आधुनिक कल का सबसे भयानक व भीषण रोग जिसे “काल ” कहा जाता जा सकता है उसे एड्स कहते हैं।
एड्स से आशय “एकवायर्ड इम्यूनो डैफिशिएंसी सिंड्रोम ” (acquired immuno deficiency syndrome ) से हैं।
लगभग 500 वर्ष पूर्व सिफलिस नामक रोग यूरोप में तेजी से फैला था।  1981 में न्यूयार्क व केलिफोर्निया से इस रोग के बारे में जानकारी मिली। एड्स की खोज का श्रेय डॉ. गॉटलीब (Dr. Gottlieb ) को है।  1981 में लास एंजेलेस में तीन महीनो में चार ऐसे रोग मिले जो फेफड़ो के न्यूमोसिस्टिस निमोनिया से ग्रसित थे।  यह संक्रमण अवसरवादी प्रकार का संक्रमण था।  जिसने रोगी को देह में उस समय प्रवेश किया था जब रोगी का प्रतिरक्षी निष्क्रिय हो चूका था।  ये सभी रोगी समलैंगिक संबंध रखने  वाले थे। यह रोग सामान्य संक्रमण न होकर सम्पर्क के फैलने वाला रोग है अर्थात रोगी को या भोजन द्वारा एवं न ही वायु के साथ इसका रोगाणु देह में प्रवेश करते है।यह रोग अनेक व्यक्तियों से असुरक्षित लैंगिक संबन्ध स्थापित करने वालो में यह रोग हो सकता है।  इनमे लसिका ग्रंथियों व अन्य अंगो में दुर्दम रोग हो  गये जिससे उतपन्न अवस्था को ” अभिग्रहित रोधकक्षमता अभाव संलक्षण (Acquired immuno deficiency syndrome ) AIDS  नाम दिया गया।

 

एड्स रक्त द्वारा फैलने वाला रोग  है जो निम्न लोगो को  हो सकता है-
(1 ) समलैंगियो (Homesexals) में।
(2 ) लैंगिक संबन्ध रखने वाले नर व मादा।
(3 ) रक्त , प्लाज्मा या प्लेटलेट्स आधान कराने वाले।
(4 ) रोगाणु युक्त या सीरीज का उपयोग करने पर।
(5 ) शिशुओं में संक्रमणित माता द्वारा।

एड्स का विषाणु (Aids virus ):-

एड्स का रोगाणु एक प्रकार का रेट्रोवायरस है जिसे संक्रमणित रोगी के रक्त , लसिका ग्रंथियों , मस्तिष्क ऊतक , प्रमस्तिष्क मेरु द्रव , प्लाज्मा , लार व् वीर्य से प्राप्त किया जा सकता है इनके नाम दिये गए है –

एड्स एसोशिएटेड वायरस (lymphoadenopathy associated virus ) LAV तथा मानव T -कोशिका लिम्फोट्रोपिक वायरस टाइप III (Humman T – cell Lymphotropic virus Type -III ) HTLV -III , इसे हाल ही में नया नाम मानव प्रतिरक्षी अभाव विषाणु (Human Immuno Deficiency Virus ) HIV दिया गया है।
HIV कुल रेट्रोविरिडी का सदस्य है। HIV मनुष्य में अबुर्द  उतपन्न करने में सहायक का कार्य करता है।
HIV के अनेक प्रभेद खोजे गए है।  HIV -I  अमेरिकन प्रभेद है जो विश्ववयापी है यह यूरोप मध्य व पूर्व एशिया में पाया जाता है।  जबकि HIV -II  का मुख्य संक्रमण पशिचमी अफ्रीका में है।

HIV की सरंचरना (Structure of HIV ):-

 एड्स का कारक कुल रेट्रोविरिडी के उप समूह लेंटीवायरस का सदस्य है।  यह विषाणु आवरण युक्त होता है।  इसका व्यास 90 -120 nm होता है।  इसमें न्यूक्लिओप्रोटीन से बनी कोर होता है। जिसके भीतर एक लड़ वाला RNA जीनोम व प्रोटीन उपस्थित होता है।
यह विषाणु जब किसी कोशिका को संक्रमिणत करता है तो एक एन्जाम विषाणविक RNA का अनुलेखन करता है जिससे पहले एक हेलिक्स युक्त DNA बनता है इसके बाद दो लड़ो या हेलिक्स वाला DNA बन जाता है जो परपोषी कोशिकाओं के गुणसूत्र प्रोविषाणु कहते है।

