्रंथि , यकृत पायी जाती है।
  • प्रावार मोटा पेशीय होता है। यह आन्तरांग पुंज को घेरे रहता है।  आन्तरांग पुंज तथा प्रावार के बीच प्रावार गुहा पायी जाती है जिसमे गिल पाए जाते है।
  • शरीर के अग्र भाग में स्पष्ट सिर पाया जाता है , जिसमे नेत्र , स्पर्शक , शीर्षस्थ मुख व अन्य संवेदांग पाये जाते है।
  • इनकी आहारनाल पूर्ण होती है और यह U के आकार की होती है।  आहरनाल से संबद्ध एक पाचनग्रंथि होती है।

संघ मोलस्का का वर्गीकरण

संघ मोलस्का को प्रमुख रूप से छ: वर्गो में वर्गीकृत किया जाता है।  इनका वर्गीकरण पाद की संरचना , शवसनांगो , प्रावार तथा कवच की बनावट के आधार पर किया गया है।

1  वर्ग – मोनोप्लेकोफोरा (Monoplacophora )

लक्षण –
  1. ये समुद्री जल में रहते है।
  2. इनके कुछ शारीरिक अंगो में खंडीभवन पाया जाता है।
  3. इनका शरीर द्विपाशर्व सममित तथा त्रिस्तरीय होता है।
  4. इनके पृष्ठ सतह पर एकल लिम्पेट के आकार का कुण्डलित कवच पाया जाता है।
  5. इनमे 8 जोड़ी खण्डीय आकुंचक पेशियाँ पायी जाती है।
  6. इनमे पांच जोड़ी गिल या क्लोम पाये जाते है।
  7. इनमे छ : जोड़ी वृक्क पाए जाते है।
  8. प्रावार भित्ति पायी जाती है।
  9. इनमे ऐनेलिडा तथा मोलस्का दोनों संघो के लक्षण पाए जाते है अत : इस वर्ग के जंतुओं को  इन संघो के बीच की योजक कड़ी माना जाता है।
  10. मुख गुहा में रेडुला पाया जाता है।
उदाहण नियोपिलाइना (Neopilina ) ( इसे मोलस्का का पूर्वज व जीवित जीवाश्म माना जाता है। )

2  वर्ग – एमफिन्यूरा (Amphineura )

लक्षण – 
  1. ये समुद्री जल में पाये जाते है।
  2. इनका शरीर चपटा व अण्डाकार या लम्बा होता है।
  3. अधर तल पर चपटा व बड़ा पाद पाया जाता है।
  4. सिर में नेत्रों व स्पर्शकों का आभाव होता है।
  5. प्रावार व रेडुला पाये जाते है।
  6. ट्रोकोफोर लारवा पाया जाता है।
  7. निषेचन बाह्मा व परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।
  8. इनकी पृष्ठ सतह पर 8 प्लेटों का बना कवच पाया जाता है या अनुपस्थित होता है।
इस वर्ग को दो उपवर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –
(i ) गण – एप्लोकोफोरा (Aplacophora )-
 
उदाहरण – निओमोनिया (Neomenia ), निमेटोमेनिया (Nematomenia )
(ii ) गण – पॉलीप्लेकोफोरा (Polyplacophora )-
 
उदाहरण – लेपिडोप्लूरस (Lepidopleurus ), कीटोप्लूरा (Cheatopleura ) , काईटन (Chiton ), लोरिका (Lorica  )

3 वर्ग – स्केफोपोडा (Scaphopoda )

लक्षण –
  1. ये समुद्री जल में पाये जाते है।
  2. इनका शरीर नलिकाकार कवच में बंद रहता है जो दोनों सिरों पर खुला रहता है।
  3. इनके सिर व नेत्रों का आभाव होता है।
  4. इनमें शंकु आकार का पाद पाया जाता है।
  5. मुख के चारों तरफ स्पर्शक पाये जाते है।
  6. इनमे गिल अनुपस्थित होते है।
  7. इनमें युग्मित वृक्क पाये जाते है।
  8. ये एकलिंगाश्रयी होते है।
  9. इनमे ह्रदय अवशेषी प्रकार का होता है।
  10. परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।  लारवा ट्रोकोफोर होता है।

