विलयन , विलयन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

विलयन के कुछ नमूने 


विलयन की परिभाषा :-
 

                विलयन दो या दो से अधिक पदार्थो का समांग मिश्रण हैं जिसमे किसी निश्चित ताप पर विलेय और विलायक की आपेक्षिक मात्राएँ एक निश्चित सीमा तक निरंतर परिवर्तित हो सकती हैं।  

विषमांग पदार्थ

  • किसी विलयन में विलेय के कणो की त्रिज्या 10 की घात -7 सेमी से कम होती हैं।  अतः इन कणों को सूक्ष्मदर्शी द्वारा भी देखा जा सकता हैं।  
  • विलयन स्थायी एवं पारदर्शक होता हैं। 
  • विलेय और विलायक :- विलयन में जो पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होता हैं , उसे विलायक कहते हैं , तथा जो पदार्थ कम मात्रा में होता हैं उसे विलेय कहते हैं।  
  • जिस विलायक का डाईइलेक्ट्रिक नियतांक जितना अधिक होता हैं , वह उतना ही अच्छा विलायक माना जाता है।  जल का  डाईइलेक्ट्रिक नियतांक का मान अधिक होने कारण इसे सार्वत्रिक विलायक कहा जाता हैं।  
  • विलायक का उपयोग :
    • औषधि के निर्माण में 
    • निर्जल धुलाई में ( पेट्रोलियम , बेंजीन,ईथरजैसे विलायकों में )
    • इत्र निर्माण में 
    • अनेक प्रकार के पेय व् खाद्य पदार्थो के निर्माण में 
  • विलयन के प्रकार 
    • ठोस में ठोस का विलयन – मिश्रधातुए जैसे पीतल ( ताम्बा में जस्ता )
    • ठोस में द्रव का विलयन – थेलियम में पारा का विलयन 
    • ठोस में गैस का विलयन – कपूर में वायु का विलयन 
    • द्रव में ठोस  का विलयन – पारा में लेड का विलयन 
    • द्रव में द्रव का विलयन – जल में अल्कोहल का विलयन 
    • द्रव में गैस का विलयन – जल में कार्बनडाईऑक्साइड का विलयन 
    • गैस में ठोस का विलयन – धुँआ , वायु में आयोडीन का विलयन 
    • गैस में द्रव का विलयन – कुहरा , बादल , अमोनिया गैस का जल में विलयन 
    • गैस में गैस का विलयन – वायु , गैसों का मिश्रण 
  • संतृप्त विलयन – किसी निश्चित ताप पर  बना ऐसा विलयन जिसमे विलेय पदार्थ की अधिकतम मात्रा घुली हुई हो संतृप्त विलयन कहलाता हैं।  

   

संतृप्त विलयन  ( नमक का पानी ) 

 

    • असंतृप्त विलयन – किसी निश्चित ताप पर बना ऐसा विलयन जिसमे विलेय पदार्थ की और अधिक मात्रा उस ताप पर घुलाई जा सकती हैं , असंतृप्त विलयन कहलाता हैं। 
    • अतिसंतृप्त विलयन – ऐसा संतृप्त विलयन जिसमे विलेय की मात्रा उस विलयन को संतृप्त करने के लिए आवश्यक विलेय की मात्रा से अधिक घुली हुई हो , अति संतृप्त विलयन कहलाता हैं। 
    • विलेयता – किसी निश्चित ताप और दाब पर 100 ग्राम विलायक में घुलने वाली विलेय की अधिकतम मात्रा को उस विलेय पदार्थ की उस विलायक में विलेयता कहते हैं। 
      • विलेयता =विलेय की मात्रा / विलायक की मात्रा *100 
    • किसी पदार्थ की विलायक में विलेयता , विलायक तथा विलेय की प्रकृति पर , ताप एवं दाब पर निर्भर करती हैं।  
    • विलेयता पर ताप का प्रभाव 
      •  सामान्यतः ठोस पदार्थो की विलेयता ताप बढ़ने पर बढ़ती हैं।  
      • कुछ ठोस पदार्थों की विलेयता ताप बढ़ाने से घटती हैं।  जैसे सोडियम सल्फेट , केल्सियम हाइड्राक्साइड , केल्सियम नाइट्रेट आदि। 
      • किसी द्रव में गैस की विलेयता ताप बढ़ने से घटती हैं।  
    • विलेयता पर दाब का प्रभाव 
      • दाब बढ़ाने पर द्रव में गैस की विलेयता बढ़ती हैं। 
    • विलयन का सांद्रण – किसी विलायक ( या विलयन ) की इकाई मात्रा में उपस्थित विलेय की मात्रा को विलयन का सांद्रण कहते हैं।  जिस विलयन में विलेय की पर्याप्त मात्रा घुली रहती हैं उसे सांद्र विलयन कहा जाता हैं और जिसमे विलेय की कम मात्रा रहती उसे तनु विलयन कहा जाता है।  सभी तनु विलयन असंतृप्त विलयन होते हैं।  जो विलयन जितना ही अधिक तनु होता है वह उतना ही अधिक असंतृप्त होता हैं।  
    • परिक्षेपण –  जब किसी पदार्थ के कण ( परमाणु , अणु या आयन ) दूसरे पदार्थ के कणो के इर्द – गिर्द छितरा दिए जाते हैं तो यह क्रिया परिक्षेपण कहलाती हैं।  पहले पदार्थ को परिक्षेपित पदार्थ और दूसरे को परिक्षेपण माध्यम कहा जाता हैं।  परिक्षेपण के फलस्वरूप दो प्रकार के पदार्थ बनते हैं – 


