महिलाओं में माहवारी की कुछ महत्वपूर्ण बाते जो सबको जाननी चाहिए

मादा प्राइमटेस जैसे बंदर , ऐप्स (Apes )  मानव में पाए जाने वाले जनन चक्र को रजचक्र (menstrual  cycle )  कहते है। मादा प्राणियो में लैंगिक विकास अथवा यौनावस्था की शुरुआत 10 से 14  वर्ष की आयु के बीच  होती है।  इस समय प्रथम बार ऋतुस्त्राव (menstruation ) होता है।  यह क्रिया रजोदर्शन कहते है। यह क्रिया 45 -50 वर्ष की आयु तक प्रति 28 दिनों के अन्तराल पर नियमित रूप से होती  है।  अत : ऋतु केवल अगर्भधारित मादा जो 10 से 50 वर्ष के मध्य में ही  होता है। 10 वर्ष की आयु की कुमारियों या मादाओं में यह नहीं होता है क्योंकि इनमे जनदो का विकास इस स्तर तक नहीं होता है कि अन्डोतसर्ग के सकें तथा इनके लिए आवश्यक हार्मोनो की मात्रा  स्रवण कर सकें।  प्रत्येक बार के चक्र के दौरान गर्भाशय के भीतरी स्तर को अण्डाणु के रोपण के लिए तैयार किया जाता है। निषेचन होने तथा रोपण होने की स्थिति में ऋतुस्राव बंद  हो जाता है।  निषेचन की अनुपस्थिति में गर्भाशय का भीतरी स्तर टूट जाता है।  इसके साथ ही श्लेष्मा , रक्त  कोशिकीय झिल्ली के विखण्डित भाग जनन छिद्र से देह से बाहर निकाल दिये जाते है। यह क्रिया ऋतु- स्त्राव कहलाती है।  
रज -चक्र को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त करते है –
 

(1) रज प्रावस्था (Menstrual phase )



रजोधर्म या ऋतु स्त्राव वह अवस्था है जिसमे रक्त , ऊतक , द्रव , श्लेष्म व उपकला कोशिकाओं का नियमित अन्तराल के पश्चात स्त्राव होता है। यह आवर्ती स्त्राव स्त्रियों में 25 -65 मी. ली. प्रतिदिन लगभग 4 -5 दिनों तक होता रहता है। पूर्व  में गर्भाशय स्तर हार्मोन्स के प्रभाव से तैयार किया जाता है उसी क्रिया हेतु एस्ट्रोजन व प्रोजिस्ट्रोन की  नियमित मात्रा गर्भाशय को अब तक मिल रही थी किन्तु स्त्राव के आरम्भ होने  के 1 -2 दिन पूर्व से उपरोक्त हार्मोनो  की मात्रा अचानक कमी होने के कारण निषेचित अण्ड हेतु तैयार किया हुआ गर्भाशय का क्रियात्मक स्तर (stratum functionalis ) नष्ट हो जाता है।  अत : इस स्तर की उपकला की विखण्डित कोशिकायें , ग्रंथियों के स्रवण , ऊतक द्रव रक्त कोशिकाओं के भाग व रक्त का ह्यस  होने से उतपन्न पदार्थ स्त्राव के रूप में बहकर गर्भाशय की अवकाशिका (lumen ) से गर्भाशय ग्रीवा (cervix ) से योनि से , होकर जननं छिद्र द्वारा देह से बाहर निकलते है।

मादा में रजोचक्र की विभिन्न अवस्थाओं का आरेखीय निरूपण
मादा में रजोचक्र की विभिन्न अवस्थाओं का आरेखीय निरूपण 