4 वर्ग – गेस्ट्रोपोडा (Gastropoda )

लक्षण –
  1. ये समुद्री जल , स्वच्छ जल या स्थलीय आवास में पाये जाते है।
  2. ऐंठन या टॉरशन के कारण शरीर ऐंठ  कर असममित हो जाता है।
  3. इनमे एक कपाटी व सर्पिलाकार रूप से कुण्डिलत कवच पाया जाता है।
  4. इनमे स्पष्ट सिर पाया जाता है जिस पर नेत्र व स्पर्शक पाये जाते है।
  5. पाद सुविकसित , अधरिय चपटा व रेंगने के लिए उपयुक्त होता है।
  6. इनमें जलीय श्वसन के लिए जलक्लोम तथा वायवीय श्वसन के लिए फुफ्फुस कोष (Pulmonary sac ) पाया जाता है।
  7. इनमे कुछ एकलिंगी तथा अधिकांश द्विलिंगी होते है।
  8. उतसर्जन के लिए एक या दो नेफ्रीडिया पाए जाते है।
  9. परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।  ट्रोकोफोर या वेलिजर लार्वा पाए जाते है।
इस वर्ग को तीन उपवर्गो में वर्गीकृत किया जाता है –
(i ) गण – पेक्टीनिब्रेनकिया (Pectinibranchia )-
 
उदाहरण – साइप्रिया (Cypraea ), पाइला (Pila ), म्यूरेक्स (Muresx )
(ii ) गण – ओपीस्थोब्रेनकिया (Opisthobrenchia )-
 
उदाहरण – एक्टिऑन (Acteon ) , एप्लीसिया (Aplysia ), डोरिस (Doris ) या समुद्री निम्बू आदि।
(iii ) गण – पल्मोनेटा (Pulmonata )-
 
उदाहरण – प्लेनोर्बिस (Planorbis ) , लिमनिया (Lymnaea ) (स्वच्छ जलिय घोंघे ), हेलिक्स (Helix ) या स्थलीय घोंघे।

5   वर्ग – पेलेसीपोडा (Pelecypoda ) या लेमेलिब्रेनकिएटा (Lamellibranchiata )

लक्षण –
  1. ये समुद्री तथा स्वच्छ जलीय आवास में पाए जाते है।  इनमे से अधिकांश समुद्रवासी होते है।
  2. इनका शरीर द्विकपाटी कवच में बंद रहता है।
  3. परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है।  लारवा  वेलिजर या गलाकिडियम होता है।
  4. इनमे स्पष्ट सिर , नेत्रों , स्पर्शको , जबड़ो व रेडुला का आभाव होता है।
  5. इनमें पाद फरसे के  आकार का होता है तथा प्रावार पालियों के बिच फैला रहता है।
  6. ये एकलिंगाश्रयी होते है।
  7. श्वसन गिल द्वारा होता है।  गिल पतले व प्लेटसमान होते है।
इस वर्ग को पांच गणों में वर्गीकृत किया जाता है –
(i ) गण – प्रोटोब्रैंकिएटा (Protobrenchiata )-
 
उदाहरण – लीडा (Leda )
(ii ) गण – फिलिब्रेनकिएटा (Filibranchiata )-
 
उदाहरण -मायटिलस (Mytilus )
(iii ) गण -स्यूडोलेमेलिब्रेंकिएटा (Pseudolamellibranchiata )-
 
उदाहरण – पेकटन (Pecten ) , आयस्टर (Oyste )
(iv ) गण -युलेमेलीब्रेंकिएटा (Eulamellibranchiata )-
 