 

HIV
HIV 

विषाणु को सक्रिय करने वाले कारको के प्रभाव से यह क्रियाशील  हो जाता है तथा विषण्विक RNA की प्रतिकृति बनने की क्रिया आरम्भ हो जाती है।  साथ ही विषाणु के अन्य घटक भी संश्लेषित होने आरम्भ हो जाते है। RNA की प्रतिकृति बनने के तुरंत बाद यह नगण अवस्था में होती है उस समय पर लाइपोप्रोटीन का आवरण ही पाया जाता है।  HIV के जीनोम में तीन संरचनात्मक जीन्स गेग , पोल एवं एन्व एवं अन्य असंरचनात्मक  जीन्स उपस्थित होते है।  संक्रमणित व्यक्ति के सीरम में इनके प्रति एंटीबॉडीज पायी जाती है।  HIV में प्रतिजेनिक परिवर्तन कोड एवं आवरण प्रतिजन में बार -बार परिवर्तन होते रहते है।  HIV की सतह पर शूल प्रोटीन पर CD₄प्रतिजन होता है।

प्रतिरोधकता (Resistance):-

यह कठोर प्रकार का विषाणु नहीं है।  यह ताप अस्थिर  होता है अर्थात 50ºC पर 30 मिनट में तथा 100º पर।  सैकंड में निष्क्रिय हो जाता है।  सामान्य तापक्रम पर एक सप्ताह तक जीवित रहता है।  यह हिम शुष्कीय प्रकृति का होता है।  यह 70% इथेनॉल , 35% आईसोप्रोपाइल एल्कोहल , 5% फार्मेल्डीहाइड , 3 % हाइड्रोजन पराक्साइड  एवं 2.5 % टवीन 20 द्वारा नष्ट  किया जा सकता है।

रोगजनकता (Pathogenesis) :-

 संक्रमणित व्यक्ति की देह से स्त्रावित पदार्थो या ऊतकों से HIV प्राप्त किया जा सकता है। संक्रमण रक्त या ऊतक में उस समय होता है जब विषाणु इनके सम्पर्क में आता है एवं ये कोशिकाएं इसके लिए सुग्राही होती है।  इसमें T₄ लिम्फोसाइट्स सर्वाधिक सुग्राही होते है अत : संक्रमिणत हो जाते है।  सम्भोग या रक्त आधान के दौरान या सम्भावना अधिक होती है।  विषाणु का द्वि – तंतुकीय DNA से मिलकर गुप्त संक्रमण की अवस्था में प्रवेश कर जाता है।  धीरे धीरे लयंकारी पदार्थ स्त्रावित होते है एवं विरिअन्स की नयी पीढ़िया निकलकर देह की अन्य कोशिकाओं को संक्रमिणत करती जाती है।

HIV  के रोगी के निम्न लक्षणों के आधार पर रोग को पहचाना जा सकता है –

(1 ) लिम्फोनिया (Lymphopenia )
(2 ) चयनित T₄ लिम्फोसाइट्स की संख्या की कमी
(3 ) कोशिकीय विषाणु पदार्थो के प्रति निष्क्रिय होना
(4 ) प्रतिरोधी पदार्थो की मात्रा का सीरम में वृद्धि होना।
(5 ) त्वचा का अधिक संवेदी हो जाना।

AIDS के रोगियों को तीन वर्गो में विभक्त  किया जा  सकता है –

मानव जनन तंत्र और उससे जुडी रोचक जानकारी

1 स्वस्थ वाहक :-

यह प्रथम तथा सामान्य अवस्था है जिसमे रोगी की देह पर रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते केवल बुखार आता है जो कुछ महीनों तक चलता है।  रोगी सामान्य रहते है किन्तु अन्य व्यक्तियों को ससंक्रमित कर सकते है।  इनमे AIDS  के लक्षण दिखाई देने में 5 -7  वर्ष का समय लग सकता है।