इस प्रावस्था के दौरान अण्डाशय में अण्डाशयी चक्र के अंतर्गत प्राथमिक पुटकों (primary follicles ) के परिवर्धन की क्रिया भी आरम्भ हो जाती है।  सामान्य मादा में इन पुटकों की संख्या लगभग 2 लाख होती है।  प्रत्येक रज चक्र के आरंम्भ में 15-20  प्राथमिक पुटक वृद्धि करना आरम्भ करते है और द्वितीयक पुटको में परिवर्तित हो जाते है।  द्वितीयक पुटक की कोशिकाओं के अनेक स्तर पाए जाते है।  ये कोशिकायें आरम्भ में घनाकार होती है जो बाद में स्तम्भी प्रकार की हो जाती है।  ये कण युक्त कोशिकाद्रव्य से बनी होती है अत : कणिकामय कोहिकाएं कहलाती है।  द्वितीयक अण्ड कोशिका तथा कणिकीय स्तर के मध्य एक पारदर्शी स्तर  बनता है जिसे पारदर्शी अंडावरण (zona ellucida ) कहते है।  यह ग्लाइकोप्रेटिन प्रकृति का स्तर होता है।  कणिकीय कोशिकाओं द्वारा पुटकिय दाब स्रवण किया जाता है।  पुटकिय द्रव द्वितीयक अण्ड कोशिका को केंद्र से एक ओर हटा देते है और यह परिधि की ओर व्यवस्तिथ हो जाता है।  पुटकिय द्रव जिस गुहा में भरता है उसे एण्टरम या पुटकिय गुहा कहते है।  पुटको के वृद्धि की उपरोक्त क्रियांए पीयूष ग्रंथि के स्रवित FSH  हार्मोन के नियंत्रण में होती है जिसकी मात्रा इस प्रावस्था के दौरान अधिक होती है।  FSH का स्रवण हाइपोथैलेमस के द्वारा स्रवित FSH -RH  मोचक कारक के नियंत्रण में होता है।  पुटको के द्वारा एस्ट्रोजन हार्मोन का स्रवण भी होता है जो गर्भाशय के अन्त :स्तर व स्तन ग्रंथियों को प्रभावित करता है।  गर्भाशय का अन्त : स्तर निषेचित अण्ड को ग्रहण करने हेतु उत्तरोत्तर मोटा , ग्रन्थिल , संवहनीय व संवेदी बनकर अण्ड के रोपण हेतु तैयार होता है।

(2 ) पूर्व अण्डोतसर्ग प्रावस्था (Pre ovulatory phase )



ऋतुस्त्राव के उपरान्त किन्तु अण्डोतसर्ग के पूर्व की यह प्रावस्था छठे से तेरहवें दिन तक रहती है।  यह पुटकिय प्रावस्था (follicular phase ) के नाम से भी जानी जाती है।  FSH व LH पियूष ग्रंथि से आकर पुटको की वृद्धि एवं एस्ट्रोजन स्रवण को बढ़ाते है।  गर्भाशय  अन्त : स्तर (endometrium ) के रोपण हेतु पूर्व तैयारी कर ली जाती है। अन्त : स्तर में नव क्रियात्मक स्तर बनकर अन्त स्तर 4 -6 मि. मी. मोटाई  का हो जाता है।


अण्डोतसर्ग में हार्मोनो द्वारा नियंत्रण
अण्डोतसर्ग में हार्मोनो द्वारा नियंत्रण

द्वितीयक अण्डकोशिका युक्त द्वितीयक पुटको से एक या कभी अधिक ग्राफियन पुटक बन जाता है।  ग्राफियन पुटक परिपक़्व पुटक कहलाता है जो प्रथम सूत्री विभाजन कर अण्डोतसर्ग के लिए ततपर रहता है।  इस प्रावस्था के दौरान हाइपोथैलेमस  के प्रभाव से पहले FSH की मात्रा अधिक किन्तु अंतिम दौर में LH की मात्रा अधिक होती है।
 

रजचक्र प्रावस्थाओं में तापक्रम एवं हार्मोन परिवर्तन

 प्रावस्था के दौरान यदि रजचक्र 28 दिन का होता है तो सामान्यत : 14 वे दिन अण्डोतसर्ग (ovulation )की क्रिया होती है।  इस क्रिया  के लिये LH का अधिक मात्रा में होना अधिक आवश्यक है।  ग्राफ़ी पुटक जो अण्डाशय की झिल्ली पर फूल पर बाहर आ जाता है , अंतत : झिल्ली को तोड़कर देह गुहा में निकल जाता है।

(3 ) पशच अण्डोतसर्ग प्रावस्था (Post -ovulatory phase )