उदाहरण – युनियो (Unio ) , टेरेडो (Teredo ) , माइया (Mya )
(v ) गण – सेप्टीब्रेंकिएटा (Septibranchiata )-
 
उदाहरण – पोरोमाइया (Poromya )

6  वर्ग – सिफेलोपोडा (Cephalopoda )

लक्षण –
  1. ये सभी समुद्रवासी होते है।
  2. इनका शरीर द्विपाशर्व सममित व पृष्ठ अधर दिशा में बढ़ा हुआ होता है।
  3. इनमें कवच बाह्मा या आंतरिक होता है या अनुपस्थित होता है।
  4. सिर स्पष्ट और बड़ा होता है।  सिर पर सुविकसित नेत्र पाये जाते है।
  5. इनमें परिसंचरण बंद प्रकार का होता है।
  6. श्वसन के लिए गिल पाये पाये जाते है।
  7. ये एकलिंगी जंतु होते है।
  8. मुख में शृंगीय जबड़े व रेडुला पाए जाते है।  मुख के चारों तरफ 8 या 10 भुजाएं या स्पर्शक पाए जाते है , जिन्हे पहले भूलवश पाद समझा जाता था।
  9. परिवर्धन प्रत्यक्ष होता है अर्थात कोई लार्वा अवस्था नहीं पायी जाती है।
इस वर्ग को तीन उपवर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(i ) उपवर्ग – नोटिलॉइडिया (Nautiloidea ) 
 
 
लक्षण –
  • इनमे बाह्मा , कुण्डलित व बहुप्रकोष्ठीय कवच पाया जाता है।
  • इनमे दो जोड़ी गिल व दो जोड़ी वृक्क पाये जाते है।
  • भुजाओं में चूषकों का अभाव होता है।
  • मसि ग्रंथियाँ अनुपस्थित होती है।
  • नेत्रों में लेंस का अभाव होता है।
उदाहरण – नॉटिलस (Nautilus )
(ii ) उपवर्ग – आमोनिओडिया (Ammoniodea )
लक्षण
  • इस उपवर्ग के सभी जंतु विलुप्त हो चुके है।
  • इनमे बाह्मा तथा कुंडलित कवच पाया जाता है।
उदाहरण – पेंकिडिस्कस (Panchydiscus )
(iii ) उपवर्ग – सिलोइडिया (Coeloidea )
 
लक्षण –
  • इनमे कवच आंतरिक होता है या अनुपस्तिथ होता है।
  • आठ या दस भुजाएं पायी जाती है।  भुजाओं पर चूषक पाए जाते है।
  • गिल तथा वृक्क एक -एक जोड़ी पाए जाते है।
  • मसि ग्रंथि पायी जाती है।
  • नेत्रों में लेंस पाया जाता है।
इस उपवर्ग को दो गणों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
I  गण – डेकापोडा (Decapoda )-
उदाहरण – सीपिया (Sepia ), लोलीगो (Loligo )
II  गण – ऑक्टोपोडा (Octopoda )-
उदाहरण – आक्टोपस (Octopus ) , टीथीस (Tethys )

*  महवत्पूर्ण तथ्य

  • पाइला (Pila ) का साधारण नाम घोंघा या एप्पल स्नेल (Apple snail ) है।
  • युनियो (Unio ) तालाब या पोखर आदि के किनारे पाए जाते हैं।
  • सीपिया समुद्र में पाया जाता है तथा इसका साधारण नाम कटल फिश (Cuttle Fish ) है।
  • ऑक्टोपस भी समुद्र में पाया जाता है।  इसे डेविल फिश भी कहते है।
  • काईटन (Chiton ) को समुद्री चुहिया , डोरिस को समुद्री नींबू , एप्लीसिया को समुद्री खरगोश , कुण्डलिनी को उद्यान घोंघा तथा आक्टोपस को शृंगमीन के नाम से जाना जाता है।

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