क्या है थैलेसीमिया रोग ?  इसके लक्षण , प्रकार उपचार और निदान। 

थैलेसीमिया बच्चो को माता -पिता से आनुवाशिंक तौर पर मिलने वाला रक्त रोग है।  इस रोग में लाल रक्त कण (RED BLOOD CELSS ) (RBC ) नहीं बन पाते है और जो बन जाते है वो कुछ समय तक ही रहते है।  इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को बार -बार खून चढ़ाना पड़ता है। इस रोग की पहचान तीन माह की आयु  के बाद ही होती है। भारत में हर वर्ष 7 से 10 हजार बच्चे थैलेसीमिया से पीड़ित पैदा होते है यह रोग न केवल रोगी के लिए कष्टदायक होता है बल्कि सम्पूर्ण परिवार के लिए कष्टों का सिलसिला चलता रहता है।

 

यह रोग अनुवांशिक होने के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार में  चलती रहती है।  यह एक ऐसा रक्त विकार है जिसके कारण खून की कमी हो जाती है जिससे रोगी को एनीमिया हो जाता है और बहुत जल्द थकान भी होने लगती है।
आइये जानते है इस बीमारी के बारे में विस्तार से।
क्या है थैलेसीमिया ?
यह रक्त से जुड़ी हुई अनुवांशिक बीमारी है।  समान्य  रूप से शरीर में लाल रक्त कणो की उम्र करीब 120 दिनों की होती है , परन्तु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र मात्र 20 दिनों की हो जाती है। इसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित  हीमोग्लोबिन पर पड़ता है।  हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है।  इस बीमारी का मुख्य कारण रक्तदोष होता है।  यह बीमारी बच्चो को अधिकतर ग्रसित करती है तथा उचित समय पर उपचार न होने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है।

 

सामान्यत : एक स्वस्थ मनुष्य  के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या 45 से 50 लाख प्रति घन मिलीलीटर होती है। लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है।  इन कोशिकाओं में केन्द्रक नहीं होते है एवं इनकी जीवन अवधि 120 दिनों तक ही सीमित होती है।  हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण ही  इन कोशिकाओं  का रंग लाल दिखाई देता है।
क्यों होता है थैलेसीमिया ?
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है।  यह माता -पिता दोनों के जींस में गड़बड़ी के कारण होता है।  रक्त में हीमोग्लोबिन 2 तरह के प्रोटीन से बनता है – अल्फ़ा और बीटा ग्लोबिन।  थैलेसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है।  जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है।  रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन  पाता है एवं बार -बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है , जो ह्रदय , यकृत और फेफड़ो में पहुंचकर प्राणघातक होता है।
थैलेसीमिया के प्रकार – 
 
  • थैलेसीमिया माइनर -यह बीमारी उन बच्चो को होती है जिन्हे प्रभावित जीन माता -पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है।  इस प्रकार से पीड़ित रोगियों में अक्सर कोई लक्षण नजर नहीं आते है।  यह रोगी थैलेसीमिया वाहक होते है।
  • थैलेसीमिया मेजर – यह बीमारी उन बच्चो को होती है जिनके माता -पिता दोनों के जींस में गड़बड़ी होती है।  यदि माता -पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर हो तो पैदा होने बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा अधिक रहता है।  इनसे पीड़ित बच्चो में एक वर्ष के अंदर ही गंभीर एनीमिया के लक्षण दिखाई देने लगते है।  जीवित रहने के लिए बोन मेरो ट्रांसप्लांट पद्धति या फिर नियमित रूप से रक्त संक्रमण की आवश्यकता होती है।
  • हेड्रॉप थैलेसीमिया – यह बेहद खरतनाक थैलेसीमिया का प्रकार है जिसमे गर्भ के अंदर ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है या पैदा होने पर कुछ समय बाद ही बच्चा मर जाता है।
थैलेसीमिया के लक्षण –
 
 
1 थैलेसीमिया माइनर –  इसमें अधिकतर मामलो में कोई लक्षण नजर नहीं आता है।  कुछ रोगियों में रक्त की कमी  या एनीमिया हो सकता है।
2 थैलेसीमिया मेजर –  जन्म के 3 महीने बाद कभी भी इस बीमारी के लक्षण नजर आ सकते है।
  • बच्चो के नाख़ून और जीभ पिली पड़ जाने से पीलिया का भम्र पैदा हो  जाता है।
  • हाथ और पैर का ठंडा होना।
  • पैरो ऐंठन आना।
  • सूखता चेहरा।
  • वजन न बढ़ना।
  • साँस लेने में तकलीफ होना।
  • छाती में दर्द होना और दिल की धड़कन का सही से न चलना।
  • कमजोरी रहना।
  • बच्चे के जबड़े और गालों में असामान्यता आ जाती है।
थैलेसीमिया का उपचार –
रक्त चढ़ाना 
थैलेसीमिया का उपचार करने के लिए नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है।  कुछ  रोगियों को हर दिन 10 से 15 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है।   ज्यादातर मरीज इस उपचार का खर्चा नहीं उठा पाते है।  सामान्यत : पीड़ित बच्चे की मृत्यु 12 से 15 वर्ष की आयु में हो जाती है।  सही उपचार  लेने पर 25 वर्ष से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते है।  थैलेसीमिया से पीड़ित रोगियों में आयु के साथ -साथ रक्त की आवश्यकता भी बढ़ने लगती है।
खेलासोन थेरेपी 
बार -बार रक्त चढ़ाने  और लोह तत्व की गोली लेने से रोगी के रक्त में लौह तत्व की मात्रा अधिक हो  जाती है। लिवर तथा ह्रदय में जरूरत से ज्यादा लौह तत्व जमा होने से ये अंग सामान्य कार्य करना छोड़ देते है।  रक्त में जमे इस अधिक लौह तत्व को निकालने के प्रक्रिया के लिए इंजेक्शन और दवा तरह के इलाज उपलब्ध है।
बोन मेरो ट्रांसप्लांट 
बोन मेरो ट्रांसप्लांट और स्टेम सेल का उपयोग कर बच्चो में इस रोग को रोकने पर शोध हो रहा है।  इनका उपयोग कर बच्चो में इस रोग को रोका जा सकता है।
थैलेसीमिया का निदान –
शारीरिक जाँच 
व्यक्ति की शारीरिक जाँच से थैलेसीमिया का पता लगा सकते है।  पीड़ित व्यक्ति में रक्त की कमी के लक्षण , लीवर और स्प्लीन में सूजन और शारीरिक विकास में कमी इत्यादि लक्षणों से थैलेसीमिया का अंदाजा लगाया जा सकता है।
रक्त की जाँच 
माइक्रोस्कोप के नीचे रक्त की जाँच करने  लाल रक्त कण के आकार में कमी और अनियमितता और साथ ही हीमोग्लोबिन की कमी से थैलेसीमिया का निदान कर सकते है।  म्युटेशनल ऐनालिसिस जाँच करने पर अल्फ़ा थैलेसीमिया का निदान किया जाता है।
थैलेसीमिया को रोकने के लिए क्या करना चाहिए –
  • विवाह से पहले महिला -पुरुष की रक्त की जाँच कराएं।
  • गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ।
  • समय पर दवाइयाँ और इलाज पूरा ले।
  • रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान कर लेनी चाहिए।

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