2 प्रोड्रोमल प्रावस्था :

इस प्रावस्था में AIDS के लक्षण जैसे ज्वर , वजन में कमी एवं लसिका ग्रंथियों का बढ़ना प्रकट हो जाता है। यह प्रावस्था 1 -30  माह या 5 वर्ष तक रक सकती है।  यह एड्स की मध्यवर्ती या क्रोनिक अवस्था होती है।

3 अंतिम अवस्था :- 

 यह AIDS की पूर्ण विकसित प्रावस्था है।  व्यक्ति की मृत्यु रोगो के अनियंत्रण के कारण होती है।  ऐसा प्रतिरक्षी तंत्र के निष्क्रिय होने के कारण होता है जो एक बार विकृत होने के उपरांत पुन : ठीक नहीं होता।  यह अवस्था में रोगी 1 -4 वर्ष  तक जी सकता है।  इसके मुख्य लक्षणों में (1) फेफड़ो के संक्रमिणत होने से श्व्सन तंत्र का कमजोर हो जाना , सुखी खाँसी, शवास का न आना , छाती में दर्द रहना प्रमुख है।इसे क्राइसिस अवस्था भी कहते है।

बचाव एवं नियंत्रण :-

  (1 )  लोगों को शिक्षित करना , लैंगिक संबन्धों में सावधानी बरतना , अनजान लोगो से रक्त आधान न करना आदि।
(2) AIDS माताओं को गर्भधारण के प्रति सावधान किया जाना अति आवश्यक है क्योकि यह रोग माता से शिशु में प्रवेश करता है।
(3 ) समलैंगिक संबंधो के प्रति सचेत करना।
(4 ) वीर्य एवं रक्त दाताओं , वेश्याओं आदि के परीक्षण नियमित कराना तथा रोगियों को विशेष देख -रेख में की बहुत आवश्यक है।
(5) कंडोम का इस्तेमाल एवं इसका मुफ्त वितरण प्रयोज्य सुइयों (डिस्पोजेबल इंजेक्शन )  का उपयोग ड्रग का सम्पूर्ण नियंत्रण इत्यादि प्रमुख है।
(6 ) इसके लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एन. ए. सी. ओ. नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ) तथा अनेक गैर -सरकारी संगठन (नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन -एनजीओ )इसके नियंत्रण हेतु जन साधारण को एड्स के बारे में जानकारियाँ देकर इसके फैलने के तरीको से अवगत करवा रहे है।
(7) एड्स सर्दी जुकाम की तरह नहीं लगता इसलिए इसको रोकने के लिए जन साधारण को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है।

उपचार :-

एड्स के उपचार की  कोई निश्चित रुपरेखा नहीं है।  संक्रमण जो बढ़ते है या हो गये है का उपचार सम्भव है।  सामान्य प्रबन्ध , जाँच व विशिष्ट एंटी HIV एजेंट का उपयोग किया जाता है।
विषाणुओं को नष्ट करने योग्य ओषधियाँ जैसे इंटरफेरॉन , सुरमीन , फासकरनेट आदि उपयोग में लायी जा रही है।  जीडोव्यूडीन AZT विशेष तौर पर उपयोगी पायी गयी है।
एड्स के टिके विकसित किये जाने के अनेक प्रयोग किये गए है।  दो टीको को प्रभावी मान कर और प्रयोग किये जा रहे है।  इसके टिके बनाना एक जटिल कार्य है , क्योकि यह प्रतिरक्षी तंत्र की कोशिकाओं CD₄ लिम्फोसाइट्स को ही अपना शिकार बनाता है अत : इस विषाणु की पहचान नहीं हो पाती। विषाणु जो प्रोटीन बनाता है उनके खंडो को बदल देता है अत : ये प्रतिरक्षी तंत्र द्वारा पहचाने नहीं जाते जिनके विरुद्ध कोई रक्षात्मक कार्यवाही की जा सके।  उपचार में पूर्ण सफलता अभी तक किसी को भी नहीं मिल पायी है। असंख्य वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे हुए है।

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