संघ प्रोटोजोआ (Phylum Protozoa ) इनका जनन ,लक्षण और इससे होने वाले रोग 

 

 संघ प्रोटोजोआ
संघ प्रोटोजोआ 

 

प्रोटोजोआ दो शब्दों Protos = First , Zoon = Animal से मिलकर बना है।  प्रोटोजोआ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम गोल्डफस (Goldfus ) ने 1820 ई. में किया।  प्रोटोजोआ सबसे आदिकालीन एवं सबसे साधारण जंतु है।  ये एककोशिकीय (Unicellular ) तथा सूक्ष्मदर्शीय (Microscopic ) जंतु होते है।  इनकी कोशिका यूकरयोटिक प्रकार की होती है।  इस संघ में लगभग 30,000 जातियां (Species ) है। प्रोटोजोआ में ऊतक नहीं होता है। प्रोटोजोआ इतने सूक्ष्म होते है की इन्हे नंगी आँखों से देखना सम्भव नहीं है। समुद्री जल में और मीठे जल में असंख्य प्रोटोजोआ  मिलते है।
प्रोटोजोआ में अलैंगिक  एवं लैंगिक दोनों प्रकार से जनन क्रिया होती है।  अलैंगिक जनन भी दो प्रकार से होता है(1 ) सरल द्विविभाजन – इसमें प्रोटोजोआ अनुप्रस्थ या अनुदैर्ध्य रूप में दो भागों में विभाजित हो जाता है। . ये भाग न्यूनाधिक बराबर होते है।


(2 ) बहुविभाजन – इस विभाजन में दो या अधिक प्रोटोजोआ उतपन्न होते है।  जनक कोश के केंद्र का बारंबार विभाजन होता है और विभक्त हुए खंडो को कोशिकाद्रव घेर लेता है।  जब कोशो का बनना पूर्ण हो जाता है , तो कोशिका द्रव फटकर अलग  हो जाता है।

लैंगिक  जनन भी दो तरह से होता है –

1 संयुग्मन – इस प्रकार के जनन में दो प्रोटोजोआओ का अस्थायी संयोग होता है। इस संयोग काल में केन्द्रकीय पदार्थ का विनिमय होता है।  बाद में दोनों प्रोटोजोआ पृथक हो जाते है , प्रत्येक इस क्रिया द्वारा पुनर्युवनित हो जाता है।  सिलिएटा का जनन संयुग्मन का उदाहरण है।

2 युग्मकसंयलन – इस  क्रिया में युग्मक स्थायी रूप से संयोग करते है और केन्द्रकीय पदार्थ का संपूर्ण विखंडन होता है।  विखंडन के परिणामस्वरूप युग्मनज उतपन्न होते है।

  इस संघ के जंतुओं के प्रमुख लक्षण निमन है –

  • ये जंतु अत्यंत सूक्ष्म (001 mm से 5.0 mm ) और एककोशिकीय होते है।
  • ये स्वतंत्रजीवी , सहजीवी (Symbiotic )या सहभोजी (Commensal ) या परजीवी (Parasites ) होते है।
  • इनके शरीर का जीवद्रव्य (Protoplasm ) बाह्माद्रव्य और अंत : द्रव्य में विभेदित रहता है।
  • इस संघ के जंतुओं में पोषण (Nutrition ) मुख्यत : प्राणी समभोजी (Holozic ) , मृतोपजीवी (Saprophytic or Saprozoic ) , पादपसमभोजी (Holophytic ) या परजीविता विधि द्वारा होता है।
  • इस संघ के जंतुओं के शरीर में कोई ऊतक (Tissue ) या अंग (Organ ) नहीं होता है। इसमें पायी जाने वाली आकृतियों को अंगक (Organelles ) कहते है ,क्योंकि वे शरीर के हिस्से होते है।  इसलिए प्रोटोजोआ को जीवद्रव्य के स्तर पर गठित जंतु कहते है।
  • इस संघ के जंतुओं के प्रचलन (Locomotion ) कूटपाद (Pseudopodia ), कशाभिका (Flagella ) या यक्ष्माभिका (Cillia ) द्वारा होता है।
  • इस संघ के जंतुओं के एककोशिकीय शरीर में रसधानियाँ (vacuoles ) एवं सकुंचनशील रसधानियाँ (contractile vacuoles ) पाई जाती है।
  • इस संघ के जंतु एक केन्द्रकीय या बहुकेन्द्रकीय होते है।  इस संघ के जंतुओं में श्वसन तथा उत्सर्जन की क्रियाएं शरीर की बाहरी सतह के रास्ते विसरण क्रिया द्वारा होती है।
  • इस संघ के जंतुओं में प्रजनन अलिंगी (Asexual ) तथा लिंगी (sexual ) दोनों विधियों द्वारा सम्पन्न होता है।  अलिंगी प्रजनन द्विविभाजन , बहुविभाजन या मुकुलन द्वारा तथा लिंगी प्रजनन नर तथा मादा युग्मको के समागम (conjugation ) से होता है।
  • इनका शरीर नगन या पोलिकिल द्वारा ढंका रहता है।  कुछ जंतु कठोर खोल  है।
  • प्रतिकूल वातावरण (Unfavourable condition ) से सुरक्षा के लिए इनमे परिकोष्ठन (Encystment ) की व्यापक क्षमता होती है।
केन्द्रकप्रोटोजोआ की कोशिका की महवत्पूर्ण सरंचना केन्द्रक है। . यह जनन को नियमित तथा अन्य कार्यो को नियंत्रित करता है।  कोशिकाद्रव्य के अंत : प्रदव्य में यह स्थिर रहता है और इसकी संरचना की सहायता से प्रोटोजोआ जेनरा और स्पीशीज में अंतर करने में सहायता मिलती है। प्रोटोजोआ में एक या अधिक केन्द्रक होते है।