  यह प्रावस्था 15 वे से 28 वें दिन तक चलती है।  LH स्रवण फ़टे हुए ग्राफ़ी पुटक को प्रभावित करता है और इसमें रिक्त स्थान में पिली कोशिकाये भरने लगती है। यह पीत पिण्ड प्रावस्था कहलाती है जिसमे पीत पिण्ड (corpus luteum ) का निर्माण होता है।  पीत पिंड द्वारा एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टिरॉन का  स्रवण कर गर्भाशय की अन्त : स्तर को रोपण के लिये तैयार करता है।  इसके अंतर्गत अन्त : स्तर मोटा होकर , स्त्रावी बन जाता है।  इसमें ग्लाइकोजन का संग्रह होता है।  ये हार्मोन स्तरण ग्रंथियों को भविष्य के किये जाने वाले दुग्ध स्रवण हेतु तैयार करते है। यदि पूर्व में हुए ऋतु स्त्राव के आरम्भ से 27 वें या 28 वें दिन तक भी निषेचन न हो तो पीत पिण्ड का ह्यस होने लगता है अत : प्रोजेस्टिरॉन का स्रवण बंद हो जाता है।  यह क्रिया हाइपोथैलेमस पियूष ग्रंथि द्वारा स्त्रावित जनन हार्मोन्स के ऋणात्मक पुनर्भरण तंत्र के प्रभाव से होती है। प्रोजिस्टिरॉन व एस्ट्रोजन की मात्रा के कम होने से गर्भाशय के अन्त: स्तर का रख -रखाव  नहीं हो पाता है और ह्यसित होकर नष्ट हो जाता है।  यदि निषेचन की क्रिया सम्पन्न होती है तो पीत पिण्ड बना रहता है व दोनों हार्मोनो का स्रवण करता रहता है तथा गर्भाशय पर रोपण की क्रिया हो जाती है।  अपरा (placenta ) का निर्माण होता है।  अपरा द्वारा स्रवित हार्मोन पीत -पिण्ड का कार्य ग्रहण कर लेते है। 
 
रजचक्र के दौरान गर्भाशय तथा हार्मोन्स का प्लाज्मा में सान्द्रता का परिवर्तनों का सारांश
रजचक्र के दौरान गर्भाशय तथा हार्मोन्स का प्लाज्मा में सान्द्रता का परिवर्तनों का सारांश

सुरक्षित काल (Safe period )

यह क्रिया ऋतुस्त्राव के 14 वें दिन होती है।  द्वितीयक अण्डकोशिका अण्डोतसर्ग के 1 दिन के बाद जीवित रहती है तथा शुक्राणु अधिकतम दो दिन तक मादा की जनन वाहिनियों में जीवित रह सकते है।  अत : गर्भ ठकरने के दिन ऋतू स्त्राव के 10 से 17 वे दिन तक हो सकते है।  यदि सामान्य स्थिति में 28 दिन का चक्र सही ठीक बना रहता है तो ऋतू स्त्राव आरम्भ होने के प्रथम नौ दिन व 18 वें दिन से अगले ऋतु स्त्राव के होने तक का समय सुरक्षित कल होता है।  इन दिनों में मैथुन होने पर मादा के गर्भधारण करने की सम्भावना नहीं रहती है। 

पीरियड (मासिक धर्म ) से जुड़े मिथक और तथ्य

रजोनिवृति (Menopause )

ऋतु चक्र प्रत्येक माह लगभग 28 वें दिन के आसपास गर्भ धारण न करने की स्थिति में ऋतू आरम्भ होने के बाद हमेशा होता है।  यदि यह समय बढ़ता है या ऋतु स्त्राव बंद हो जाता है यह अवस्था रजोनिवृति कहलाती है। 40 -45 वर्ष की महिला में यह लक्षण उतपन्न होता रहता है।  पियूष ग्रंथि से स्रवित जनन हार्मोन इस अवस्था में अण्डाशय को प्रभावित कर पाने में असमर्थ रहते है अत : हार्मोनो का संतुलन विक्षुब्ध हो जाता है तथा रजचक्र की क्रिया नहीं होती है। 
मादा प्राणियों प्राइमेट्स में हार्मोनो का नियंत्रण सम्पूर्ण देह के अतिसंवेदी अंगो पर अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट होता है।  अत : हार्मोनो के संतुलन के विक्षुब्ध होने पर अनेक उपापचयी क्रियायँ भी असंतुलित हो जाती है।  इसके कारण अधिक पसीना आने , सर दर्द रहने , बालों के गिरने , पेशियों में दर्द रहने , नींद के न आने , वजन का बढ़ने जैसी तकलीफ होती है एवं सामान्य अवसाद का उठना आदि लक्षण दिखाई देते है।  अधेड़ अवस्था होने पर जनदो , गर्भाशय नलिका , योनि , बाह्मा जनेन्द्रियाँ व स्तन सभी में क्षीणता आने लगती है। 
उपरोक्त लक्षण यदि समय से पूर्व दिखाई देने लगे तो रोग का कारण हार्मोनो का कम बनना अथवा असंतुलन होना है जिसका उपचार अपेक्षित है। 
अगले भाग में हम बताएँगे माहवारी से सम्बंधित भ्रांतिया जो की समाज के लिए घातक है और उनसे पीछा कैसे छुड़ा सकते हैं तो बने रहिये हमारे साथ आगे भी ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारी हम आपके साथ साझा करेंगे अच्छा लगा हो तो आगे शेयर करें।   

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