    • विषमांग पदार्थ ( निलंबन एवं कोलॉइड ) 
    • समांग पदार्थ ( वास्तविक विलयन )
  • निलंबन – इसमें परिक्षेपित कणो का आकार 10 की घात -3 सेमी से 10 की घात -4 सेमी या इससे अधिक होता हैं।  इन्हे आँखों से देखा जा सकता हैं।  इसके कण छन्ना -पत्र के आर- पार नहीं आ जा सकते हैं।  ये अस्थायी होते हैं तथा इनके कानो में परिक्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की प्रवृति पायी जाती हैं।  उदाहरण नदी का गन्दा पानी , वायु में धुआँ। 

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  • कोलॉइड – इसमें परिक्षेपित कणो का आकार 10 की घात -5 सेमी और 10 की घात -7 के बीच होता हैं।  इसके कणो का नग्न आँखों की सहायता से नहीं देखा जा सकता बल्कि सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता हैं। इसके कण छन्ना-पत्र के आर -पार आ – जा सकते हैं लेकिन चरम पत्र से नहीं निकल सकते हैं।  इसके कणो में परिक्षेपण माधयम से अलग हो जाने की बहुत प्रवृति पायी जाती हैं।  उदाहरण दूध , गोंद , रक्त , स्याही आदि। 

  

कोलॉइड विलयन 

 

  • कोलॉइड के विभिन्न प्रकार – 
    • सोल – वैसा कोलॉइड , जिसमे ठोस कण द्रव में परिक्षेपित होते हैं , उसे सोल कहा जाता हैं। रबर के दस्तानो का निर्माण विद्दुत लेपन द्वारा रबर सोल से किया जाता हैं।  
    • जेल – वैसा कोलॉइड जिसमे ठोस कण द्रव में समान रूप से परिक्षेपित हो होते हैं , पर उनमे प्रवहता नहीं होती हैं , जेल कहलाती हैं।  जैसे जेली और जिलेटिन। 
    • एरोसोल – किसी गैस में द्रव या ठोस कणो का परिक्षेपण एसोसोल कहलाता हैं।  जब परिक्षेपित कण ठोस होता है तो ऐसे एरोसोल को धुंआ कहा जाता हैं और जब परिक्षेपित पदार्थ द्रव होता हैं तो ऐसे एरोसोल को कोहरा कहा जाता हैं। 
    • नोट :- जब परिक्षेपण का माध्यम जल , अल्कोहल एवं बेंजीन हो तो कोलॉइड को क्रमशः हाइड्रोसोल अल्कोहल एवं बेंजोसोल कहते हैं।  
    • पायस – जब किसी कोलॉइड में एक द्रव के सरे कण दूसरे द्रव के सारे कणो में परिक्षेपित तो हो जाते  हैं , लेकिन घुलते नहीं है , तो इस कोलॉइड को पायस कहते हैं। पायस बनाने की प्रक्रिया को पायसीकरण कहते हैं।  दूध एक प्राकृतिक पायस हैं , जबकि पेण्ट एक कृत्रिम पायस।  कॉडविलर तेल जिसमे जल के कण तेल में परिक्षेपित होते हैं , भी पायस का उदाहरण हैं।  सबसे बड़े पैमाने पर पायसीकारक के रूप में साबुनो और डिटर्जेंट का प्रयोग किया जाता है।  इनकी पायसीकरण की प्रकृति कपड़ो को धोने में सहायता करती हैं।  पैसि कारको का प्रयोग अयस्कों के सांद्रण में भी किया जाता हैं।  
    • झाग – द्रव में गैस का परिक्षेपण झाग कहलाता हैं।  ये साबुन से उत्पन्न होते हैं।  
    • वास्तविक विलयन – इनके कण आणविक आकार वाले होते है अर्थात इनके कणो का आकार 10 की घात -7 से 10 की घात -8 सेमी होता है।  इसके कण छन्ना पत्र के आर – पार आसानी से  आ – जा सकते हैं।  यह सबसे स्थायी एवं पारदर्शक होता हैं।  ये आँख तथा सूक्ष्मदर्शी से दिखाई नहीं देते हैं।  
  • अपोहन – कोलॉइड विलयन को वास्तविक विलयन से पृथक करने की प्रक्रिया को अपोहन कहते हैं।  अर्थात इस विधि के द्वारा कोलॉइडी विलयन को शुद्ध किया जाता हैं।  
  • ब्राउनी गति – कोलॉइडी विलयन के कण लगातार इधर – उधर भागते रहते हैं , इसे ब्राउनी गति कहते हैं। यह गति कोलॉइड कणो की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती हैं।  कण जितने सूक्ष्म होते हैं तथा माध्यम की श्यानता जितनी ही कम होती हैं एवं अधिक होता हैं यह गति उतनी ही तेज  होती हैं। 