आर्थिक महत्व – प्रोटोजोआ का जैविक एवं आर्थिक महत्त्व है।  बहुत बड़ी संख्या में प्रोटोजोआ पृथ्वी की सतह पर  रहते है और ये पृथ्वी की उवर्रता के कारक समझे जाते है।  समुद्र में रहने वाले प्रोटोजोआ समुद्री जीवों के खाने के काम  में आते है।  प्राणिसमभोजी प्रोटोजोआ जीवाणुओं का भक्षण कर उनकी संख्या वृद्धि को रोकते है।  प्रोटोजोआ की कुछ जातियां पानी में विशिष्ट प्रकार की गंधो के कारक है।  डिनोब्रियान पानी में मछली की तरह की गंध तथा सिंयूर पानी में पके हुए खीरे या ककड़ी की तरह के गंध के कारक है।

वर्गीकरण 

प्रोटोजोआ को मगन के आधार पर निम्लिखित पांच वर्गो में बांटा गया है –

(1 ) मैस्टिगोफोरा (Mastigophora ) या कशाभिक (Flagellates )- इस वर्ग के प्रोटोजोआ में चाबुक सद्रश एक या अधिक कशाभिका रहती है , जो तैरने में सहायता करती है।  इस वर्ग के प्रोटोजोआ परजीवी , प्राणिसमभोजी एवं पादपसमभोजी होते है।

(2 ) सकोर्डिना (Sarcodina ) या राइजोपोडा (Rhizopoda ) – ये पादाभ (pseudopodium ) द्वारा गमन करते तथा भोजन करते है।  इस वर्ग के राइजोपोडिया , पाईरोप्लाजमिया होते है।

(3 ) स्पोरोजोआ (Sporozoa )- इसमें कोई भी चलन अंगक (locomotor  organelles ) नहीं रहते , क्योंकि इस अधिवर्ग के प्राणी परजीवी जीवन व्यतीत करते है। ये पुटी के अंदर जनन करते है।

(4  ) सिलिएटा (Cilliata ) – ये सिलिया के द्वारा भोजन एवं गमन करते है।  सिलिएटा दिवकेंद्रकी होते है , जिनमे से एक दीर्घ केन्द्रक तथा दूसरा लघु केन्द्रक होता है।  इसका संघटन बड़ा विकसित है। 


(5 ) साक्टोरिया (Suctoria) – ये शिशु अवस्था में सिलिया द्वारा और वयस्क होने पर स्पर्शकों द्वारा गमन करते है और इन्ही के द्वारा भोजन का अंतर्ग्रहण प्राभावित होता है।

प्रोटोजोआ से होने वाले रोग 







प्रोटोजोआ से होने वाले रोग
प्रोटोजोआ से होने वाले रोग 

 