 

 

  • स्कंदन – जब कोलॉइड विलयन में कोई विद्युत अपघट्य मिलाते हैं तो कोलॉइड कणों का आवेश उदासीन हो जाता हैं और उसका अवक्षेपण हो जाता हैं , इसे स्कंदन कहते हैं। 
  • टिंडल प्रभाव – जब किसी कोलॉइड विलयन में तीव्र प्रकाश गुजारते हैं और इसके फलस्वरूप रखे सूक्ष्मदर्शी से देखते हैं तो कोलॉइड कण काली पृष्ठभूमि में आलपिन की नोक की भांति चमकने लगती हैं।  इसके टिंडल प्रभाव कहते हैं।  टिंडल प्रभाव का कारण प्रकाश का प्रकीर्णन हैं।  

   

 विलयन में टिंडल प्रभाव 

 

  • वास्तविक विलयन और कोलॉइड विलयन में अंतर – 
वास्तविक विलयन
कोलॉइड विलयन
वास्तविक विलयन में पदार्थ  ( विलेय ) के कणो का आकार ( व्यास ) 10 की घात -7 से कम रहता हैं।
कोलॉइड विलयन में पदार्थ ( विलेय) के कणों का आकार( व्यास ) प्रायः10 की घात-7 सेमी और10 की घात-5 सेमी केबीच रहता हैं। 
इस पदार्थ के  कणहर  अवस्था में अदृश्य
होते हैं। 
कोलॉइडी कणों से उत्पन्न प्रकाश प्रकीर्णन को अल्ट्रामाइक्रोस्कोप द्वारा देखा जा सकता हैं।
इसमें पदार्थvका कण प्रकाश काप्रकीर्णन नहींकरते हैं। 
ये कण प्रकाश का प्रकीर्णन करतेहैं। 
इस विलयन का परासरणी दाब अधिक होता हैं।
इसका परासरणी दाब अपेक्षाकृत कम होता हैं।
यह समांग तथा एकांगी प्रावस्था वाला होता हैं।
यह विषमांग तथा दो प्रावस्था वाला होता है। 
    • बफर विलयन – वह विलयन जो की अम्ल या क्षार की साधारण मेट्रो कोअपनी प्रभावी अम्लता या क्षारता में पर्याप्त परिवर्तन किये बिना अवशोषित कर लेता है , इसे बफर विलयन कहते हैं।  जैसे सोडियम एसिटेट तथा एसिटिक अम्ल का मिश्रण एक प्रभावी बफर हैं , जब उसे पानी में विलीन किया जाता हैं।


 

विलयन का रंग 

 

सूचक
अम्लीय विलयन
क्षारीय विलयन
उदासीन विलयन
मिथाईल ऑरेंज
गुलाबी
पीला
नारंगी
लिटमस
लाल
नीला
बैंगनी
फिनोल्फथेलिन
रंगहीन
गुलाबी
रंगहीन
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