कालाजार –    रोगजनक – लिशमानिया डोनोवनी।
                      वाहक -बालू मक्खी। 
लक्षण –  व्यक्ति शरीर में हल्का बुखार अधिक समय तक रहने के साथ ही साथ जिगर और प्लीहा की वृद्धि रहती है।  शरीर का रंग काला पड़ने लगता है , टखने एवं पलकों पर सूजन आ जाती है और बीच -बीच में उल्टी आदि आये तो ये सभी लक्षण कालाजार के होने के होते है।
बचाव – इसके बचाव हेतु मच्छर दानी  का प्रयोग करना चाहिए।
अमीबी पेचिश – रोगजनक -एंटअमीबा हिस्टोलिका 
                        वाहक – घरेलू मक्खियों द्वारा फैलता है। 
लक्षण – जब मॉल त्याग करते समय या उससे कुछ समय पहले अंतड़ियो में दर्द , टिस या ऐंठन की शिकायत हो तो समझ लेना चाहिए की यह पेचिश का रोग है।  इस रोग में पेट में विकारों के कारण अंतड़ी के निचे की तरफ कुछ सूजन आ जाती है।  इसके लक्षणों में पेट दर्द , बुखार , और कंपकंपी , उल्टी , पतले दस्त ,मलत्याग होना थकावट , एकाएक तेज बुखार और शरीर में पानी की कमी होना आदि है। पेचिश की उतपत्ति मुख्यत : बैक्टीरिया द्वारा होती है।  यह रोग किसी परजीवी या प्रोटोजोआ ( एककोशिकीय जीव , जैसे अमीबा ) द्वारा भी उतपन्न किया जा सकता है।  पेचिश , आंत की सूजन , अतिसार , रक्त युक्त अतिसार , पेटदर्द  लेक्टोस (दुग्ध शर्करा ) को हज्म ना कर पाना। अमीबी  पेचिश के उपचार में ऐमेटिन के इंजेक्शन , एन्ट्रिकोणाल , आइरोफार्म, दवाईया उपलब्ध है।
पायरियारोगजनक – एन्टअमीबा जिंजीवेलिस। 
पायरिया दाँत -मसूड़ों का एक रोग है।  यह रोग शरीर में कैल्शियम की कमी होने , मसूड़ों की खराबी व दाँत गंदे रखने से होता है।  इस रोग में मसूड़े पिलपिले व क,खराब हो जाते है।  उनसे खून आता है।  बरसात के मौसम में बच्चों में कई समस्याएं देखी जाती है, जिनमे सर्दी -बुखार , नाक बहना , दस्त।  हैजा और निमोनिया सबसे ज्यादा है। पायरिया का उपचार पेनिसिलिन का टीका तथा खाने में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी होना होना चाहिए।
बच्चों में दस्त – नन्हे शिशुओं में अक्सर हमे दस्त की समस्या नजर आती है।  आपको बता दे की जियार्डिया नाम का प्रोटोजोआ इसके लिए जिम्मेदार होता है। इसी के कारण शिशुओं में पतले दस्त की समस्या उतपन्न होती है जिसके बढ़ने पर उनके शरीर में पानी एवं खनिज जैसे आवश्यक तत्वों की भी कमी होने लगती है।  इसका इंफेक्शन मुँह के द्वारा छोटी आंत तक फैलती है।  यह आंत को डैमेज भी करता है , जिस कारण यह रोग लम्बे समय तक बच्चे को परेशान कर सकता है। अधिकतर बच्चों में इसके लक्षण बहुत ही सामान्य होते है इस कारण इस रोग का आसानी से पता नहीं चल पाता है।  दस्त के साथ खून या म्यूकस नहीं आता है , कुछ बच्चे क्रॉनिक दस्त से ग्रसित हो जाते है , इससे उनके शारीरिक विकास में भी बाधा उतपन्न होती है। बीमारी के एक बार कन्फर्म करने के बाद इलाज करना आसान हो जाता है। इसके उपचार में एटेब्रिन नामक दवा असरकारक है।  साथ ही स्वच्छता पर ध्यान देना अति आवश्यक है।


मलेरिया –  इसे जुडी बुखार भी कहते है मलेरिया शब्द इटेलियन भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है गंदी वायु।
रोगजनक – प्लाज्मोडियम 
वाहक -मादा एनोफ्लीज मच्छर 
लक्षण – बुखार का आना , कंपकंपी लगने के साथ ठंड लगती है , शरीर और सिर में दर्द भी होता है और अत्यधिक पसीना आता है।
उपचार – मलेरिया रोग के उपचार के लिए सबसे पुराणी औषधि कुनैन है।  जिसको सिन्कोना पेड़ की छाल से प्राप्त किया जाता है।  इसके अलावा रिसोचिन , केमाक्विन , मेपाकिन आदि।

 

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